{"_id":"698155bde3afa8df28098e03","slug":"person-defeated-in-mind-history-bears-witness-that-empires-were-broken-not-by-swords-but-by-doubts-2026-02-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"मन से हारा व्यक्ति कभी जीत नहीं सकता: इतिहास गवाह है साम्राज्य तलवारों से नहीं, शंकाओं से टूटे हैं","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
मन से हारा व्यक्ति कभी जीत नहीं सकता: इतिहास गवाह है साम्राज्य तलवारों से नहीं, शंकाओं से टूटे हैं
जूलियस सीजर, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Tue, 03 Feb 2026 07:26 AM IST
विज्ञापन
सार
मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी चिंता को दृष्टि में बदले और भय को विवेक में। जो दिखाई नहीं देता, उससे डरने के बजाय उसे समझने का प्रयास करे। मनुष्य जब डरना छोड़ देता है, तभी वह स्वतंत्र होता है।
ब्लॉग
- फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
विस्तार
मनुष्य उस बात को लेकर अधिक चिंतित रहता है, जिसे वह देख नहीं सकता, बनिस्बत उसके, जो उसकी आंखों के सामने है। यह चिंता भय से जन्म लेती है और भय गैर-जरूरी कल्पना से। जो दिखाई नहीं देता, वह अनिश्चित होता है और अनिश्चितता मनुष्य की सबसे बड़ी बेचैनी है। जो हमें दिखाई देता है, वह बहुत कम है, लेकिन हमारे दिमाग की कल्पित आशंकाएं असीमित होती हैं। यही कारण है कि मनुष्य वास्तविक संकट से अधिक संभावित संकटों के बोझ तले दब जाता है।
जो सामने है, उससे मनुष्य समझौता कर लेता है। आंखों के सामने खड़ा संकट उसे आकार देता है, सीमा देता है और समाधान की दिशा भी। लेकिन जो दिखाई नहीं देता, उसका कोई रूप नहीं होता। वह केवल मन में फैलता है, विचारों में जड़ें जमाता है और धीरे-धीरे आत्मविश्वास को खोखला करने लगता है।
अदृश्य भय मनुष्य को भीतर से पराजित करता है, उससे पहले कि कोई वास्तविक युद्ध आरंभ हो। इतिहास गवाह है कि साम्राज्य तलवारों से नहीं, शंकाओं से टूटे हैं। सेनाएं शत्रु से नहीं, अपने ही भय से पीछे हटी हैं। जब सेनानायक अपने सैनिकों की आंखों में साहस की जगह आशंका देखता है, तब पराजय निश्चित हो जाती है, क्योंकि युद्ध का पहला मैदान मन होता है, और वहां हारने वाला बाहर कभी जीत नहीं सकता। मनुष्य अक्सर भविष्य से डरता है, जबकि भविष्य अभी आया ही नहीं होता। वह अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं के बीच वर्तमान को खो देता है। जो सामने है, वह उसके हाथ में है, लेकिन जो दूर है, उसी की चिंता उसे निष्क्रिय बना देती है। वह अपने ही भय का बंदी बन जाता है। शक्ति का वास्तविक स्रोत बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि भीतर की स्पष्टता में होता है। जो व्यक्ति अपने मन को स्थिर कर लेता है, उसके लिए अदृश्य भी भयावह नहीं रहता। वह जानता है कि हर अनदेखी वस्तु अनिवार्य रूप से शत्रु नहीं होती। कई बार जो दिखाई नहीं देता, वही अवसर होता है, वही संभावना होती है, वही परिवर्तन का द्वार होता है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश मनुष्य अवसर और संकट के बीच अंतर नहीं कर पाता। इसलिए वह पहले ही पीछे हट जाता है। डर उसे सावधान नहीं, बल्कि संकुचित बना देता है। और संकुचित दृष्टि से लिया गया निर्णय अक्सर गलत होता है। महानता का अर्थ भय का अभाव नहीं, बल्कि भय के बावजूद आगे बढ़ने का साहस है। जो व्यक्ति केवल दिखाई देने वाली वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करता है, वह अपने कर्म को प्राथमिकता देता है। वह जानता है कि नियंत्रण उसी पर है, जो सामने है। अदृश्य भविष्य को वह अपने वर्तमान के कर्मों से आकार देता है।
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी चिंता को दृष्टि में बदले और भय को विवेक में। जो दिखाई नहीं देता, उससे डरने के बजाय उसे समझने का प्रयास करे, क्योंकि जब मनुष्य अपने ही मन की छाया से डरना छोड़ देता है, तभी वह सच में स्वतंत्र होता है।
हमेशा आगे बढ़ते रहें
मनुष्य अक्सर उन आशंकाओं से डरता है, जिनका अस्तित्व केवल उसके मन में होता है। जो सामने है, वही उसकी वास्तविक शक्ति है। भय को समझदारी में बदलकर और वर्तमान में कर्म करके ही वह भविष्य को गढ़ सकता है। साहस भय की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उसके बावजूद आगे बढ़ने का निर्णय है। हमेशा आगे बढ़ते रहें।
Trending Videos
जो सामने है, उससे मनुष्य समझौता कर लेता है। आंखों के सामने खड़ा संकट उसे आकार देता है, सीमा देता है और समाधान की दिशा भी। लेकिन जो दिखाई नहीं देता, उसका कोई रूप नहीं होता। वह केवल मन में फैलता है, विचारों में जड़ें जमाता है और धीरे-धीरे आत्मविश्वास को खोखला करने लगता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
अदृश्य भय मनुष्य को भीतर से पराजित करता है, उससे पहले कि कोई वास्तविक युद्ध आरंभ हो। इतिहास गवाह है कि साम्राज्य तलवारों से नहीं, शंकाओं से टूटे हैं। सेनाएं शत्रु से नहीं, अपने ही भय से पीछे हटी हैं। जब सेनानायक अपने सैनिकों की आंखों में साहस की जगह आशंका देखता है, तब पराजय निश्चित हो जाती है, क्योंकि युद्ध का पहला मैदान मन होता है, और वहां हारने वाला बाहर कभी जीत नहीं सकता। मनुष्य अक्सर भविष्य से डरता है, जबकि भविष्य अभी आया ही नहीं होता। वह अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं के बीच वर्तमान को खो देता है। जो सामने है, वह उसके हाथ में है, लेकिन जो दूर है, उसी की चिंता उसे निष्क्रिय बना देती है। वह अपने ही भय का बंदी बन जाता है। शक्ति का वास्तविक स्रोत बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि भीतर की स्पष्टता में होता है। जो व्यक्ति अपने मन को स्थिर कर लेता है, उसके लिए अदृश्य भी भयावह नहीं रहता। वह जानता है कि हर अनदेखी वस्तु अनिवार्य रूप से शत्रु नहीं होती। कई बार जो दिखाई नहीं देता, वही अवसर होता है, वही संभावना होती है, वही परिवर्तन का द्वार होता है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश मनुष्य अवसर और संकट के बीच अंतर नहीं कर पाता। इसलिए वह पहले ही पीछे हट जाता है। डर उसे सावधान नहीं, बल्कि संकुचित बना देता है। और संकुचित दृष्टि से लिया गया निर्णय अक्सर गलत होता है। महानता का अर्थ भय का अभाव नहीं, बल्कि भय के बावजूद आगे बढ़ने का साहस है। जो व्यक्ति केवल दिखाई देने वाली वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करता है, वह अपने कर्म को प्राथमिकता देता है। वह जानता है कि नियंत्रण उसी पर है, जो सामने है। अदृश्य भविष्य को वह अपने वर्तमान के कर्मों से आकार देता है।
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी चिंता को दृष्टि में बदले और भय को विवेक में। जो दिखाई नहीं देता, उससे डरने के बजाय उसे समझने का प्रयास करे, क्योंकि जब मनुष्य अपने ही मन की छाया से डरना छोड़ देता है, तभी वह सच में स्वतंत्र होता है।
हमेशा आगे बढ़ते रहें
मनुष्य अक्सर उन आशंकाओं से डरता है, जिनका अस्तित्व केवल उसके मन में होता है। जो सामने है, वही उसकी वास्तविक शक्ति है। भय को समझदारी में बदलकर और वर्तमान में कर्म करके ही वह भविष्य को गढ़ सकता है। साहस भय की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उसके बावजूद आगे बढ़ने का निर्णय है। हमेशा आगे बढ़ते रहें।
