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ये आकाशवाणी है: भारत की सामूहिक स्मृति की आवाज

Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 08 Jun 2026 07:25 AM IST
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सार

नौ दशकों की यह यात्रा सिर्फ प्रसारण का इतिहास नहीं, बल्कि देश की स्मृतियों, संस्कारों और संवाद का ऐसा दस्तावेज है, जिसने पीढ़ियों को जोड़ा है।

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ऑल इंडिया रेडियो - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

आकाशवाणी के इतिहास में जून की दो तारीखों का विशेष महत्व है। तीन जून के दिन आकाशवाणी के जरिये देश के इतिहास ने करवट ली थी, जबकि दिल्ली के अलीपुर इलाके के अस्थायी दफ्तर में आठ जून, 1936 को आकाशवाणी की शुरुआत ‘ऑल इंडिया रेडियो’ के रूप में हुई थी। भारतीय प्रसारण की ठोस बुनियाद रखने का श्रेय बीबीसी के पूर्व अधिकारी लायनेल फील्डन को जाता है, जिन्हें इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने भारत बुलाकर एक जनवरी, 1936 को प्रसारण नियंत्रक के पद पर तैनात किया। उनकी ही अगुआई में दिल्ली के अलीपुर के पांच कमरों के एक अस्थायी दफ्तर से आठ जून, 1936 को आकाशवाणी का प्रसारण शुरू हुआ। तब से लेकर तीन मई, 2023 तक ऑल इंडिया रेडियो के नाम से जाना जाता रहा। फिर आधिकारिक रूप से इसका नाम  केवल आकाशवाणी कर दिया गया। 


इसके नाम के बारे में लायनेल फील्डन ने अपनी पुस्तक नेचुरल बेंट में लिखा है कि उन्हें इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस नाम नहीं जम रहा था। एक समारोह में लायनेल ने इस नाम को लेकर उनसे चर्चा की। तब तक देश में ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट’ आ चुका था। लायनेल की राय थी कि इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग नाम इस अधिनियम के अनुरूप नहीं है, लिहाजा चर्चा के बाद नया नाम दिया गया, ऑल इंडिया रेडियो। इसी ऑल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम महान गीतकार पं. नरेंद्र शर्मा ने 1956 में दिया था। रेडियो के लिए आकाशवाणी शब्द का प्रयोग 1939 में रवींद्रनाथ टैगोर ने भी किया था। पहले आकाशवाणी पर शुरू में गीत-संगीत के लिए शास्त्रीय कलाकार नहीं आते थे, तवायफें और उनके संगतकार ही आते थे। रेडियो पर हारमोनियम पर प्रतिबंध था, जिसे 1970 में हटाया गया। आकाशवाणी को क्लासिकल बनाने में सूचना और प्रसारण मंत्री वी बी केसकर और आकाशवाणी के तत्कालीन महानिदेशक, प्रसिद्ध लेखक एवं आईसीएस अधिकारी जगदीश चंद्र माथुर की जोड़ी का बड़ा योगदान रहा। केसकर ने आकाशवाणी पर स्तरीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के प्रयास किए। तब रेडियो से हर भाषा के लेखकों को जोड़ा गया, जिससे रेडियो की भाषा को स्तरीय बनाने की कोशिशें हुईं।
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तीन जून, 1947 की सांझ आकाशवाणी के जरिये ही दुनिया को देश के बंटवारे का संदेश दिया गया था। स्वाधीनता के समय नौ रेडियो केंद्र थे। बंटवारे के बाद तीन पाकिस्तान को मिले, जबकि छह भारत के पास रह गए। देश के पहले सूचना और प्रसारण मंत्री सरदार पटेल ने रेडियो का महत्व समझते हुए उसके तेज विकास की नींव रखी। भारत में रेडियो पर पहली न्यूज बुलेटिन 19 जनवरी, 1936 को प्रसारित हुई। सवाल है कि जब ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना ही आठ जून, 1936 को हुई, तो उसके छह महीने पहले न्यूज बुलेटिन की शुरुआत कैसे हुई। दरअसल, इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग कंपनी प्रायोगिक तौर पर प्रसारण जारी रखे हुए थी। आज आकाशवाणी का समाचार सेवा प्रभाग 82 भाषाओं और बोलियों में रोजाना लगभग 510 से ज्यादा बुलेटिन प्रसारित करता है।
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आकाशवाणी ने खेती-किसानी को सहयोग देने के लिए 1965 में अलग से फॉर्म एंड होम यूनिट शुरू की, जिसके जरिये खेती की जानकारी के साथ ही लोकगीत आदि प्रसारित होने लगे। 1962 के युद्ध के वक्त जवानों में जोश भरने के लिए शुरू जयमाला कार्यक्रम की पहली प्रस्तोता नरगिस दत्त रहीं। बाद में लता, आशा और मुकेश जैसी हस्तियों ने भी इसे प्रस्तुत किया।

रेडियो की कुछ आवाजों का जिक्र न हो तो कहानी पूरी नहीं हो सकती। मेल्विल डी मेलो की बुलंद आवाज ने 1948 में महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा का लगातार सात घंटे तक कमेंट्री करके इतिहास रचा था। देवकी नंदन पांडे और रामानुज प्रसाद सिंह की गंभीर व सधी हुई आवाजें समाचारों की विश्वसनीयता का पर्याय बनीं। महिला समाचार वाचकों में विनोद कश्यप को ‘बुलंद आवाज’ और बेबाकी के लिए जाना जाता है। जसदेव सिंह, विजय डैनियल्स और सुशील झवेरी जैसे दिग्गजों की आवाज भी आकाशवाणी की पहचान रही।

जम्मू-कश्मीर पर कबायली हमलों के बाद आकाशवाणी के जरिये ही पंडित नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र से अपील की थी। गांधीजी सिर्फ एक ही बार, 12 नवंबर, 1947 को आकाशवाणी आए और यहां से उन्होंने कुरूक्षेत्र आदि में स्थित पाकिस्तानी शरणार्थियों को संबोधित किया, जिसका सकारात्मक असर पड़ा था। फिर गांधी भी रेडियो के मुरीद हो गए थे।
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