फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   A historic verdict of supreme court of India against torture in custody

हिरासत में यातना के विरुद्ध एक ऐतिहासिक फैसला 

Sat, 26 Dec 2020 10:00 AM IST
Ravindra Dubey रवीन्द्र दुबे
Updated Sat, 26 Dec 2020 10:00 AM IST
विज्ञापन
सार
थानों व जांच एजेंसियों के दफ्तरों में सीसीटीवी कैमरे लगाने से भ्रष्टाचार कम होगा और नौकरशाही पर भी एक हद तक अंकुश लगेगा।
 
loader
A historic verdict of supreme court of India against torture in custody
custody - फोटो : ANI

विस्तार

सर्वोच्च न्यायालय ने विगत दो दिसंबर को एक ऐतिहासिक फैसले के तहत केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि केंद्रीय जांच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस और अन्य जांच एजेंसियों के, जिन्हें जांच और गिरफ्तारी करने का अधिकार है, जो पूछताछ करती है, और जहां पुलिस थाने की तरह आरोपितों को रखा जाता है, ऑफिस में सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाए जाएं। सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हर पुलिस थाने, सभी प्रवेश एवं निकास द्वार, मुख्य द्वार, लॉकअप, कॉरिडोर, लॉबी और रिसेप्शन के साथ-साथ लॉकअप रूम के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगाने हेतु कहा, ताकि कोई स्थान कैमरे की जद से न छूट जाए। सीसीटीवी सिस्टम में ऑडियो-वीडियो फुटेज के साथ नाइट विजन उपकरण भी होने चाहिए। अदालत ने कहा कि वे ऐसी प्रणालियों की खरीद करें, जिसमें न्यूनतम एक साल के लिए स्टोरेज क्षमता हो।



शीर्ष अदालत ने वर्ष 2018 में मानवाधिकार का उल्लंघन रोकने के लिए सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था। विगत सितंबर में उसने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने पिछले आदेश के मुताबिक हर थाने में सीसीटीवी कैमरे के वास्तविक स्थान और ओवरसाइट कमेटियों के गठन के बारे में बताने के लिए कहा था। पीठ ने कहा कि विगत 24 नवंबर तक 14 राज्यों द्वारा अनुपालन का हलफनामा और कारवाई रिपोर्ट दाखिल की गई। इनमें भी ज्यादातर राज्य पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे का वास्तविक स्थान और अन्य विवरण बताने में विफल रहे। अदालती गतिविधियों पर नजर रखने वाली वेबसाइट लाइव लॉ डॉट इन के मुताबिक, अदालत ने यह निर्देश परमवीर सिंह सैनी द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटीशन का निपटारा करते हुए जारी किए, जिसमें बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग और पुलिस थाने में सीसीटीवी कैमरा लगाने के मुद्दे उठाए गए थे। अदालत ने यह भी जोड़ा कि सुदूर क्षेत्रों में यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि थाने में बिजली और इंटरनेट की व्यवस्था करे। इंटरनेट की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें तस्वीर और ऑडियो साफ आ सके। 


आदेश में यह भी कहा गया है कि हिरासत में यातना और मौत की पुलिस के खिलाफ शिकायत वाले मामले को देख रही अदालतें और मानवाधिकार आयोग थाने से इन सीसीटीवी फुटेज की मांग कर सकते हैं। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि सीआरपीसी के तहत गवाह के बयान की रिकॉर्डिंग भी एक शर्त (अनिवार्य नहीं) है। शीर्ष अदालत ने कहा कि विगत सितंबर में उसने अप्रैल, 2018 के अपने आदेश के अनुरूप प्रत्येक थाने में सीसीटीवी कैमरा लगे होने के थाने और निगरानी समिति के गठन के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसमें पक्षकार बनाया था। अदालत ने हिरासत में यातनाओं से संबंधित मामले पर विचार करते हुए विगत जुलाई में 2017 के उस अदालती आदेश का संज्ञान लिया था, जिसमें मानवाधिकार का दुरुपयोग रोकने और घटनास्थल की वीडियोग्राफी करने के लिए सभी थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने और एक केंद्रीय निगरानी समिति तथा प्रत्येक राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश में निगरानी समिति गठित करने का आदेश दिया गया था। 

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के परिणाम दूरगामी हैं। इससे भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकेगी, और नौकरशाही पर कुछ तो अंकुश लगेगा। थानों में सीसीटीवी कैमरे लगने से पुलिस हिरासत में दी जाने वाली यातनाओं और होने वाली मौत का सिलसिला थमेगा। राजनीतिक रसूख का प्रदर्शन चूंकि पुलिस के माध्यम से ही किया जाता है, लिहाजा राजनेता पुलिस का दुरुपयोग नहीं कर पाएंगे। पर जैसा कि अक्सर होता आया है, नियम कहीं पर रह जाता है और उसका अनुपालन कहीं और। कई मामले में कानून तो बाद में बनता है, उसमें गलतियां पहले से ही निकाल ली जाती हैं। बेलगाम अफसरशाह अपनी सत्ता कैसे छिन जाने देगी, यह देखना दिलचस्प होगा। अदालत का फैसला आए करीब पौने तीन साल बीत चुके हैं। पूरे देश में इसके क्रियान्वयन में कितना वक्त लगता है, यह देखना अभी शेष है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed