विचार और समाज: क्या 'Gen Z' एक आयु वर्ग है या एक मानसिकता?
पेपर लीक आंदोलन, जंतर-मंतर प्रदर्शन और Gen Z की बहस पर आधारित यह विचार लेख लोकतांत्रिक विरोध, सामाजिक मर्यादा, भारतीय संस्कृति, युवाओं की भूमिका और सोशल मीडिया के प्रभाव पर विस्तृत चर्चा करता है।
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विस्तार
पिछले कुछ दिनों से पेपर लीक के मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर चल रहे धरना-प्रदर्शन ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा, रोजगार और परीक्षा प्रणाली से जुड़े प्रश्नों को उठाना छात्रों और युवाओं का अधिकार है। यदि परीक्षा में अनियमितताएं होती हैं, पेपर लीक होते हैं या व्यवस्था में जवाबदेही की कमी होती है, तो उसके विरुद्ध आवाज उठाना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। किंतु किसी भी आंदोलन की पहचान केवल उसके उद्देश्य से नहीं होती, बल्कि उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए साधनों और व्यवहार से भी होती है। यदि किसी आंदोलन में व्यक्तिगत अश्लीलता, सार्वजनिक मंचों से अपमानजनक भाषा, गाली-गलौज या किसी व्यक्ति के परिवार तक को निशाना बनाया जाता है, तो वह आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है और उसके नैतिक आधार पर प्रश्नचिह्न खड़े हो जाते हैं।
हर युवा जेन जी नहीं...
मेरे विचार से इस पूरे घटनाक्रम ने एक और गंभीर प्रश्न खड़ा किया है। आजकल Gen Z शब्द का प्रयोग लगभग हर युवा के लिए किया जाने लगा है। मैं इस धारणा से सहमत नहीं हूँ। मेरे मत में केवल किसी निश्चित वर्ष में जन्म लेने से कोई व्यक्ति किसी विशेष मानसिकता का प्रतिनिधि नहीं बन जाता।
मेरे लिए Gen Z कोई संपूर्ण छात्र या युवा पीढ़ी नहीं है, बल्कि एक ऐसी मानसिक विकृति प्रवृत्ति का नाम बन चुका है जिसमें वायरल होने की लालसा, त्वरित प्रसिद्धि, उत्तेजना, अश्लील भाषा, परंपराओं का उपहास, अनुशासन से दूरी और सामाजिक मर्यादाओं की उपेक्षा को आधुनिकता का प्रतीक मान लिया गया है। इसलिए मैं प्रत्येक छात्र या युवा को Gen Z कहना उचित नहीं मानता।
देश में आज भी ऐसे करोड़ों छात्र हैं जो अपने माता-पिता के साथ बड़े बुजुर्गों सम्मान करते हैं, कठिन परिश्रम से पढ़ाई करते हैं, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव रखते हैं और अपनी बात शालीनता से रखते हैं। ऐसे युवाओं को उसी श्रेणी में रखना, जिसमें अश्लीलता और उग्रता को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जाता है, उनके साथ अन्याय होगा।
मर्यादा तोड़ने से लोकप्रियता नहीं बढ़ती
वास्तविक चिंता यह है कि सोशल मीडिया के दौर में कुछ प्रभावशाली समूह युवाओं को यह विश्वास दिलाने लगे हैं कि जितनी अधिक उत्तेजक भाषा होगी, जितनी अधिक गाली होगी, जितनी अधिक मर्यादा का उल्लंघन होगा, उतनी ही अधिक लोकप्रियता मिलेगी। विरोध को विचारों की लड़ाई से हटाकर व्यक्तिगत अपमान की प्रतियोगिता बना दिया गया है। आज कुछ लोग यह मान बैठे हैं कि यदि किसी नेता, संस्था या विचारधारा का विरोध करना है तो उसके लिए सबसे पहले भाषा की मर्यादा तोड़नी होगी। यह लोकतांत्रिक संस्कृति नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद के पतन का संकेत है।
विरोध भी हो मर्यादा के भीतर
भारतीय सभ्यता का इतिहास इससे बिल्कुल विपरीत शिक्षा देता है। हमारे यहां शास्त्रार्थ की परंपरा रही है, जहां मतभेद तीखे होते थे, तर्क गहरे होते थे, लेकिन भाषा संयमित रहती थी। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच वर्षों तक चले दार्शनिक वाद-विवाद इसका उदाहरण हैं। दोनों के विचार अलग थे, किंतु संवाद की मर्यादा कभी नहीं टूटी। महाभारत में भी श्रीकृष्ण ने युद्ध से पहले शांति और संवाद का हर संभव प्रयास किया। भगवान श्रीराम ने अपने विरोधियों के प्रति भी व्यक्तिगत अपमान की भाषा का प्रयोग नहीं किया। यही भारतीय परंपरा की शक्ति है कि वह विरोध को भी मर्यादा के भीतर रखती है।
संस्कार से चरित्र निर्माण
भारतीय संस्कृति में बच्चों के संस्कारों का आधार केवल शिक्षा नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण रहा है। घर में सबसे पहले बच्चे को माता-पिता का सम्मान करना सिखाया जाता है। उसे यह बताया जाता है कि बड़े-बुजुर्गों से कैसे बात करनी है, असहमति कैसे व्यक्त करनी है और क्रोध आने पर भी अपनी वाणी पर नियंत्रण कैसे रखना है। हमारे यहां यह केवल सामाजिक नियम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्य है उसका सबसे बड़ा उदाहरण गोस्वामी तुलसीदास जी के श्रीराम चरित मानस में मिलता है जहां वो मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम के लिए लिखते हैं कि -
प्रातः काल उठि कै रघुनाथा।
मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
अर्थात, श्रीराम प्रातःकाल उठकर सबसे पहले अपनी माता, पिता और गुरु को प्रणाम करते है। यह चौपाई केवल एक धार्मिक वर्णन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के आदर्श छात्र और आदर्श युवा की पहचान होनी चाहिए ना कि आज का GEN Z जिसका पर्याय ही उजड़ता, अश्लीलता, अश्लीलता और अनैतिकता बन बनता जा रहा है। तैत्तिरीय उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य "मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव" केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का आधार है। इसका अर्थ है कि माता, पिता और गुरु के प्रति सम्मान ही मनुष्य के चरित्र की पहली सीढ़ी है।
भगवद्गीता (17.15) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं "अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्..." अर्थात ऐसी वाणी बोलो जो किसी को अनावश्यक कष्ट न दे, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो। यह शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी हजारों वर्ष पहले थी।
GEN Z नहीं, बल्कि जीवन के चार चरण है
जिस प्रकार से GEN Z शब्द का प्रयोग इतनी तेजी से होने लगा है कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे मनुष्य की पहचान ही उसकी पीढ़ी के नाम से निर्धारित होती है। किसी को GEN Z कहा जाता है, किसी को मिलेनियल, किसी को GEN X और किसी को बेबी बूमर।
आधुनिक समाजशास्त्र और जनसांख्यिकी ने अलग-अलग समय में जन्म लेने वाली पीढ़ियों को समझने और उनके सामाजिक व्यवहार का अध्ययन करने के लिए ऐसी श्रेणियाँ बनाई हैं। लेकिन यदि भारतीय दृष्टि से मनुष्य के जीवन को देखा जाए तो सनातन संस्कृति ने मनुष्य को केवल जन्म-वर्ष के आधार पर किसी पीढ़ी का सदस्य मानकर नहीं समझा, बल्कि उसके पूरे जीवन को उसके स्वभाव, कर्तव्य, शिक्षा, परिवार, सामाजिक उत्तरदायित्व, आत्मचिंतन और अंततः आध्यात्मिक मुक्ति की यात्रा के रूप में देखा।
बचपन सीखने का समय
इसलिए सनातन दृष्टि में GEN Z जैसा कोई स्थायी जीवन-वर्ग नहीं है। आज का बच्चा जिस प्रकार बचपन से गुजरता है, उसी प्रकार हजार वर्ष पहले का बच्चा भी बचपन से गुजरता था और हजार वर्ष बाद जन्म लेने वाला मनुष्य भी बाल्यावस्था से होकर ही आगे बढ़ेगा। समय बदल सकता है, तकनीक बदल सकती है, पहनावा बदल सकता है, भाषा बदल सकती है और सामाजिक परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन मनुष्य के जीवन की मूल अवस्थाएं नहीं बदलतीं। बचपन में सीखने की आवश्यकता होती है, युवावस्था में कर्म और उत्तरदायित्व बढ़ते हैं तथा वृद्धावस्था में अनुभव, चिंतन और जीवन के अंतिम अर्थ पर विचार स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
जेन-जी को आयुवर्ग से जोड़ना सही नहीं
सनातन संस्कृति की विशेषता यही है कि उसने मनुष्य के जीवन को केवल “उम्र” से नहीं, बल्कि उसके कर्तव्य और जीवन-उद्देश्य से समझा। हमारे धर्मग्रंथों, पुराणों आदि में जीवन को मुख्यतः चार आश्रमों में विभाजित किया गया है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह व्यवस्था केवल चार आयु-वर्ग बनाने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि मनुष्य के जीवन को क्रमबद्ध और संतुलित बनाने की एक सामाजिक तथा आध्यात्मिक संरचना थी।
अंततः मैं यही कहना चाहता हूं कि GEN Z किसी आयु वर्ग से जोड़कर देखना ठीक नहीं है। फिलहाल राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य राजनीतिक दलों और संगठनों के द्वारा GEN Z एक टूल बना हुआ है जिसका उपयोग ये सत्ता के विरुद्ध करना चाहते हैं। आज के समय में हर वर्ग के लोग मोबाइल इंटरनेट, चैट GPT और अन्य आधुनिक उपकरणों का प्रयोग कर रहे हैं। इसमें छात्र भी हो सकते हैं, नौकरीपेशा लोग भी, उद्यमी भी, किसान भी और बेरोज़गार भी। इसलिए Gen Z छात्र कहना सही नहीं है।
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