समान नागरिक संहिता: आसान नहीं है जनजातियों पर समान नागरिक संहिता थोपना
सन 2011 की जनगणना में आदिवासी जनसंख्या 10.42 करोड़ थी जो कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। बहुत संभव है कि संविधान के 73वें और 74वें संशोधन की तरह पूर्वोत्तर राज्यों को समान नागरिक संहिता में भी छूट दे दी जाए।
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केन्द्र सरकार से लेकर विधि अयोग और सत्ताधारी दल की तात्कालिक गतिविधियों से तो यही लगता है कि समान नागरिक संहिता अब दूर नहीं है। इस मुद्दे पर उत्तराखण्ड से छिड़ी बहस अब देशव्यापी हो चुकी है और इस बहस के साथ ही मोदी सरकार राजनीतिक लाभ-हानि को लेकर जनता की नब्ज भी टटोल चुकी है। चूंकि अब लोकसभा चुनाव के लिए एक साल से कम समय बचा है, इसलिए उनके लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का इससे बेहतर मुहूर्त और कोई नहीं हो सकता है।
लेकिन सवाल अब भी मौजूद है कि क्या अपने नाम के अनुरूप समान नागरिक संहिता सारे देश में समान रूप से लागू हो सकेगी? अगर सारे देश पर लागू नहीं हुई तो उसे समान कानून क्यों और कैसे कहा जा सकता है? इस कानून को लागू करने में कुछ संवैधानिक अड़चनों के साथ ही देश की सांस्कृतिक विधिता और खासकर जनजातियों को उनकी परम्पराओं के लिए मिली गांरटी भी एक बहुत बड़ी अड़चन है।
उनकी परम्पराएं ही उनकी पहचान है। जनजातियों को छेड़ने का अंजाम हम मणिपुर में देख चुके हैं। इसलिए चर्चा है कि समान नागरिक संहिता से जनजातियों को अलग किया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो क्या नागरिकता कानून सचमुच समान माना जाएगा?
समान नागरिक संहिता का लक्ष्य नियमों में एकरूपता लाना
देश में भारतीय दंड संहिता और दण्ड प्रक्रिया संहिता के जरिए वैयक्तिक कानूनों के सिवा बाकी सारे कानून समान हैं। समान नागरिक संहिता का लक्ष्य विभिन्न धर्मो और समुदायों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने, भरण-पोषण सम्बन्धी नियमों में एकरूपता लाना है। नागरिकों के धर्म और धार्मिक रीति-रिवाजों की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों को लेकर इस बहुप्रतीक्षित कानून पर सवाल उठ रहे हैं। संविधान ने सात सौ से अधिक जनजातियों और उनकी सैकड़ों उपजातियों को भी उनके रीति रिवाजों और परम्परागत जीवन शैली की गारंटी भी दे रखी है।
इसी गारंटी के चलते अनुसूची-6 के पूर्वोत्तर राज्यों में संविधान का 73वां और 74वां संशोधन लागू नहीं हो सका। मोदी सरकार ने दृढ़ता का परिचय देते हुए अनुच्छेद 370 की धारा 35ए तो हटा दी मगर अनुच्छेद 371 की ए से लेकर एच तक की धाराएं अब भी ज्यों की त्यों हैं। धारा 370 हटाने के पीछे भी एक देश एक कानून की सोच थी और अब समान नागरिक संहिता के पीछे भी वही सोच है।
संविधान के 73 वें संशोधन में भी छोड़ा गया पूर्वोत्तर
बहुत संभव है कि संविधान के 73वें और 74वें संशोधन की तरह पूर्वोत्तर राज्यों को समान नागरिक संहिता में भी छूट दे दी जाए, लेकिन सवाल केवल पूर्वोत्तर का नहीं है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की कुल जनसंख्या लगभग 4.57 करोड़ दर्ज हुई थी। जबकि जनजातीय समाज जम्मू-कश्मीर से लेकर अण्डमान निकोबार और पूर्वोत्तर से लेकर गुजरात तक फैला हुआ है।
सन 2011 की जनगणना में आदिवासी जनसंख्या 10.42 करोड़ थी जो कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। इनमें ओंगे, सेंटिनली, राजी और जरावा जैसी 18 ऐसी आदिम जातियां भी हैं जिनका अस्तित्व तो खतरे में है ही लेकिन उन तक शासन प्रशासन की भी पूरी तरह पहुंच नहीं है। देश में सर्वाधिक 14.7 प्रतिशत जनजातीय आबादी मध्य प्रदेश में है।
2011 की जनगणना के अनुसार नागालैंड में 86.46 प्रतिशत मेघालय में 86.15, मीजोरम 94.4, मणिपुर 40.9, अरुणाचल में 68.8 और छत्तीसगढ़ में 30.6 प्रतिशत जनजातीय आबादी है। संथाल भारत के सबसे बड़े जनजातीय समूहों में से एक है जो मुख्यतः असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में फैले हुए हैं। इसी प्रकार भील भी सबसे बड़े जनजातीय समूहों में से एक हैं जो कि छत्तीसगढ़, गुजरात कर्नाटक, मध्य प्रदेश महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान में निवास करते हैं।
अगर देश की इतनी बड़ी जनसंख्या को समान नागरिक संहिता से अलग कर दिया जाता है तो संहिता में समानता कहां रह जाती है।
जनजातियों को परम्पराओं के निर्वाह की गारंटी
धर्म और धार्मिक परम्पराओं की आजादी की ही तरह संविधान ने जनजातीय समाज को उनकी परम्परागत प्रथाओं की आजादी की गांरटी भी दे रखी है। इसीलिए संविधान में अनुसूची-6 का समावेश किया गया है। यह गारंटी भारत की सांस्कृतिक विविधता की अनूठी धरोहर को संरक्षित रखने के लिए दी गई है। वास्तव में अपनी प्रथाओं पर कायम हमारी जनजातियां नए और प्राचीन युग के बीच की कड़ियां या सेतु हैं। हमारे संविधान निर्माता इस सेतु को हर हाल में बचाना चाहते थे। अगर जनजातियों पर समान नागरिक संहिता थोपी गई तो उनकी पहचान ही समाप्त हो जाएगी।
समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी विसंगति मातृसत्तात्मक समाज वाले मेघालय में नजर आ रही है। मेघालय के खासी और गारो समाज में विवाह, तलाक और गोद लेने की भिन्न परम्पराओं के साथ ही सम्पत्ति और उत्तराधिकार के नियम भी बिल्कुल उलट हैं। मेघालय के मातृसत्तात्मक समाज में महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं। सबसे छोटी बेटी, जिसे खद्दूह के नाम से जाना जाता है, जिसको पैतृक संपत्ति विरासत में मिलती है।
यदि किसी परिवार में बेटी का जन्म नहीं हुआ है, तो परिवार या तो एक बेटी को गोद लेता है या सबसे बड़ी महिला की बहन की बेटी को संपत्ति सौंप देता है। शादी के बाद पति अपनी सास के घर रहते हैं और पत्नी के गोत्र नाम को अपनाते हैं। बच्चे अपनी मां का उपनाम धारण करते हैं। ससुर की मौत के बाद सास को पत्नी के रूप में रखना होता है। यदि कोई जोड़ा असंगति से लेकर संतान की कमी जैसे कारणों से अलग होना चाहता है, तो वह जोड़ा बिना किसी सामाजिक कलंक या बंधन के अलग हो सकता है।
खासी कुर कबीले के अनुसार ये प्रथाएं ऐसे नियम हैं जो विरासत और संपत्ति के स्वामित्व को नियंत्रित करते हैं। वहां की खासी हिल्स ऑटोनॉमसडिस्ट्रिक्ट कांउंसिल ने समान नागरिक संहिता के विरोध में प्रस्ताव पारित किया है। इसी प्रकार नागालैंड ट्राइबल काउंसिल ने भी इस संहिता को लेकर चिंता जाई है। क्योंकि उनके यहां सामाजिक परम्पराएं भिन्न होने के साथ ही उन्हें अपनी परम्पराओं की संवैधानिक गारंटी मिली हुई है।
2011 की जनगणना के अनुसार, मेघालय की आबादी में 86.15 प्रतिशत आदिवासी थे। जिनमें खासी लोगों की आबादी लगभग 13 लाख थी।
बहुपत्नी के साथ ही बहुपति प्रथा भी जीवित है समाज में
भारत में ऐसे कुछ मातृवंशीय समाज हैं जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से मातृवंशीय पारम्परा का पालन किया है। हालांकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मातृ सत्तात्मकता की सीमा और प्रथा विभिन्न समुदायों के बीच भिन्न होती है और कई लोगों ने विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से समय के साथ अपनी परम्पराओं में बदलाव किया है। जैसे कुछ जनजातीय समाजों में बहुपत्नी प्रथा के साथ ही बहुपति प्रथा भी रही है मगर सामाजिक बदलाव के कारण बहुपति प्रथा को उन्हीं समाजों में हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है।
केरल में नायर समुदाय भी ऐतिहासिक रूप से मातृसत्तात्मक प्रणाली का पालन करता रहा है जिसे मरुमक्कथायम के नाम से जाना जाता है। हालांकि, बदलते सामाजिक मानदंडों और कानूनी सुधारों के कारण, नायरों के बीच मातृवंशीय प्रणाली काफी कम हो गई है और पितृवंशीय प्रणाली अब अधिक प्रचलित है।
अरुणाचल प्रदेश की जीरो घाटी में रहने वाला का छोटा सा अपातानी जनजाति समाज भी स्त्री प्रधान है, वहां भी संपत्ति और भूमि का स्वामित्व और प्रबंधन महिलाओं द्वारा किया जाता है। कर्नाटक का बंट और बिलावा समुदाय भी मातृसत्तात्मक माना जाता है। इनमें विरासत भले ही बहन के नाम होती है लेकिन परिवार के मुख्य निर्णय भाई ही लेता है। ऐसे बहुरंगी समाज में समान नागरिक संहिता की बात करना जितना असान है मगर लागू करना उतना ही मुश्किल है।
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