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संस्कृति के पन्नों से: सावित्री की ओर बार-बार देखने पर भी ब्रह्मा क्यों नहीं हुए दोषी? पुराणों में छिपा रहस्य
आशुतोष गर्ग, लेखक एवं अनुवादक
Published by: Shivam Garg
Updated Sun, 15 Mar 2026 07:01 AM IST
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सार
जैसे सूर्य अपनी छाया से अलग नहीं होता, वैसे ही गायत्री ब्रह्मा जी से अलग नहीं होतीं। ब्रह्मा वेदस्वरूप हैं और सावित्री उनकी अधिष्ठात्री देवी। इसलिए ब्रह्मा जी को सावित्री की ओर दृष्टि करने से कोई दोष नहीं लगा।
सावित्री की ओर देखने पर भी ब्रह्मा क्यों नहीं हुए दोषी?
- फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार
एक बार वैवस्वत मनु ने भगवान से प्रश्न किया कि ब्रह्मा जी के पांच मुख कैसे उत्पन्न हुए और अपनी ही पुत्री को बार-बार देखने पर भी उन्हें दोष क्यों नहीं लगा? भगवान ने उत्तर देते हुए कहा, ‘जब ब्रह्मा जी ने जगत की सृष्टि की इच्छा से सावित्री देवी का ध्यान किया, तो जप करते-करते उनका शरीर पुरुष व स्त्री, दो भागों में विभक्त हो गया। स्त्री सरस्वती कहलाईं और आगे चलकर वही शतरूपा के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उसी रूप को सावित्री, गायत्री और ब्रह्माणी भी कहा जाता है।’
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उन्होंने आगे बताया कि ब्रह्मा जी ने सावित्री को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया, परंतु सावित्री के अद्भुत सौंदर्य को देखकर ब्रह्मा जी का चित्त विचलित हो उठा। उनका मन बार-बार सावित्री की ओर आकर्षित होने लगा। सावित्री ने जब अपने पिता ब्रह्मा की प्रदक्षिणा की, तो सावित्री के रूप को हर दिशा से देखने की इच्छा के कारण ब्रह्मा जी के मुख के दाहिनी ओर एक नया मुख प्रकट हो गया, जिसके गंडस्थल पीले वर्ण के थे। इसके बाद पीछे की ओर एक तीसरा मुख प्रकट हुआ, जिसके होंठ विस्मय से फड़क रहे थे। फिर बाईं ओर एक चौथा मुख प्रकट हुआ, जो कामदेव के बाणों से व्यथित दिखाई देता था।
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इस प्रकार ब्रह्मा जी के चार मुख हो गए, परंतु सावित्री की ओर बार-बार देखने के कारण ब्रह्मा जी ने सृष्टि के लिए जो महान तप किया था, उसका फल नष्ट हो गया। उसी कर्म के परिणामस्वरूप उनके मुख के ऊपर एक पांचवां मुख प्रकट हुआ, जो जटाओं से आच्छादित था। भगवान ब्रह्मा जी ने उस पांचवें मुख को भी स्वीकार कर लिया।
उनके जाने के बाद ब्रह्मा जी ने शतरूपा का पाणिग्रहण कर लिया। कालांतर में शतरूपा के गर्भ से मनु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो स्वायंभुव मनु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसे विराट भी कहा जाता है। स्वायंभुव ब्रह्मा जी के समान रूप-गुण होने के कारण अधिपुरुष भी कहा गया है। उसी ब्रह्मवंश में आगे सात-सात के क्रम में अनेक मनु उत्पन्न हुए-जैसे स्वारोचिष, औत्तमि आदि, जो सभी भगवान ब्रह्मा के ही समान तेजस्वी और नियम परायण थे। उन्हीं में वर्तमान समय के तुम सातवें, यानी वैवस्वत मनु हो।
यह सुनकर मनु ने फिर प्रश्न किया, ‘हे भगवन! पुत्री की ओर बार-बार दृष्टि डालना तो अत्यंत निंदनीय कर्म है, फिर ऐसा करने पर भी ब्रह्मा जी दोष के भागी क्यों नहीं हुए? कृपा करके मेरे इस संशय को दूर कीजिए।’ तब भगवान बोले, ‘राजन! रजोगुण से उत्पन्न शतरूपा आदि-सृष्टि दिव्य । जैसे मूल प्रकृति की इंद्रियां इंद्रिय-विषयों से परे हैं, वैसे ही इस शतरूपा का शरीर भी इंद्रियातीत है। वह दिव्य तेज और दिव्य ज्ञान से उत्पन्न हैं, इसलिए सामान्य मनुष्यों की दृष्टि और बुद्धि से उसका पूर्ण वर्णन संभव नहीं है। जिस प्रकार सर्पों के मार्ग को केवल सर्प ही जानते हैं और पक्षियों के मार्ग को केवल आकाशचारी पक्षी, उसी प्रकार दिव्य जीवों के मार्ग को केवल वही समझ सकते हैं, मनुष्य नहीं। इसलिए देवताओं के कार्यों को मानव-बुद्धि से परखना उचित नहीं है, क्योंकि देवताओं के कार्य शुभ-अशुभ फल देने वाले नहीं होते।
इसका दूसरा कारण यह है कि जैसे ब्रह्मा जी वेदों के अधिष्ठाता हैं, वैसे ही शतरूपा या गायत्री उनके अंग से उत्पन्न मानी गई हैं। इस कारण यह युगल कभी अमूर्त, तो कभी मूर्त रूप में वर्णित किया जाता है। जहां-जहां ब्रह्मा हैं, वहां-वहां सरस्वती या गायत्री भी हैं और जहां-जहां गायत्री हैं, वहां ब्रह्मा। जैसे सूर्य अपनी छाया से अलग नहीं होता, वैसे ही गायत्री ब्रह्मा से अलग नहीं होतीं। ब्रह्मा वेदस्वरूप हैं और सावित्री उनकी अधिष्ठात्री देवी। इसलिए ब्रह्मा जी को सावित्री की ओर दृष्टि करने से कोई दोष नहीं लगा। फिर भी जब ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास हुआ, तो वह अपने आचरण पर लज्जित भी हुए थे।