{"_id":"6982fb5faa5202c5c303aca2","slug":"unique-world-of-animals-petaurista-philippensis-indian-giant-flying-squirrel-details-2026-02-04","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया: उड़न गिलहरी-जंगल की छतरी का नन्हा पायलट","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया: उड़न गिलहरी-जंगल की छतरी का नन्हा पायलट
विज्ञापन
सार
इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल जिसे आम भाषा में उड़न गिलहरी कहा जाता है। ये जंगल के सबसे ऊपरी हिस्से में निवास करती है, जहां घने और लंबे पेड़ आपस में मिलकर छतरीनुमा आकार, यानी कैनोपी, बनाते हैं। इसी कारण इसे जंगल की छतरी का नन्हा पायलट कहा जाता है।
इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल
- फोटो : कल्याण वर्मा
विज्ञापन
विस्तार
प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को बिखेरते सतपुड़ा के घने जंगल, अपनी विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र और समृद्ध जैव विविधता के कारण एक आदर्श प्राकृतिक स्थल के रूप में जाने जाते हैं। इसी विशिष्ट वनस्पति और दुर्लभ जीव-जगत के कारण मध्यप्रदेश का पचमढ़ी बायोस्फियर रिजर्व अंतरराष्ट्रीय महत्व का क्षेत्र माना जाता है।
Trending Videos
आज हम बात करेंगे सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी के इर्द-गिर्द विचरण करने वाली उड़न गिलहरी की-जिसे “जंगल की छतरी का नन्हा पायलट” कहा जाना तनिक भी गलत नहीं होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल (Petaurista philippensis) जिसे आम भाषा में उड़न गिलहरी कहा जाता है। ये जंगल के सबसे ऊपरी हिस्से में निवास करती है, जहां घने और लंबे पेड़ आपस में मिलकर छतरीनुमा आकार, यानी कैनोपी बनाते हैं। इसी कारण इसे जंगल की छतरी का नन्हा पायलट कहा जाता है। अपनी विशिष्ट कार्यप्रणाली और रोचक व्यवहार के कारण यह किसी उड़न परी जैसी प्रतीत होती है।
ऊंचे और पुराने पेड़ों पर आशियाना
यह स्वभाव से अत्यंत शांत और शर्मीला जीव है, जिसे शोर-गुल बिल्कुल पसंद नहीं। ऊंचे और पुराने पेड़ ही इसका आशियाना होते हैं। नमी वाले क्षेत्र-जैसे नदी, नाले, झरने और गहरी खाइयां-इसके प्रिय स्थल होते हैं, जहां यह रात्रि के समय अठखेलियां करती दिखाई देती है। एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाते हुए हवा में तैरती इसकी गति किसी अद्भुत रोमांच और आश्चर्य से कम नहीं लगती। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई माहिर कलाबा ज इन घने जंगलों में करतब दिखा रहा हो।
रात्रि के समय यदि जंगल में सीटी जैसी कोई आवाज सुनाई दे, तो उसे पक्षियों की आवाज समझने की भूल न करें। दरअसल, यह आवाज इसी नन्ही उड़न गिलहरी की हो सकती है। अपने प्रजनन काल में यह एक-दूसरे को आकर्षित करने के लिए विभिन्न फ्रीक्वेंसी की आवाजें निकालती है।
यहां के नम पर्णपाती वन इनके आवास और संरक्षण के लिए आदर्श हैं। महुआ, साजा, सागौन और अर्जुन जैसे वृक्ष इन जंगलों में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। प्राकृतिक रूप से पेड़ों में बने खोखले तनों में रहना इसे पसंद है, जो इनके लिए सुरक्षित आवास स्थल होते हैं।
अपने जमीनी शत्रुओं जैसे जंगली कुत्ते और तेंदुए के कारण यह जमीन पर बहुत कम दिखाई देती है। यहां तक कि यह अपनी जल आवश्यकता भी पेड़ों की पत्तियों और फलों पर जमी ओस की बूंदों से ही पूरी कर लेती है l
क्या है इसका भोजन?
यह एक शाकाहारी जीव है, जो फल, पेड़ों की कोमल पत्तियां, पेड़ की छाल, गोंद तथा फूलों के रस पर निर्भर रहता है। विशेष रूप से महुआ के रसीले फल इसे बेहद पसंद होते हैं।
उड़न गिलहरी रात्रिचर जीव है, दिन के समय पेड़ के कोटरों में आराम करती है और शाम को सूर्यास्त के बाद यह सक्रिय हो जाती है और बाहर दिखाई देने लगती है, यह सामान्य गिलहरी से आकर में काफी बड़ी होती है और पूंछ मिलाकर 2-3 फीट लम्बाई होती है l
उड़न गिलहरी की पूरी दुनिया में लगभग 40 से 50 प्रजातिया पाई जाती है और भारत में लगभग 12 से 13 प्रजातीय जिनमे प्रमुख रूप से इंडियन जाइंट फ्लाइंग स्क्विरेल यह मध्य और दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा पाई जाने वाली प्रजाति है l
उड़न गिलहरी की जादुई उड़ान
उड़न गिलहरी की उड़ान बेहद रोचक और आश्चर्यजनक होती है। इसके पास पक्षियों की तरह पंख नहीं होते, लेकिन इसके हाथ और पैर आपस में त्वचा की एक विशेष झिल्ली से जुड़े रहते हैं, जिसे पैटेजियम कहा जाता है। जब यह किसी ऊंचे पेड़ से छलांग लगाती है, तो यह झिल्ली पैराशूट की तरह फैल जाती है, जिससे वह हवा में संतुलन बनाए रखते हुए फिसलती हुई आगे बढ़ती है। इसी की मदद से वह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक आसानी से ग्लाइड कर जाती है। सामान्यतः यह दूरी 100 से 200 फीट तक हो सकती है।
उस समय ऐसा प्रतीत होता है मानो वह हवा में तैर रही हो। इसी विशेषता के कारण उड़न गिलहरी बिना जमीन पर गिरे और बिना किसी चोट के सुरक्षित रूप से लैंड कर जाती है।
जंगल का एयरोडायनामिक इंजीनियर
उड़न गिलहरी को जंगल का एयरोडायनामिक इंजीनियर कहना बिल्कुल उचित है, क्योंकि यह बिना पंखों के अद्भुत ढंग से हवा में ग्लाइड करती है। ऊंचे पेड़ से छलांग लगाकर यह 30-45 डिग्री के कोण पर फिसलती है और लैंडिंग से ठीक पहले शरीर को मोड़कर अपनी गति को काफी हद तक कम कर लेती है। इसकी लंबी, घनी पूंछ रडर की तरह दिशा और संतुलन बनाए रखती है।
रात्रिचर जीव होने के कारण इसकी बड़ी, चमकीली आंखें कम रोशनी में भी दूरी और गहराई का सटीक अनुमान लगाती हैं, जबकि संवेदनशील कान रात के सन्नाटे में शिकारियों की हल्की आहट भी पकड़ लेते हैं।
शिकारियों को चकमा देने में निपुण
उड़न गिलहरी के शरीर में काउंटर-शेडिंग पाई जाती है शरीर का निचला भाग हल्का सफेद या क्रीम रंग का होता है, जबकि ऊपरी हिस्सा भूरा या गहरा लाल का होता है । यह रंग-संयोजन इसे शिकारियों से बचाने में मदद करता है, क्योंकि नीचे से देखने पर यह आकाश की रोशनी में घुल जाती है और ऊपर से देखने पर जमीन के रंग में मिल जाती है।
संरक्षण की आवश्यकता और वर्तमान खतरे
जंगलों में पेड़ों की कटाई, आग लगना, प्राकृतिक आवास स्थलों की कमी, पर्यटक स्थलों का विकास, शोर-शराबा, बढ़ती आवाजाही, विकास कार्यों का दबाव तथा कृत्रिम रोशनी ये सभी कारक इनके प्राकृतिक व्यवहार और जीवनचक्र में बाधा उत्पन्न करते हैं।
उड़न गिलहरी के संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर ठोस और व्यावहारिक कदम आवश्यक हैं।
--------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
