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दल-बदल कानून 2.O: बदलते जनादेश की नई चुनौतियां

Gunja Kapoor गुंजा कपूर
Updated Wed, 17 Jun 2026 04:35 PM IST
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सार

1999 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई। उसी वर्ष शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया।

Anti Defection Law 2.O New Challenges of a Shifting Mandate
दल-बदल कानून - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

भारतीय राजनीति में इन दिनों एक विचित्र दृश्य देखने को मिल रहा है। क्षेत्रीय दल टूट रहे हैं, नेता दल बदल रहे हैं और राजनीतिक निष्ठाएं पहले से कहीं अधिक तरल दिखाई देती हैं। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर लोकतंत्र में जनादेश का मालिक कौन है?



दल-बदल भारतीय राजनीति में कोई नई घटना नहीं है। 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने इतनी बार दल बदला कि "आया राम गया राम" भारतीय राजनीति का स्थायी मुहावरा बन गया। आने वाले वर्षों में राज्यों और केंद्र में सरकारें गिरती और बनती रहीं। 
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अंततः 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून लाना पड़ा, क्योंकि यह स्पष्ट हो गया था कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की अनियंत्रित राजनीतिक आवाजाही लोकतंत्र की स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।
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लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि उस दौर की राजनीति और आज की राजनीति में महत्वपूर्ण अंतर है। 1979 में जनता पार्टी का विघटन हुआ और चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। 1990 के दशक में वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर और गठबंधन सरकारों का दौर आया। सरकारें बनीं और गिरीं, लेकिन राजनीतिक पुनर्संरचना का बड़ा हिस्सा वैचारिक मतभेदों, नेतृत्व संघर्षों और संसदीय समीकरणों से जुड़ा था।

1999 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई। उसी वर्ष शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया। इन नेताओं ने केवल दल नहीं बदला; उन्होंने नया राजनीतिक मंच बनाया और अंततः जनता से नया जनादेश प्राप्त किया। मतदाता को यह अधिकार दिया गया कि वह उनके नए राजनीतिक मार्ग पर मोहर लगाए या उसे खारिज कर दे।

आज का भारत एक अलग राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है। पिछले तीन दशकों में चुनाव पहले की तुलना में कहीं अधिक नेतृत्व-केंद्रित और व्यक्तित्व-आधारित हो गए हैं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर करिश्माई नेताओं की भूमिका बढ़ी है, जबकि स्थानीय प्रतिनिधियों की व्यक्तिगत पहचान अपेक्षाकृत कम हुई है।

अधिकांश मतदाता अपने स्थानीय प्रतिनिधि से अधिक दल, चुनाव चिन्ह और शीर्ष नेतृत्व के आधार पर मतदान करते हैं। कई चुनावों में मतदाता स्थानीय उम्मीदवार को नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक कथा को वोट देता है जिसका वह उम्मीदवार प्रतिनिधित्व करता है।

उदाहरण के लिए, आज व्यापक रूप से यह माना जाता है कि बड़ी संख्या में मतदाता स्थानीय उम्मीदवार से अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, उनकी छवि और उनके नाम पर मतदान करते हैं। यही प्रवृत्ति विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के करिश्माई नेताओं के साथ भी दिखाई देती है। ऐसे में निर्वाचित प्रतिनिधि का जनादेश केवल उसका व्यक्तिगत जनादेश नहीं रह जाता; वह दल, चुनाव चिन्ह और नेतृत्व से गहराई से जुड़ जाता है।

यही कारण है कि चुनाव चिन्ह का महत्व पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है। मतदाता अक्सर व्यक्ति से पहले कमल, पंजा, साइकिल, झाड़ू या अन्य चुनाव चिन्ह को पहचानता है। यदि मतदाता का निर्णय बड़े पैमाने पर दल और नेतृत्व से प्रभावित है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या निर्वाचित सीट को किसी व्यक्ति की निजी राजनीतिक पूंजी माना जा सकता है?

सांसद और विधायक किसी निजी कंपनी के कर्मचारी नहीं होते, जो बेहतर अवसर मिलने पर नौकरी बदल लें। वे भारत की जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं। उन्हें जो शक्ति मिली है, वह किसी कॉरपोरेट बोर्ड ने नहीं, बल्कि करोड़ों मतदाताओं ने दी है। इसलिए जब कोई सांसद या विधायक दल बदलता है, तो प्रश्न केवल उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नहीं होता, बल्कि उस जनादेश का भी होता है, जिसे जनता ने उसे सौंपा था।

यदि कोई नेता वास्तव में मानता है कि उसकी पुरानी पार्टी अब उसके विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करती, तो लोकतांत्रिक मर्यादा का तकाजा यह होना चाहिए कि वह पहले इस्तीफा दे और फिर जनता के बीच जाकर नया जनादेश मांगे।

यदि जनता उसके निर्णय से सहमत होगी, तो वह उसे पुनः चुन लेगी। लेकिन यदि कोई नेता दल भी बदल ले और सीट भी अपने पास रखे, तो यह नैतिक रूप से उस जनादेश का हस्तांतरण है, जिसकी अनुमति मतदाता ने कभी दी ही नहीं थी।

शायद समय आ गया है कि दल-बदल विरोधी कानून पर नए सिरे से विचार किया जाए। 1985 का कानून उस दौर की राजनीति के लिए बनाया गया था। लेकिन यदि आज चुनाव में दल, चुनाव चिन्ह और शीर्ष नेतृत्व की भूमिका पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है, तो क्या यह उचित नहीं होगा कि जिस प्रतिनिधि ने किसी दल के चिन्ह पर चुनाव जीता है, उसके दल बदलते ही सीट स्वतः रिक्त मानी जाए और उसे दोबारा जनता के बीच जाना पड़े?

लोकतंत्र में जनता पाँच वर्ष के लिए किसी व्यक्ति को खुला चेक नहीं देती। वह एक विचार, एक दल, एक नेतृत्व और एक राजनीतिक वादे पर भरोसा करती है। जनादेश जनता का होता है, प्रतिनिधि का नहीं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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