जब गांधी ने पूछा- अंग्रेज जब चले जाएंगे, तो क्या इतिहास से उन्हें मिटा देना संभव होगा?
लेखक-राजनीतिक के एम मुंशी ने 1945 में महात्मा गांधी के पास अपने ऐतिहासिक उपन्यास पृथ्वीवल्लभ की एक प्रति भेजी। गांधी ने दिलचस्पी के साथ इसे पढ़ा, लेकिन वह कुछ उलझन में पड़ गए। उन्होंने मुंशी से कहाः एक इतिहासकार के रूप में आप क्या मुस्लिम इतिहास को पूरी तरह से भूल सकते हैं?
यदि ऐसा है, तो भी क्या आप सारे भारत को इसे भूलने के लिए राजी कर सकते हो? क्या आप पानी की धारा को उलटा कर सोच सकते हो कि वह आगे की ओर बहने लगे? अंग्रेज जब चले जाएंगे, तो क्या इतिहास से अंग्रेजों के संबंधों के कारण जो परिणाम हुए उन्हें पूरी तरह मिटा देना संभव होगा?
गांधी की यह टिप्पणी आज एकदम प्रासंगिक है, जब केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारें भारत पर मुस्लिमों और अंग्रेजों के प्रभाव से संबंधित हर निशान को मिटा देना चाहती हैं। वास्तव में वह एक कदम आगे जाकर स्वतंत्रता संग्राम के कुछ मुख्य किरदारों को बेदखल कर उनकी जगह हिंदुत्व के प्रतीकों (एम एस गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय आदि) को स्थापित करना चाहती हैं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में कोई भूमिका नहीं निभाई थी।
राष्ट्रीय आंदोलन की अन्य विभूतियों, मसलन अरबिंदो, नेहरू और राजाजी, की तुलना में गांधी उतने विद्वान नहीं थे। उनका अध्ययन व्यापक और गहन होने के बजाय अव्यवस्थित था। उन्होंने जो किताबें पढ़ी थीं, उनका रुझान इतिहास पर केंद्रित न होकर धार्मिक और नैतिक किस्म का था। हालांकि गांधी जी के लेखन में इतिहास लेखन के कुछ दिलचस्प अक्स भी मिलते हैं।
लिहाजा, 1909 में लिखी गई अपनी किताब हिंद स्वराज में गांधी ने आकलन किया कि इतिहासकारों ने अहिंसा के बजाय हिंसा पर कहीं अधिक ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने टिप्पणी की कि, 'सैकड़ों देश शांति के साथ रह रहे हैं, इतिहास न तो इस तथ्य को दर्ज कर सकता है और न ही न ही करेगा।'
इतिहासकार रक्त के फैलाव से आक्रांत थे, गांधी हालांकि मानते थे कि इतिहास भर में, अहिंसा ने हिंसा से मानवीय मामलों को आकार देने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाई थी। जैसा कि उन्होंने कहा, 'अहिंसा की सफलता का सबसे बड़ा और सबसे अचूक सबूत इस तथ्य में पाया जा सकता है कि, दुनिया के युद्धों के बावजूद, यह अब भी कायम है'।
इतिहास लेखन की प्रभावशाली 'सबअल्टर्न स्टडीज' (ऐसे दक्षिण एशियाई विद्वानों का समूह जिनकी दिलचस्पी उत्तर औपनिवेशिक अध्ययन में है) से संबंधित इतिहासकार तर्क देते हैं कि राजाओं और जनरलों की तुलना में कामगारों और किसानों का जीवन कहीं अधिक महत्वपूर्ण था।
गांधी ने इसके पचास वर्ष पूर्व ही सबअल्टर्न स्टडीज का पूर्वानुमान कर लिया था। ऑक्सफोर्ड के विद्वान वेरियर एल्विन से मई, 1931 में बातचीत करते हुए गांधी ने कहा, 'हमें हमारी इतिहास की किताबों को फिर से लिखना होगा। इतिहास ने राजाओं के कृत्यों का दस्तावेज तैयार करना बंद कर दिया है और यह लोगों के कृत्यों का दस्तावेज बनकर रह गया है, लेकिन यह लोगों के हिंसक कृत्यों का दस्तावेज है।'
इतिहासकारों को खास आदमी के बजाए आम आदमी के बारे में लिखना पड़ा और उन्हें तोपों, बंदूकों और बमों के जरिये लड़ी गई लड़ाइयों ही नहीं, अहिंसा पर आधारित संघर्ष को भी रिकॉर्ड करना पड़ा। इस बीच, गांधी ने भी स्पष्ट तौर पर इतिहास और मिथक के बीच फर्क किया।
जैसा कि उन्होंने 1930 में लिखा, 'हमारे लिए महाभारत और रामायण ऐतिहासिक कार्य नहीं, बल्कि धार्मिक प्रबंध हैं। या फिर, यदि हम उन्हें इतिहास कहें, तो वह मानव आत्मा के इतिहास का वर्णन करते हैं; ये हमें यह नहीं बताते कि हजारों वर्ष पहले क्या हुआ था, बल्कि यह बताते हैं कि आज प्रत्येक मनुष्य के दिल में क्या कुछ घटित होता है।'
गांधी ने इस चीज की शिनाख्त की कि इतिहासकारों के लिए अपने राष्ट्रीय या सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना संभव नहीं होता। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने खुद के विश्वविद्यालय गुजरात विद्यापीठ की अहमदाबाद में स्थापना की थी। जून, 1928 में विद्यापीठ में गांधी ने अपने एक भाषण में कहा, शिक्षकों को विचार करना चाहिए कि भारत का इतिहास कैसा हो सकता है। कोई फ्रांसीसी भारत का इतिहास अलग ढंग से लिखेगा; ऐसा ही कोई अंग्रेज करेगा।
कोई भारतीय मूल दस्तावेजों को देखकर और भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद लिखेगा तो वह निश्चित रूप से अलग होगा। क्या आप एंग्लो-फ्रेंच विवाद पर अंग्रेजों के लेखन को पूरी तरह से सच मानते हैं? जिसने भी इसे लिखा होगा, संभव है कि उसने सही लिखा हो, लेकिन यह उसके नजरिये से लिखा गया। वह सिर्फ उन घटनाओं के बारे में बताएगा, जिनमें अंग्रेजों की जीत हुई। हम भी ऐसा करेंगे। फ्रांसीसी भी ऐसा करेंगे।
गांधी ने इस पक्षपात की शिनाख्त कर ली थी, लेकिन उन्होंने इसे बढ़ावा नहीं दिया। वह हर तरह के विचार और गतिविधियों में अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ थे, जिसमें इतिहास लेखन भी शामिल है। यदि हिंदुओं ने अपने अतीत को महिमामंडित करने के लिए या फिर इतिहास में अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए कुछ लिखा तो वह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है, जितना मुगलों और अंग्रेजों का इसी तरह का काम।
मार्च, 1945 में गोप गुरुबक्षाणी नामक एक संवाददाता ने गांधी से पूछा था, कोई इतिहासकार अपने देश की सबसे अच्छी तरह से सेवा किस तरह से कर सकता है और वह भारत का प्रगतिशील इतिहास कैसे लिख सकता है?
गांधी ने इस प्रश्न का जवाब इस तरह से दिया, वह ऐसा लोगों के सच्चे और मूल इतिहास को लिखकर कर सकता है। यदि कोई प्रगति हुई है, तो वह इसका वर्णन करेगा और यदि वह पाता है कि गिरावट आई है, तो उसे उसी तरह से दर्ज करेगा। गांधी का यह मत आज भी प्रासंगिक है, जैसा कि सत्तर साल पहले था। इतिहासकार के स्रोत जितना व्यापक होंगे उसका काम उतना ही मौलिक होगा। वह तथ्यों को जितना कम दबाएगा (जिनमें उसके समुदाय या देश से संबंधित अप्रिय तथ्य भी होंगे), उसका काम उतना ही सच्चा होगा।
इतिहास के साथ की जा रही मौजूदा छेडछाड़ को गांधी संकीर्ण राजनीतिक हित साधने वाला बताकर अफसोस करते। मैंने उनकी जिन टिप्पणियों का यहां जिक्र किया है, वे दिखाती हैं कि गांधी चाहते थे कि इतिहासकार अंधराष्ट्रवाद और विजयोन्माद से परहेज करें। उनके दृष्टिकोण में कोई भी धर्म या राष्ट्र, कोई भी संस्कृति या सभ्यता त्रुटिहीन नहीं है। गांधी के दृष्टिकोण में मुस्लिमों की कीमत पर हिंदुओं को या फिर अंग्रेजों की कीमत पर भारतीयों को श्रेष्ठ बताने वाला इतिहास से संबंधित कोई भी कार्य विद्वतापूर्ण नहीं, बल्कि कट्टरता को प्रदर्शित करेगा।

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