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दिल्ली vs रांची: छात्र आंदोलन अलग, आक्रोश एक लेकिन सरकारों के रवैये में कितना फर्क?
सार
Government Job Exam Irregularities: दिल्ली और रांची में छात्र आंदोलन के मुद्दे अलग हैं, लेकिन युवाओं की बेचैनी एक जैसी है। दिल्ली में सवाल राष्ट्रीय परीक्षा-भर्ती व्यवस्था का है, तो रांची में झारखंड की भर्ती प्रक्रिया का। फर्क सरकारों के रवैये और राजनीतिक संदर्भ का भी है। लेकिन दोनों जगह मूल सवाल युवाओं के भविष्य और व्यवस्था पर भरोसे का है।
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झारखंड में प्रोटेस्ट करते छात्र
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Delhi And Ranchi Student Protests: देश में छात्र आंदोलन कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब एक ही समय में दिल्ली और रांची जैसे दो शहरों में युवा सड़क पर उतरते हैं, तो सवाल केवल उनकी मांगों का नहीं रहता। सवाल यह भी बनता है कि दो अलग-अलग सरकारें छात्रों के आक्रोश को किस नजर से देखती हैं और उनकी शिकायतों का समाधान किस तरीके से करती हैं?
दोनों आंदोलनों के मुद्दे बिल्कुल समान नहीं हैं। दिल्ली का आंदोलन व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में परीक्षा, भर्ती, रोजगार और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल उठा रहा है। वहीं रांची का आंदोलन मुख्य रूप से झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर है। लेकिन दोनों जगह एक बात समान है कि छात्रों को अपनी मेहनत और भविष्य पर भरोसा नहीं रह गया है।
दिल्ली में सवाल व्यवस्था का
दिल्ली देश की राजधानी है। यहां होने वाला कोई भी छात्र आंदोलन आसानी से राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया, भर्ती में देरी, परिणामों को लेकर विवाद और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता जैसे सवाल जब दिल्ली में उठते हैं तो उनका असर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहता। यहां छात्रों का सवाल मूलतः यह है कि यदि देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में युवा अपने जीवन के कई वर्ष लगा रहे हैं, तो पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और भरोसेमंद क्यों नहीं हो सकती? दिल्ली का आंदोलन इसलिए सिर्फ किसी एक परीक्षा का मामला नहीं रह जाता। वह राष्ट्रीय रोजगार व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल बन जाता है।
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रांची में सवाल सीधे भर्ती व्यवस्था पर
रांची की तस्वीर कुछ अलग है। यहां छात्रों का असंतोष झारखंड की भर्ती परीक्षाओं और JPSC-JSSC की कार्यप्रणाली को लेकर अधिक केंद्रित है। छात्रों की शिकायतें परीक्षा प्रक्रिया, कथित अनियमितताओं, परिणाम और भर्ती को लेकर हैं। उनका तर्क है कि जब एक अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करता है और परीक्षा व्यवस्था पर ही सवाल खड़े हो जाएं तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता। रांची का आंदोलन इसलिए राज्य की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है।
सबसे बड़ा फर्क- राजनीतिक संदर्भ
दिल्ली और रांची के आंदोलनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर उनके राजनीतिक संदर्भ का है। दिल्ली में आंदोलन का निशाना केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा-भर्ती व्यवस्था बनती है। रांची में राज्य सरकार से सीधे जवाब मांगा जाता है। यहीं से राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का फर्क भी सामने आता है।
विपक्ष के लिए दिल्ली का छात्र आंदोलन केंद्र सरकार की नीतियों पर हमला करने का अवसर बन सकता है, जबकि रांची का आंदोलन राज्य सरकार की प्रशासनिक क्षमता और जवाबदेही का सवाल बन जाता है। लेकिन छात्रों की नजर में शायद यह राजनीतिक विभाजन उतना महत्वपूर्ण नहीं है। उन्हें नौकरी चाहिए और वह भी ऐसी प्रक्रिया से जिसमें उन्हें भरोसा हो।
छात्र आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से कब तक?
भारत में छात्र आंदोलन शुरू होते ही एक सवाल उठता है इसके पीछे कौन है? यह सवाल कभी-कभी जरूरी हो सकता है, लेकिन हर आंदोलन को केवल राजनीतिक साजिश या विपक्ष की रणनीति मान लेना मूल समस्या से बच निकलने का रास्ता भी बन सकता है। यदि हजारों छात्र परीक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं तो पहले यह देखना चाहिए कि उनकी शिकायतों में कितनी सच्चाई है। यदि शिकायत सही है तो समाधान आंदोलनकारियों की राजनीतिक पहचान देखने से नहीं, व्यवस्था को ठीक करने से निकलेगा।
दिल्ली और रांची की साझा कहानी
दिल्ली की सड़क हो या रांची की, छात्र अपने घर से आंदोलन करने नहीं निकलता। वह तब निकलता है जब उसे लगता है कि उसकी आवाज सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से नहीं सुनी जा रही।
यहां सरकारों के लिए एक बड़ा सबक है।
युवा केवल रोजगार नहीं मांग रहा। वह निष्पक्ष अवसर मांग रहा है। वह चाहता है कि परीक्षा समय पर हो, प्रश्नपत्र सुरक्षित हो, परिणाम समय पर आए, शिकायतों की सुनवाई हो और पूरी भर्ती प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव से मुक्त दिखाई दे।
आंदोलन खत्म करना आसान, भरोसा लौटाना मुश्किल
सरकारें चाहें तो किसी आंदोलन को बातचीत, प्रशासनिक कार्रवाई या कानूनी कदमों से कुछ समय के लिए रोक सकती हैं। लेकिन यदि मूल शिकायत का समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन फिर लौट सकता है। यही वजह है कि दिल्ली और रांची दोनों जगह सरकारों के सामने असली चुनौती भीड़ को नियंत्रित करना नहीं, भरोसे के संकट को दूर करना है।
आज का युवा सोशल मीडिया के दौर का युवा है। वह घटनाओं की तुलना करता है, सवाल पूछता है और अलग-अलग राज्यों में सरकारों के रवैये को एक साथ देखता है। इसलिए किसी एक राज्य में की गई कार्रवाई दूसरे राज्य के युवाओं के लिए भी उदाहरण बनती है।
आखिर फर्क क्या है?
दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय परीक्षा और रोजगार व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। रांची का आंदोलन झारखंड की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल है। लेकिन दोनों के बीच सबसे बड़ा साझा सूत्र है- युवा और उसका भविष्य। और यही वह बिंदु है जहां राजनीति को पीछे हटकर प्रशासन को आगे आना होगा। क्योंकि छात्र आंदोलन को केवल यह कहकर खत्म नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे कौन है। अंततः सवाल यही रहेगा कि परीक्षा हमारी, मेहनत हमारी, भविष्य हमारा तो व्यवस्था की जवाबदेही किसकी?
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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दोनों आंदोलनों के मुद्दे बिल्कुल समान नहीं हैं। दिल्ली का आंदोलन व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में परीक्षा, भर्ती, रोजगार और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल उठा रहा है। वहीं रांची का आंदोलन मुख्य रूप से झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर है। लेकिन दोनों जगह एक बात समान है कि छात्रों को अपनी मेहनत और भविष्य पर भरोसा नहीं रह गया है।
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दिल्ली में सवाल व्यवस्था का
दिल्ली देश की राजधानी है। यहां होने वाला कोई भी छात्र आंदोलन आसानी से राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया, भर्ती में देरी, परिणामों को लेकर विवाद और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता जैसे सवाल जब दिल्ली में उठते हैं तो उनका असर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहता। यहां छात्रों का सवाल मूलतः यह है कि यदि देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में युवा अपने जीवन के कई वर्ष लगा रहे हैं, तो पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और भरोसेमंद क्यों नहीं हो सकती? दिल्ली का आंदोलन इसलिए सिर्फ किसी एक परीक्षा का मामला नहीं रह जाता। वह राष्ट्रीय रोजगार व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल बन जाता है।
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रांची में सवाल सीधे भर्ती व्यवस्था पर
रांची की तस्वीर कुछ अलग है। यहां छात्रों का असंतोष झारखंड की भर्ती परीक्षाओं और JPSC-JSSC की कार्यप्रणाली को लेकर अधिक केंद्रित है। छात्रों की शिकायतें परीक्षा प्रक्रिया, कथित अनियमितताओं, परिणाम और भर्ती को लेकर हैं। उनका तर्क है कि जब एक अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करता है और परीक्षा व्यवस्था पर ही सवाल खड़े हो जाएं तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता। रांची का आंदोलन इसलिए राज्य की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है।
सबसे बड़ा फर्क- राजनीतिक संदर्भ
दिल्ली और रांची के आंदोलनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर उनके राजनीतिक संदर्भ का है। दिल्ली में आंदोलन का निशाना केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा-भर्ती व्यवस्था बनती है। रांची में राज्य सरकार से सीधे जवाब मांगा जाता है। यहीं से राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का फर्क भी सामने आता है।
विपक्ष के लिए दिल्ली का छात्र आंदोलन केंद्र सरकार की नीतियों पर हमला करने का अवसर बन सकता है, जबकि रांची का आंदोलन राज्य सरकार की प्रशासनिक क्षमता और जवाबदेही का सवाल बन जाता है। लेकिन छात्रों की नजर में शायद यह राजनीतिक विभाजन उतना महत्वपूर्ण नहीं है। उन्हें नौकरी चाहिए और वह भी ऐसी प्रक्रिया से जिसमें उन्हें भरोसा हो।
छात्र आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से कब तक?
भारत में छात्र आंदोलन शुरू होते ही एक सवाल उठता है इसके पीछे कौन है? यह सवाल कभी-कभी जरूरी हो सकता है, लेकिन हर आंदोलन को केवल राजनीतिक साजिश या विपक्ष की रणनीति मान लेना मूल समस्या से बच निकलने का रास्ता भी बन सकता है। यदि हजारों छात्र परीक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं तो पहले यह देखना चाहिए कि उनकी शिकायतों में कितनी सच्चाई है। यदि शिकायत सही है तो समाधान आंदोलनकारियों की राजनीतिक पहचान देखने से नहीं, व्यवस्था को ठीक करने से निकलेगा।
दिल्ली और रांची की साझा कहानी
दिल्ली की सड़क हो या रांची की, छात्र अपने घर से आंदोलन करने नहीं निकलता। वह तब निकलता है जब उसे लगता है कि उसकी आवाज सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से नहीं सुनी जा रही।
यहां सरकारों के लिए एक बड़ा सबक है।
युवा केवल रोजगार नहीं मांग रहा। वह निष्पक्ष अवसर मांग रहा है। वह चाहता है कि परीक्षा समय पर हो, प्रश्नपत्र सुरक्षित हो, परिणाम समय पर आए, शिकायतों की सुनवाई हो और पूरी भर्ती प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव से मुक्त दिखाई दे।
आंदोलन खत्म करना आसान, भरोसा लौटाना मुश्किल
सरकारें चाहें तो किसी आंदोलन को बातचीत, प्रशासनिक कार्रवाई या कानूनी कदमों से कुछ समय के लिए रोक सकती हैं। लेकिन यदि मूल शिकायत का समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन फिर लौट सकता है। यही वजह है कि दिल्ली और रांची दोनों जगह सरकारों के सामने असली चुनौती भीड़ को नियंत्रित करना नहीं, भरोसे के संकट को दूर करना है।
आज का युवा सोशल मीडिया के दौर का युवा है। वह घटनाओं की तुलना करता है, सवाल पूछता है और अलग-अलग राज्यों में सरकारों के रवैये को एक साथ देखता है। इसलिए किसी एक राज्य में की गई कार्रवाई दूसरे राज्य के युवाओं के लिए भी उदाहरण बनती है।
आखिर फर्क क्या है?
दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय परीक्षा और रोजगार व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। रांची का आंदोलन झारखंड की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल है। लेकिन दोनों के बीच सबसे बड़ा साझा सूत्र है- युवा और उसका भविष्य। और यही वह बिंदु है जहां राजनीति को पीछे हटकर प्रशासन को आगे आना होगा। क्योंकि छात्र आंदोलन को केवल यह कहकर खत्म नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे कौन है। अंततः सवाल यही रहेगा कि परीक्षा हमारी, मेहनत हमारी, भविष्य हमारा तो व्यवस्था की जवाबदेही किसकी?
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।