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व्हाइट हाउस से धुंध छांटने की कोशिश और सवालों के कोहरे में ढका अमेरिका
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अमेरिका में ना केवल मतदाता बल्कि पूरा मीडिया भी रिपब्लिक और डेमोक्रेट में स्पष्ट रूप से बंटा हुआ है।
- फोटो : Amar Ujala
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डोनाल्ड ट्रम्प कहीं से भी अमेरिकी राष्ट्रपति के फ़र्मे में फ़िट नहीं बैठते थे। पूरे कार्यकाल में उन्हें इसमें सेट करने की कोशिश होती रही, पर ज़िद्दी और अड़ियल रवैये वाले ट्रम्प ऐसी हर कोशिश को ना केवल ख़ारिज करते रहे बल्कि वो तो इस फ़र्मे को ही अपने हिसाब से बदल देना चाहते थे।
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दरअसल, अमेरिका को सरे आम मास्क निकाल कर फेंकने वाला राष्ट्रपति नहीं चाहिए था, इसीलिए बहुत से लोग ऐसे थे जो हर हाल में डोनाल्ड ट्रम्प को व्हाइट हाउस की चौखट से बाहर कर देना चाहते थे। वो ट्रम्प को अमेरिकी मूल्यों पर प्रहार करने वाला और विभाजनकारी मानते रहे।
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अमेरिका के एक विशेष बौध्दिक वर्ग ने जिस तरह का हमलावर रुख़ ट्रम्प को लेकर अपनाया वो चौंकाने वाला था। ये सही है कि इनमें से अधिकांश डेमोक्रेट थे, फिर भी बहुत सी निष्पक्ष आवाजें भी इस विरोध में शामिल थीं।
तीन बार के पुलित्जर विजेता थॉमस एल फ्रीडमैन ने तो जिस तरह के लेख ट्रम्प के खिलाफ लिखे वो चौंकाते तो हैं ही, भारत के संदर्भ में तो इसकी कल्पना भी कठिन है।
ये भी सही है कि अमेरिका में ना केवल मतदाता बल्कि पूरा मीडिया भी रिपब्लिक और डेमोक्रेट में स्पष्ट रूप से बंटा हुआ है। राष्ट्रहित के बड़े मसलों को छोड़ दें तो ये झुकाव साफ दिखता भी है। सन् 2000 के बाद से तो वहांं के राज्य भी नीले (डेमोक्रेट) और लाल (रिपब्लिक) के रूप में पहचाने जाने लगे हैं।
बहरहाल, अब ये तय हो गया है कि जोसेफ आर बाइडन जूनियर यानी जो बाइडन ही अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति होंगे। व्हाइट हाउस का रंग अब अगले चार साल के लिए नीला होगा। ये भी सही है कि अमेरिका में व्हाइट हाउस सचमुच में सफ़ेद कभी नहीं रहा। वो या तो नीला होगा या लाल होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि राष्ट्रपति कौन है और वो देश को किस तरीक़े से संचालित करना चाहता है।
डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में यही दिक़्क़त तो अमेरिका में हो गई। व्हाइट हाउस ना तो लाल हो पाया और न ही नीला रह पाया। व्हाइट हाउस पर दरअसल एक तरह की धुंंध सी छा गई। महत्वपूर्ण मुद्दों पर ट्रम्प का रवैया चौंकाने वाला था। उनके बयान हैरत में डाल देते थे। कोई अमेरिकी राष्ट्रपति आख़िर इतने गरिमामय पद पर बैठकर भी इस तरह की बातें कैसे कर सकता है। हालांंकि ये भी सच है कि जितनी तेज़ी से ट्रम्प विरोधी तैयार हुए उतनी तेज़ी से अमेरिका के भीतर ही उन्हें बहुत समर्थन भी मिला।
ऐसा नहीं है कि सारा अमेरिका ही ट्रम्प के विरोध में उठ खड़ा हुआ था। यह इस बात से भी साबित हो जाता है की जो बाइडन को जो सफलता मिली है वो एकतरफ़ा नहीं है, जिस नीली लहर की बात की जा रही थी वो उतनी प्रखर नहीं थी। ऐसा होता तो नतीजों के लिए चार दिन का इंतजार नहीं करना पड़ता। ऐन वक्त पर पेनसिल्वेनिया बाइडन की झोली में नहीं गिरता तो पेंच फंंस सकता था।
इलेक्टोरल वोट जीतकर व्हाइट हाउस पहुंंचने के बाद भी डेमोक्रेट सीनेट में यों पीछे नहीं रहते। इसमें ट्रम्प का अकेले का योगदान नहीं है। कट्टर रिपब्लिक समर्थक भी इसमें शामिल हैं, इसीलिए नव-निर्वाचित राष्ट्रपति के रूप में बाइडन को ये स्पष्ट रूप से कहना पड़ा कि वो सभी अमेरिकियों के राष्ट्रपति हैं - जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया उनके भी।
बाइडन और उनकी टीम जानती थी कि राह कठिन है, इसीलिए ज़बर्दस्त व्यूह रचना की गई। उनका पूरा ज़ोर इस बात पर रहा कि ट्रम्प को हटाना है। और ट्रम्प जिनकी आंख की किरकिरी थे वो सब साथ आ गए। मुहिम सफल हुई और बिडेन को ७ करोड़ से अधिक वोट मिले। उन्होंने बराक ओबामा का रिकॉर्ड तोड़ दिया। उन्हें अमेरिकी इतिहास में एक निर्वाचित राष्ट्रपति के रूप में सर्वाधिक वोट मिले। लेकिन ग़ौरतलब ये है कि ट्रम्प को भी किसी हारने वाले राष्ट्रपति के रूप में सबसे अधिक वोट मिले। मतलब उन्हें चाहने वाले भी कम नहीं हैं।
ट्रम्प के भारत प्रेम (दिखावा या सच ये विवाद अलग है) कि काट के लिए कमला हैरिस को उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया। वो कमला हैरिस जो एक समय बाइडन की कट्टर विरोधी रही हैं। वोट की राजनीति का ही तक़ाज़ा था जो कमला हैरिस के भारतीय मूल को इतनी मुखरता से रेखांकित किया गया। पुराने तार जोड़ने की कोशिश की गई।
कुल मिलाकर पिछले चार सालों में ट्रम्प ने अमेरिका के ताने-बाने को झकझोर दिया। उन्होंने गंदगी को क़ालीन के नीचे धकेल कर ऊपर जगमग दिखाने के आदि अमेरिकी समाज में, गंदगी निकालने की बजाय क़ालीन को ही खींच देने की भी कोशिश की। इस कोशिश में वो खुद अपना दामन दाग़दार कर बैठे। कोरोना से निपटने की नाकामी ने रही कसर भी पूरी कर दी।
तो व्हाइट हाउस से अब लाल को हटा कर नीला करने के साथ ही उस धुंध को छांटने की कोशिश है जो डोनाल्ड ट्रम्प के पूरे कार्यकाल में छाई रही। हालांकि इस धुंध के छंटने के बाद भी अमेरिका की रीति-नीति को लेकर ऐसे कई सवाल हैं जिनका कोहरा व्हाइट हाउस को घेरे रहेगा, तब तक, जब तक बाइडन-हैरिस की जोड़ी बहुत स्पष्ट रूप से ये नहींं बताती कि वो अमेरिका में मौजूद वर्ग भेद से कैसे निपटेंगे? कैसे वो कोरोना की चुनौती का जवाब देंगे?अर्थव्यवस्था को पटरी पर कैसे लाएंंगे? भारत के साथ कैसे संबंध होंगे? चीन को लेकर क्या रुख़ रहेगा? उम्मीद की जानी चाहिए कि वक्त के साथ सवालों का ये कोहरा भी छंंटेगा।
फ़िलहाल तो ट्रम्प सौ साल में ऐसे चौथे अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए हैं जिसे दूसरा कार्यकाल नहीं मिला। वहीं सबसे कम उम्र में सीनेटेर बनने वाले जो बाइडन अमेरिका के सबसे उम्रदराज़ राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, और कमला हैरिस पहली महिला उप-राष्ट्रपति। अमेरिका में किसी महिला को इस पद तक पहुंचने में 244 साल क्यों लगे? इस सवाल पर मंथन फिर कभी। फिलहाल तो उन्हें इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला के साथ ही ऐसा कर पाने वाली पहली अश्वेत (वो लोग कलर्ड कह रहे हैं) महिला भी कहा जा रहा है।
बराक ओबामा को राष्ट्रपति चुन कर पश्चिम के श्वेत भाल पर जो काला टीका अमेरिका ने लगाया था, अब कमला हैरिस के चुनाव ने उस श्वेत चेहरे पर डिठौने का काम किया है। उम्मीद करें कि ये और गाढ़ा होगा..!