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अस्पताल अभी दूर है: मौतों के आंकड़े और स्वास्थ्य तंत्र की हकीकत

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Mon, 08 Jun 2026 07:02 AM IST
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सार
आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं, नए मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य बीमा कवरेज विस्तार के बावजूद अगर एसआरएस की रिपोर्ट कहती है कि लगभग हर दूसरी मौत प्रशिक्षित चिकित्सक के बगैर हो रही है, तो साफ है कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
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srs report on how people dying amid skilled doctors crisis health sector challange
स्वास्थ्य व्यवस्था के हालात - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश की आर्थिक प्रगति, डिजिटल क्रांति और स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ते निवेश के दावों के बीच अगर यह तथ्य सामने आए कि 2024 में दर्ज होने वाली तकरीबन आधी मौतें किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की चिकित्सकीय देखरेख के बगैर हुईं, तो यह स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की रिपोर्ट कहती है कि 2024 में 45.5 फीसदी मौतों के समय किसी प्रशिक्षित चिकित्सक या स्वास्थ्य पेशेवर की उपस्थिति नहीं थी, जबकि 2020 में यह आंकड़ा 18 फीसदी ही था।  आंकड़ों में यह अविश्वसनीय उछाल निस्संदेह चौंकाने वाला है।


प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की देखरेख के बगैर हुई मौतों में शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों का अधिक प्रतिशत बताता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं तक ग्रामीण क्षेत्रों की बेहतर पहुंच न हो पाई है। इस रिपोर्ट का एक गंभीर पहलू मृत्यु के कारणों के वैज्ञानिक रिकॉर्ड से जुड़ा है। जब बड़ी संख्या में मौतें चिकित्सकीय निगरानी के बिना होती हैं, तब मृत्यु के वास्तविक कारणों का निर्धारण मुश्किल हो जाता है और इससे राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़ों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है, जिससे संबंधित नीति निर्माण पर भी असर पड़ता है। पिछले एक दशक में स्वास्थ्य क्षेत्र में आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं, नए मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों के उन्नयन और स्वास्थ्य बीमा कवरेज के विस्तार को बड़ी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसके बावजूद अगर लगभग हर दूसरी मौत प्रशिक्षित चिकित्सा सहायता के बगैर हो रही है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन पहलों का लाभ समाज के सबसे कमजोर और दूरस्थ वर्गों तक किस हद तक पहुंच पाया है।


अगर विभिन्न राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो स्थिति और भी गंभीर दिखती है। बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में 60 फीसदी से अधिक मौतें प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की अनुपस्थिति में हुईं। इससे यह भी पता चलता है कि किसी देश की स्वास्थ्य नीति की कामयाबी का आकलन केवल अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों या बीमा योजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर नागरिकों को समय पर और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सहायता मिल पा रही है या नहीं। भले ही प्रशिक्षित स्वाथ्यकर्मियों की गैर-मौजूदगी में हुई मौतों के प्रतिशत में आए उछाल की एक वजह आंकड़ों के संकलन की प्रक्रियाओं या परिभाषाओं में हुआ बदलाव हो, फिर भी अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग, जीवन के अंतिम क्षणों में किसी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो साफ है कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और समानता सुनिश्चित करने की दिशा में देश को अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
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