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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Self Identity: Are You Really Who Others Say You Are? Why It’s Time to See Yourself Differently

Mental Strength: दूसरों की नजरों से खुद को देखना छोड़िए, कमियों और खूबियों को स्वयं पहचानना क्यों जरूरी?

Tue, 11 Aug 2026 08:07 AM IST
Acharya Prashant आचार्य प्रशांत
Updated Tue, 11 Aug 2026 08:07 AM IST
सार

बचपन से ही परिवार, समाज और आसपास के लोग हमें अलग-अलग पहचान देते हैं। कोई बुद्धिमान कहता है, कोई कमजोर, कोई साधारण तो कोई असाधारण। धीरे-धीरे हम इन शब्दों को अपनी सच्चाई मानने लगते हैं। लेकिन क्या किसी दूसरे की राय ही हमारी पहचान तय कर सकती है? क्या हमने कभी खुद से पूछा है कि दूसरों की नजरों से अलग हमारी असली पहचान क्या है?

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Self Identity: Are You Really Who Others Say You Are? Why It’s Time to See Yourself Differently
अपनी पहचान खुद तय करना क्यों जरूरी? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

बचपन से ही इंसान को अपने बारे में दूसरों की राय सुनने की आदत पड़ जाती है। कोई बच्चे को बुद्धिमान कहता है, कोई शांत, कोई शरारती तो कोई कमजोर। ये बातें छोटी उम्र में सामान्य लगती हैं, लेकिन धीरे-धीरे इनका असर हमारे मन पर पड़ने लगता है। हम अपने बारे में वही मानने लगते हैं, जो दूसरे हमें बताते हैं। अगर किसी बच्चे को बार-बार कहा जाए कि वह बहुत होशियार है, तो वह खुद को उसी नजर से देखने लगता है। इसके उलट अगर किसी को लगातार साधारण या कमजोर कहा जाए, तो वह अपनी क्षमता पर ही शक करने लग सकता है।

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क्या लोगों के शब्द हमारी सोच को तय करने लगते हैं?

समस्या तब शुरू होती है, जब किसी दूसरे की कही हुई बात हमारी अपनी सोच बन जाती है। हम यह देखना छोड़ देते हैं कि हमारे अंदर वास्तव में क्या है और दूसरों की बनाई तस्वीर को ही सच मान लेते हैं। किसी ने कहा कि हम किसी काम में अच्छे नहीं हैं, तो हम कोशिश करना कम कर देते हैं। किसी ने हमें बहुत अच्छा बताया, तो हम उस छवि को बनाए रखने के दबाव में रहने लगते हैं। इस तरह दूसरे लोगों की राय धीरे-धीरे हमारे फैसलों और आत्मविश्वास पर असर डालने लगती है।

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क्या दूसरों की नजर में अच्छा दिखना ही जरूरी है?

इंसान सामाजिक प्राणी है, इसलिए दूसरों की राय की चिंता होना स्वाभाविक है। लेकिन हर समय यह सोचना कि लोग हमारे बारे में क्या कहेंगे, खुद से दूरी बढ़ा सकता है। हम अपनी पसंद के बजाय दूसरों की पसंद के हिसाब से फैसले लेने लगते हैं। कौन सा काम करना है, किस तरह व्यवहार करना है और किस रास्ते पर आगे बढ़ना है, इन सबमें भी दूसरों की स्वीकृति तलाशने लगते हैं। धीरे-धीरे सवाल यह नहीं रह जाता कि हमें क्या चाहिए, बल्कि यह बन जाता है कि दूसरे हमें किस रूप में देखना चाहते हैं।

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क्या अपनी कमियों और खूबियों को खुद पहचानना जरूरी है?

खुद को समझने का मतलब यह नहीं है कि हम अपनी कमियों को नजरअंदाज करें। इसका मतलब यह है कि अपनी खूबियों और कमजोरियों को किसी दूसरे के बताए पैमाने से नहीं, बल्कि खुद समझने की कोशिश करें। हो सकता है जिसे कोई व्यक्ति कमजोरी मानता हो, वही किसी दूसरे हालात में हमारी ताकत बन जाए। इसी तरह किसी तारीफ को अपनी पूरी पहचान बना लेना भी ठीक नहीं है। हमें अपने अनुभवों, फैसलों और कोशिशों से यह समझना होगा कि हम वास्तव में क्या कर सकते हैं और किन चीजों में सुधार की जरूरत है।

क्या खुद से सवाल करना हमें अपनी पहचान समझने में मदद कर सकता है?

खुद को समझने की शुरुआत कुछ आसान सवालों से हो सकती है। हम क्या चाहते हैं, किस काम में खुशी मिलती है, किन चीजों से डर लगता है और किन परिस्थितियों में हम अपने सबसे अच्छे रूप में होते हैं। इन सवालों के जवाब किसी और से लेने की जरूरत नहीं है। खुद के भीतर झांकने पर धीरे-धीरे यह समझ बन सकती है कि हमारी पहचान सिर्फ उन नामों और विशेषणों से नहीं बनी है, जो हमें बचपन से मिलते रहे हैं। हम लगातार बदलने और सीखने वाला इंसान हैं।

क्या दूसरों की राय से आजाद होना संभव है?

दूसरों की राय से पूरी तरह प्रभावित न होना आसान नहीं है। परिवार, दोस्त, समाज और काम की जगह पर लोगों की बातें हमारे जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन उनकी राय को अंतिम सत्य मान लेना जरूरी नहीं है। किसी की आलोचना हमें अपने बारे में सोचने का मौका दे सकती है, लेकिन यह तय करना हमारा काम है कि उस आलोचना में हमारे लिए क्या सही है। इसी तरह तारीफ भी अच्छी लग सकती है, लेकिन उसे अपनी पूरी पहचान बना लेना हमें दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर कर सकता है।

आखिर खुद को अपनी नजरों से देखना क्यों जरूरी है?

सबसे जरूरी बात यही है कि इंसान को अपनी पहचान खुद समझने की कोशिश करनी चाहिए। दूसरे हमें अपने अनुभव और नजरिए से देखते हैं, लेकिन वे हमारे भीतर चल रही पूरी कहानी नहीं जानते। इसलिए किसी की कही हुई बात को अपनी अंतिम सच्चाई मान लेना खुद के साथ अन्याय हो सकता है। दूसरों की नजरों से खुद को देखने के बजाय अपनी खूबियों, कमियों, इच्छाओं और अनुभवों को समझना जरूरी है। आखिर हमारी पहचान किसी दूसरे के शब्दों से नहीं, बल्कि हमारे अपने जीवन, फैसलों और प्रयासों से बनती है।

-प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के सत्रों के संशोधित अंश

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