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दूसरा पहलू: जलवायु संकट का नया खतरा, नदियों को भी लू से बचाना होगा
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सार
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नदियों पर लू का असर
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ समझ आने लगा है। नदियों का तापमान बढ़ने लगा है और उनमें लू भी चलने लगी है। मौसम की चरम घटनाओं और बढ़ते तापमान का प्रभाव न केवल नदी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है, बल्कि जलीय जीवों, जैव विविधता और मानव जीवन के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।विभिन्न अध्ययनों में सामने आया है कि दुनियाभर में नदियों की लू, अर्थात नदी के जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाने की घटनाएं और आवृत्तियां तेजी से बढ़ रही हैं। अनुमान है कि 2090 के दशक तक भारत में गंगा नदी का आधे से अधिक हिस्सा सालभर लू की चपेट में रहेगा। यह भी आशंका है कि जलवायु परिवर्तन से 21वीं सदी के आखिर तक नदियों की लू में 95 गुना तक की बढ़ोतरी हो सकती है। नदी की लू ऐसा खतरा है, जो बाढ़ और सूखे की तरह साफ-साफ दिखता भी नहीं है। यह केवल हवा के तापमान पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नदी के पानी के तापमान, झीलों और अन्य जल स्रोतों से उसके जुड़ाव, तथा भूजल व सतही जल के आपसी मिश्रण से भी प्रभावित होती है। हिमालय को ‘एशिया का वाटर टावर’ भी कहते हैं। इससे जिन नदियों को जल आपूर्ति होती है, उन पर भारत समेत विभिन्न देशों के लगभग दो अरब लोग निर्भर हैं, जो अब खतरे में है। पिछले 40 वर्षों से हिमालयी नदियां तेजी से अपनी धाराएं बदल रही हैं। चिंता की बात यह है कि हिमालय में तापमान दुनिया के औसत से लगभग दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। इससे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और जमीन के भीतर जमी बर्फ भी कमजोर पड़ रही है। इसके कारण नदियों में पानी और मिट्टी-रेत (गाद) की मात्रा बढ़ रही है। ज्यादा पानी और गाद नदियों के बहाव को अधिक शक्तिशाली बना देते हैं, जिससे वे अपने किनारों को तेजी से काटने लगती हैं। हिमालयी क्षेत्रों में नदियों के किनारों को मजबूत रखने वाले पौधे भी तेजी से कम हो रहे हैं। इससे किनारे कमजोर पड़ रहे हैं और नदियों का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक तेजी से बदल रहा है।
अगर हम नदियों को प्रदूषण और अतिक्रमण से मुक्त रखने के लिए ईमानदारी से काम करें, तो जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में मदद मिल सकती है। आखिरकार, प्रकृति की रक्षा करना हमारे अपने जीवन और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़ा है। काश, हम प्रकृति के दर्द को समय रहते महसूस कर पाते!