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तमिलनाडु: कहीं एम.के. स्टालिन पर उल्टा न पड़ जाए हिंदी विरोध!
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सार
किसी एक राज्य के युवाओं को हिंदी जैसी भाषा से राजनीतिक कारणों से दूर करना कितना उचित है? फिर नई शिक्षा नीति-2020 में कहीं भी यह बाध्यता नहीं है कि आपको हिंदी सीखनी ही है। किसी दूसरी भारतीय भाषा को भी तमिलनाडु के युवा सीख सकते हैं।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन।
- फोटो : PTI
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विस्तार
तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। राज्य में कोई भी बड़ा मुद्दा अपने पक्ष नजर नहीं देख द्रमुक पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने एक बार फिर हिंदी विरोध के मुद्दे को चुना है। यह विरोध हिंदी का नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक एजेंडा भर दिख रहा है। तमिलनाडु में भी अन्य राज्यों की तरह सत्ता विरोधी लहर चलती है।
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हर पांच साल बाद जनता अक्सर सरकार बदल देती है। एम.के. स्टालिन के पक्ष में परिस्थितियां अच्छी नजर नहीं आ रही हैं। यही कारण है कि उन्होंने वर्ष 1937 से चले आ रहे हिंदी विरोधी मुद्दे को विधानसभा चुनाव से सालभर हवा देना प्रारंभ कर दिया है। हालांकि, यह लग रहा है कि इस बार उनका यह पैंतरा चलने वाला नहीं है।
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आपको थोड़ा सा अतीत में लेकर चलता हूं। सितंबर 2020 में एम.के. स्टालिन की बहन और द्रमुक पार्टी नेता कनिमोझी ने हिंदी विरोध में चुनाव से पहले यूं ही झंडा बुलंद किया था। उस समय बात यहां तक पहुंच गई थी कि कनिमोझी ने तत्कालीन केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपाद नायक को चिट्ठी लिखकर तब मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटोचा का इस्तीफा तक मांग लिया था, क्योंकि कनिमोझी का आरोप था कि कोटेचा ने एक वेबीनार में हिंदी नहीं जानने वाले प्रतिभागियों को सत्र छोड़कर जाने के लिए कहा था।
कनिमोझी ने चेन्नई एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ के जवान पर उन्हें हिंदी को लेकर तंग करने का आरोप लगाया था, जो असत्य निकला था। कनिमोझी ने यहां तक कहा था कि उन्हें हिंदी आती नहीं है, जबकि सच्चाई बिल्कुल इसके उल्ट है। कनिमोझी को न केवल हिंदी अच्छे से आती है, बल्कि उर्दू, तमिल, अंग्रेजी समेत पांच भाषाओं को वो जानती हैं।
आपकी स्मृति के लिए बता दूं। एक बार पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल चेन्नई पहुंचे थे। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि की मौजूदगी में हिंदी में भाषण दिया था। तब उनके हिंदी भाषण का तमिल में रूपांतरण कनिमोझी ने किया था। अब आप समझ लीजिए, हिंदी को लेकर कनिमोझी का विरोध कैसा था?
अब एम.के. स्टालिन पर आते हैं। स्टालिन अब केवल हिंदी का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि वो इससे आगे बढ़कर संस्कृत तक पहुंच गए हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि संघ परिवार का असली एजेंडा संस्कृत को थोपने का है। हिंदी को लेकर उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि हिंदी के कारण यूपी-बिहार में 25 से ज्यादा भाषाएं खत्म हो गईं हैं।
यह रिसर्च स्टालिन ने कब कराई? यह उन्होंने बताया नहीं है। साफ दिख रहा है कि स्टालिन एक बार फिर भाषा के आधार पर भावनाओं को भड़का कर वोट लेने की मंशा रखते हैं। संभवतः पिछले 4 सालों में उन्होंने क्या काम कराए हैं, यह बताने के लिए नहीं है। इसलिए राजनीति अब हिंदी-संस्कृत पर आकर रुक गई है।
आखिर एक नई भाषा को सीखने में हर्ज क्या है? क्या तमिलनाडु के युवाओं को हिंदी नहीं आनी चाहिए? यदि अवसर मिले तो हिंदी भाषी युवा भी तमिल सीखना चाहेगा। आज हिंदी बोलने वालों की संख्या दुनिया में 70 करोड़ से अधिक है। भारत में ही 53 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं। हिंदी का बहुत बड़ा बाजार है। हिंदी की मांग पूरी दुनिया में बढ़ रही है।
ऐसे में किसी एक राज्य के युवाओं को हिंदी जैसी भाषा से राजनीतिक कारणों से दूर करना कितना उचित है? फिर नई शिक्षा नीति-2020 में कहीं भी यह बाध्यता नहीं है कि आपको हिंदी सीखनी ही है। किसी दूसरी भारतीय भाषा को भी तमिलनाडु के युवा सीख सकते हैं। साफ है कि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन जानबूझकर हिंदी का ही विरोध कर रहे हैं। मातृभाषा में पढ़ाई और अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा में पढ़ाई हो ही रही है।
यह भी सत्य है कि तमिलनाडु में भाजपा धीरे-धीरे अपना वोटबैंक बढ़ा रही है। इस समय द्रमुक के आगे बड़ी चुनौती यह है कि भाजपा का मत प्रतिशत तमिलनाडु में बढ़ रहा है। अगर वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों की बात करें तो डीएमके को 46.9% वोट मिले, जो वर्ष 2019 के मुकाबले 6.18% कम थे, जबकि एआईएडीएमके ने 23.05% हासिल किए, जो पिछले चुनाव से 1.50% ज्यादा थे। भाजपा ने 18.28% वोट हासिल किए, जो पिछले चुनाव से 3.31% अधिक थे। के.अन्नामलाई के नेतृत्व में भाजपा इस समय बहुत आक्रमक तरीके से तमिलनाडु में प्रचार कर रही है।
एआईएडीएमके की चुनौती तो शुरू से द्रमुक के आगे रही है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का हिंदी-संस्कृत विरोध कहां तक जाता है? हिंदी को लेकर इंडी गठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल कांग्रेस का क्या रुख रहता है? यह भी संभव है कि इस बार हिंदी विरोध को वो समर्थन न मिले, जैसा पहले मिलता था। कहीं एम.के. स्टालिन का हिंदी विरोध उन पर उल्टा न पड़ जाए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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