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दीपक प्रकाश प्रकरण: संवैधानिक मर्यादा और सत्ता समीकरण के बीच मुख्यमंत्री की परीक्षा

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सार

बिहार की राजनीति में इन दिनों पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का पद पर बने रहना सबसे चर्चित मुद्दों में से एक बन गया है। यह मामला केवल एक मंत्री के पद तक सीमित नहीं है। यदि अदालत पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक ठहराती है, तो भविष्य में गैर-विधायकों को मंत्री बनाकर लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने की राजनीतिक रणनीतियों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

plea challenging appointment of Deepak Prakash as Bihar’ Panchayati Raj Minister without being elected
प्रेसवार्ता करते बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश व अन्य नेता - फोटो : x
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विस्तार

बिहार की राजनीति में इन दिनों पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का पद पर बने रहना सबसे चर्चित मुद्दों में से एक बन गया है। संवैधानिक विवाद और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बावजूद उन्होंने इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया है।



दीपक प्रकाश और उनके पिता, सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने पूरा मामला एनडीए नेतृत्व और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पाले में डाल दिया है। उनका संदेश स्पष्ट है-अगर उन्हें हटाना है तो सरकार हटाए, वे स्वयं पद नहीं छोड़ेंगे।
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विवाद क्या है?

मामला उनकी मंत्री पद पर दोबारा नियुक्ति की संवैधानिक वैधता से जुड़ा है, जो अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच चुका है।

संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई व्यक्ति जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, वह अधिकतम 6 महीने तक मंत्री रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे सदन का सदस्य बनना अनिवार्य है।
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दीपक प्रकाश 20 नवंबर'25 को मंत्री बनाए गए थे, जबकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। 15 अप्रैल'26 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार गिरने के साथ मंत्रिपरिषद भंग हो गई। इसके बाद 7 मई'26 को नई सरकार के गठन पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उन्हें फिर से मंत्री पद की शपथ दिला दी।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिका में तर्क दिया गया है कि 6 महीने की संवैधानिक छूट केवल एक बार मिल सकती है। सरकार बदलने या पुनर्नियुक्ति के जरिए उसी व्यक्ति को दोबारा 6 महीने का अवसर नहीं दिया जा सकता।

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध एसआर चौधरी बनाम पंजाब सरकार के फैसले का हवाला दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि यदि कोई मंत्री 6 महीने के भीतर सदन का सदस्य नहीं बनता, तो उसे पद छोड़ना होगा और उसी कार्यकाल में बार-बार पुनर्नियुक्ति करके संवैधानिक प्रावधान को निष्प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार, चुनाव आयोग और दीपक प्रकाश को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि क्या वे अभी भी मंत्री पद पर बने हुए हैं।

नोटिस के बाद दीपक प्रकाश ने स्पष्ट कहा कि वे अभी भी मंत्री हैं और पद पर बने रहेंगे। वहीं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का कहना है कि सरकार कानूनी प्रक्रिया का पालन करेगी और अदालत के फैसले का सम्मान करेगी।

राजनीतिक महत्व

यह मामला केवल एक मंत्री के पद तक सीमित नहीं है। यदि अदालत पुनर्नियुक्ति को असंवैधानिक ठहराती है, तो भविष्य में गैर-विधायकों को मंत्री बनाकर लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने की राजनीतिक रणनीतियों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

राजनीतिक गलियारों में इसे महज जिद नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि दीपक प्रकाश और उपेंद्र कुशवाहा चाहते हैं कि भाजपा या मुख्यमंत्री उन्हें पद से हटाएं। ऐसा होने पर वे खुद को राजनीतिक अन्याय या वादाखिलाफी का शिकार बताकर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। इससे भविष्य की राजनीति में उन्हें एक नया नैरेटिव मिल सकता है।

मुख्यमंत्री की परीक्षा

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने भी चुनौती कम नहीं है। एक तरफ सरकार की साख, नैतिकता और कानूनी जवाबदेही का प्रश्न है, तो दूसरी तरफ गठबंधन की आंतरिक राजनीति का दबाव। यदि सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई प्रतिकूल टिप्पणी या निर्देश आता है, तो सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है।

फिलहाल दीपक प्रकाश अपनी चाल चल चुके हैं। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और एनडीए नेतृत्व पर टिकी हैं। उन्हें तय करना होगा कि प्राथमिकता राजनीतिक गणित को दी जाए या सुशासन और संवैधानिक मर्यादा की छवि को। बिहार की राजनीति इसी अगले कदम का इंतजार कर रही है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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