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एक सतत विकास यात्रा: हमारा जीवन केवल शरीर तक सीमित नहीं, यह व्यापक चेतना से जुड़ा

एपीजे अब्दुल कलाम, अमर उजाला Published by: नितिन गौतम Updated Wed, 04 Feb 2026 07:44 AM IST
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सार

पृथ्वी पर हमारी उपस्थिति केवल देह तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे भीतर विद्यमान मूल तत्व की निरंतरता को इंगित करती  है। संपूर्ण मानव जाति से हमारा संबंध है, क्योंकि मानवता के भीतर एक ही परम तत्व व्याप्त है।

philosophy of life human is not just body its beyond that to cosmos
ब्लॉग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेरे लिए मुक्ति का अर्थ सबसे पहले अज्ञान के अंधकार को दूर करना है और उसके बाद मन में जमी उन विकृतियों को खत्म करना है, जो जीवन के मूल तत्व को ढक लेती हैं। मनुष्य का जीवन एक सतत विकास यात्रा है, जिसे हम तीन चरणों में समझ सकते हैं। पहला चरण है-परम तत्व की उपस्थिति का बोध। दूसरा चरण है-उस परम तत्व के साथ सह-अस्तित्व का अनुभव, जहां हम यह समझने लगते हैं कि हमारा जीवन किसी एक शरीर तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक चेतना से जुड़ा है। तीसरा और अंतिम चरण है-उस परम तत्व में ही पूर्णतः अभिभूत हो जाना, जहां व्यक्ति स्वयं को एक व्यापक उद्देश्य का साधन मानने लगता है।
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यह जीवन-पथ का ज्ञान हर व्यक्ति को एक ही समय पर नहीं मिलता। कुछ आत्माओं को यह बोध बहुत कम उम्र में हो जाता है-जैसे रामानुजन या थॉमस एडिसन, जिन्होंने जिज्ञासा को अपना पथ बना लिया। कुछ को यह समझ जीवन के उत्तरार्ध में प्राप्त होती है-जैसे महात्मा गांधी, जिन्होंने अनुभवों की अग्नि में तपकर सत्य को पहचाना। कुछ व्यक्तियों में यह प्रयोजन स्पष्ट और साकार रूप में प्रकट होता है-जैसे नेल्सन मंडेला और वर्गीज कुरियन, जिनका जीवन उद्देश्य समाज के सामने दीपस्तंभ की तरह खड़ा दिखाई देता है। वहीं कुछ महान व्यक्तित्वों में यह प्रयोजन सूक्ष्म, निराकार और लगभग अदृश्य रहता है-जैसे सतीश धवन और काकरला सुब्बाराव, जिनकी साधना परिणामों में बोलती है, प्रचार में नहीं। एक बार जब मनुष्य अपने मार्ग को पहचान लेता है, तब वह अपनी आत्मिक शक्ति और जीवन के वास्तविक मूल्यों के विकास के लिए असीम संभावनाएं खोज लेता है।
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यह विकास जाग्रत अवस्था में जीवन जीने से आता है, यानी हर अनुभव को पूरी संवेदनशीलता के साथ स्वीकार करने और उससे सीखने से। अब्राहम लिंकन और नेल्सन मंडेला ने इस यात्रा में वर्षों लगाए, पर उन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा। यह साधना मनुष्य को मूल तत्व के अस्तित्व की खोज कराती है और उसके विविध स्वरूपों की पहचान के जरिये उसे एक शिखर तक पहुंचाती है। सीवी रमण के जीवन में यह खोज इंग्लैंड से लौटते समय समुद्र यात्रा के दौरान आरंभ हुई, जब प्रकृति के सौंदर्य ने उनके भीतर वैज्ञानिक जिज्ञासा को नई दिशा दी। गांधी जी के जीवन में यह चिंगारी दक्षिण अफ्रीका में तब जली, जब उन्हें रेलगाड़ी की प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर फेंका गया और अपमान ने उन्हें आत्मबल की शक्ति से परिचित कराया।

इससे हमें यह समझ मिलती है कि पृथ्वी पर हमारी उपस्थिति केवल देह तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे भीतर विद्यमान मूल तत्व की निरंतरता है। इसी बोध से हमें यह एहसास होता है कि हम मानवता के अभिन्न अंग हैं। तब हम संपूर्ण मानव जाति से अपने गहरे संबंध को महसूस करते हैं, क्योंकि हमें ज्ञान हो जाता है कि हमारे व समस्त मानवता के भीतर एक ही परम तत्व व्याप्त है। यही अनुभूति हमें आत्मकेंद्रित जीवन से उठाकर मानव-कल्याण के पथ पर ले जाती है और यही सच्ची मुक्ति है।

हर परिस्थिति एक अवसर है
सच्ची मुक्ति अज्ञान के अंधकार से बाहर निकलने में है। अनुभव, संघर्ष और संवेदनशीलता ही व्यक्ति को उसका मार्ग दिखाते हैं। जो हर परिस्थिति को सीख का अवसर मानता है, वही आत्मिक शक्ति विकसित करता है। आत्मकेंद्रित दृष्टि से उठकर मानव-कल्याण के उद्देश्य से जुड़ना ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि और सच्ची स्वतंत्रता है।
 
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