इतिहास की गलियों से वर्तमान तक का सफर
1948 की 12 जनवरी थी! अभी-अभी आजाद हुए देश की राजधानी दिल्ली का बिरला भवन। आज बापू का मौन दिवस था, लेकिन यह दूसरे मौन दिवसों से कुछ अलग था, क्योंकि बापू कहीं भीतर ही गुम थे। प्रार्थना खत्म हुई। उलझते-से पांवों से वह अपने कमरे की ओर चले। मनु ने ओढ़ाकर सुला दिया। बापू सोए नहीं, उठ बैठे और कुछ लिखने लगे।
जो लिखा, उसका अनुवाद सुशीला नैयर करती थीं। सुशीला जी ने पढ़ना शुरू किया कि अचानक वह चीख पड़ीं : अरे, मनु, देख यह क्या! बापू तो कल से अनशन पर जा रहे हैं !! उपवास फिर? अभी ही तो बमुश्किल छह माह पहले कोलकाता का वह भयंकर उपवास हुआ था।
बात जंगल में आग की तरह फैल गई। सरदार, जवाहर, राजेन बाबू, मौलाना, देवदास सभी एक-पर-एक पहुंचने लगे। किसी के पास कहने को कुछ नहीं था, लेकिन यह सबको पता था कि यह बूढ़ा आदमी नहीं रहा, तो किसी के बस का कुछ भी नहीं रह जाएगा।
मौन पूरा हुआ। बापू ने कहा : पंजाब जाने के लिए आया था यहां, लेकिन देखा कि दिल्ली तो वह दिल्ली बची नहीं है। दिल्ली हाथ से निकली, तो हिंदुस्तान निकला समझिए! मैंने देखा कि हिंदू, मुसलमान, सिख एक-दूसरे के लिए पराए हो चुके हैं। जो मिला, उसी ने बताया कि दिल्ली में मुसलमानों का रह पाना अब संभव नहीं है। ऐसी लाचारी के साथ जीना तो मैं कभी कबूल न करूं। मेरा उपवास लोगों की आत्मा को जाग्रत करने के लिए है, उसे मार डालने के लिए नहीं।
ऐसी पृष्ठभूमि में शुरू हुआ उपवास 18 जनवरी, 1948 तक यानी छह दिनों तक चलता रहा। वायसरॉय, भारत सरकार और सारा भारत सारे दिन-रात यहीं के चक्कर काटता मिलता था। बापू रोज सुबह साढ़े तीन बजे उठते और नौ बजे सोने जाते। लेकिन उपवास कैसे छूटे? बापू ने इसकी सात शर्तें सामने कर दीं :
1. महरौली में स्थित ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तयार की मजार महफूज रहेगी और मुसलमानों को वहां आने-जाने में कोई खतरा नहीं होगा। आने वाला उर्स का मेला पहले की तरह ही लगेगा और महरौली के हिंदू-सिख इसकी गारंटी दें कि वहां मुसलमानों को कोई खतरा नहीं होगा।
2. दिल्ली की 117 मस्जिदों पर हिंदू-सिख शरणार्थियों ने कब्जा कर लिया है या उन्हें मंदिर में बदल लिया है। वे सब मुसलमानों को वापस कर दी जाएं और वहां के हिंदू-सिख यह भरोसा दिलाएं कि सभी मस्जिदें पहले जैसी ही रहेंगी और मुसलमान वहां बेखटके आ-जा सकेंगे।
3. करोलबाग, सब्जी मंडी और पहाड़गंज में मुसलमान आजादी से आ-जा सकें और उन्हें कोई खतरा न हो।
4.जो मुसलमान डर से या परेशान होकर पाकिस्तान चले गए हैं, वे अगर वापस आकर फिर से बसना चाहें, तो हिंदू-सिख उसमें बाधा न बनें।
5. रेलों में सफर करने वाले सुरक्षित सफर कर सकें।
6. मुसलमान दुकानदारों का बहिष्कार न किया जाए।
7. दिल्ली शहर के जिन इलाकों में मुसलमान रहते हैं, वहां हिंदू-सिखों के बसने का सवाल वहां के मुसलमानों की रजामंदी पर छोड़ दिया जाए। 18 जनवरी को भावावेश में कांपती आवाज में कांग्रेस के सभापति राजेंद्र प्रसाद ने बापू के कमरे में मौजूद दिल्ली के आला प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कहा : सबने उन बातों की गारंटी दी है, जिनका जिक्र आपने हमसे किया है। बापू ने अपनी बात लिखवाई, जिसे प्यारेलाल जी ने पढ़कर सुनाया : यह मुझे अच्छा तो लगता है, मगर...इस मसविदे का अगर यह अर्थ है कि दिल्ली को आप सुरक्षित रखेंगे और बाहर चाहे जितनी भी आग जले, आपको परवाह न होगी, तो आप बड़ी गलती करेंगे और मैं भी उपवास छोड़कर मूर्ख बनूंगा। मैं देखता हूं कि ऐसा दगा आज हिंदुस्तान में बहुत चलता है।...यह कहना, कि हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं का है और पाकिस्तान सिर्फ मुसलमानों के लिए है, तो इससे बड़ी बेवकूफी क्या हो सकती है!
12.25 मिनट पर काल जर्जरित काया को मौलाना आजाद ने 12 औंस ग्लूकोज मिला रस पिलाया। कितने सारे लोग रो रहे थे। जवाहरलाल रो रहे थे कि हंस रहे थे, कहना कठिन था। वह इस पूरी अवधि में मौन ही रहे थे-पीड़ा में और संभवत: इस ग्लानि में कि यह आजाद भारत था, यह उनकी सरकार थी और छह माह के भीतर बापू को ऐसी पीड़ा से गुजरना पड़ा।
कोई सौ बुर्काधारी मुसलमान महिलाएं बापू से कहने आई थीं कि आप उपवास तोड़िए। बापू ने कहा : मेरे सामने क्या बुर्का? मैं तो आपका बाप-भाई हूं। बहनों ने तुरंत बुर्का निकाल दिया। इंदिरा गांधी ने बापू से कहा : पंडितजी भी आपके साथ अनशन कर रहे हैं! जाते कदम रुके, बापू ने एक कागज मंगवाया और अशक्त हाथों से लिखा : चिरंजीव जवाहरलाल, अनशन छोड़ो! बहुत वर्ष जियो, हिंद के जवाहर बने रहो।
यह हमारे इतिहास का हिस्सा है या कि यही हमारा वर्तमान है? समाज को भीड़ बनाकर, इंसानों को पागलों की जमात बनाकर जब सत्ता और संपत्ति का शिकार किया जा रहा हो, तब एक आदमी के बस का बचता ही क्या है, भले वह आदमी महात्मा गांधी ही हो? बच रहता है यही आत्मबलिदान!! बापू का यह उपवास, जिसे हमने उनका अंतिम उपवास बना दिया, कि जिसके बारह दिन बाद हमने उनका अंत ही कर दिया।
हमारे भीतर जो खो गया है, सो गया है, उन्मादियों ने जिसे जहरीला बना दिया है, उस पर विवेक की बूंदें गिराने का यह उपक्रम था। आज भी कुछ ऐसा ही दौर लौटता लगता है। क्या इसे ही इतिहास का दोहराना कहते हैं? अगर यह इतिहास का यांत्रिक दोहराव मात्र है, तब तो बहुत
फिक्र नहीं, क्योंकि तब तो बापू भी होंगे ही कहीं दोहराने के लिए। लेकिन नहीं, ऐसी कार्बन कॉपियां इतिहास में चलती ही नहीं हैं। हर दौर को अपना गांधी खुद ही पैदा करना पड़ता है।

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