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दूसरा पहलू: नजीर, बंजारानामा और मंजिल की ओर बढ़ता मुसाफिर

भूपेंद्र कुमार Published by: Pavan Updated Thu, 30 Apr 2026 08:02 AM IST
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सार

आगरा के अजीम शायर ने जिंदगी को एक सफर बताया है और यही संदेश यूरोप तक फैले जिप्सी भी देते हैं। नजीर ने इन्सान की तुलना बंजारे से इसलिए की, क्योंकि उनका कोई घर नहीं होता। पूर्वी यूरोप के रोमा जिप्सी भी भारत से ही गए थे। भारत के डोम, सिकलीगर, सांसी बंजारों का संबंध यूरोप के रोमाओं से माना जाता है। रोमानी भाषा की जड़ें संस्कृत में हैं और इसमें पंजाबी, राजस्थानी और हिंदी की झलक मिलती है।

Other Side: Nazir, Banjaranama, and the Traveler on His Way to the Destination
नजीर, बंजारानामा और मंजिल की ओर बढ़ता मुसाफिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

क्या मसनद तकिया, मुल्क मकां, क्या चौकी, कुर्सी, तख्त-छतर।
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सब ठाठ पड़ा रह जावेगा, जब लाद चलेगा बंजारा।


आगरा के अजीम शायर नजीर अकबराबादी ने जब बंजारानामा नज्म लिखी, तब उनके मन में मनुष्य की नश्वरता का भाव ही रहा होगा। वह कहना चाहते हैं कि सब कुछ यहीं रह जाएगा, बस मनुष्य अपने कर्मों की गठरी लादे किसी मुसाफिर की तरह अपनी मंजिल (मौत) की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रहा है। इसी नज्म का यह छोटा-सा हिस्सा है। नजीर ने इन्सान की तुलना बंजारे से इसलिए की, क्योंकि उनका कोई घर नहीं होता।

बंजारों पर दो बेहतरीन किताबें लिखी गई हैं, एक है डेविड मैकरिची की अकाउंट्स ऑफ द जिप्सीज इन इंडिया। दूसरी है, आरएल टर्नर की द पोजीशन ऑफ द रोमानी इन इंडो-आर्यन। फिरदौसी ने शाहनामा में लिखा है कि पांचवीं शताब्दी में सासानियन शासक बेहराम गुर ने दस हजार भारतीय बंजारों को फारस में रहने की पेशकश की थी। ये संगीत में निपुण थे। आठवीं शताब्दी में जब अरबों ने सिंध पर कब्जा किया, तो वहां रहने वाले बंजारे यूरोप और अफ्रीका तक चले गए। 810 ईस्वी में वे कुस्तुनतूनिया (मौजूदा इस्तांबुल) में देखे गए। बाइजेंटाइन इतिहासकारों ने उन्हें ‘अथीनगनोई’ कहा। 15वीं शताब्दी में बंजारे मिस्र में भी देखे गए।
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यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि रोमा जिप्सी, जो पूर्वी यूरोप में आज भी देखे जाते हैं, वे भी भारत से ही गए थे। 1427 ईस्वी में चेकोस्लोवाकिया (अब चेक और स्लोवाकिया अलग देश हैं) से जब जिप्सियों का पहला दल फ्रांस पहुंचा, तो उन्हें ‘बोहेमियन’ कहा गया। पुर्तगाल में उन्हें ‘सिगोनोस’ नाम दिया गया। डेनमार्क और स्वीडन में उन्हें ‘तारतार’ कहा गया। तुर्क उन्हें ‘शिनगानी’ कहते थे, यानी सिंधु नदी के मुहाने पर रहने वाली जनजाति। पर सबसे लोकप्रिय जिप्सी शब्द का उद्गम मिस्र (इजिप्ट) से माना जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध में नाजियों ने इन पर कहर बरपाया।

भारत के डोम, सिकलीगर, सांसी बंजारों का संबंध यूरोप के रोमाओं से माना जाता है। रोमानी भाषा की जड़ें संस्कृत में हैं और इसमें पंजाबी, राजस्थानी और हिंदी की झलक मिलती है। 18वीं शताब्दी में जब आगरा में नजीर ने बंजारों को रूपक बनाकर लिखा, तो मानो वह पूरी दुनिया को ही नश्वरता और मुसाफिर बने रहने का संदेश दे रहे थे।
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