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लोकतंत्र की नींव और मतदाता सूची का संकट: नाम हटाने की प्रक्रिया पर हो पुनर्विचार
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विस्तार
एक वकील के रूप में मैं समझता हूं कि जब दो माननीय न्यायाधीश न्यायालय की ओर से निर्णय देते हैं, तब वास्तव में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ही बोल रहा होता है। सर्वोच्च न्यायालय एक संवैधानिक संस्था है, साथ ही यह देश का अंतिम अपीलीय न्यायालय भी है। कुछ मामलों में इसे मूल अधिकार-क्षेत्र प्राप्त है। इसे अपने ही निर्णयों की समीक्षा करने और उन्हें पलटने का अधिकार है। यह किसी भी मामले में स्वतः संज्ञान ले सकता है। इसके पास विशेष जांच दल या आयोग गठित करने की शक्ति है। यह किसी भी मामले की जांच किसी पुलिस एजेंसी को सौंप सकता है।भारत के संविधान की इसकी व्याख्या ही अंतिम शब्द है और इसके पास ‘पूर्ण न्याय करने’ के लिए कोई भी आदेश पारित करने की शक्ति है। ऐसा कहा जाता है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय दुनिया का सबसे शक्तिशाली न्यायालय है।
वयस्क मताधिकार का मूल सिद्धांत
सर्वोच्च न्यायालय की व्यापक शक्तियों में से एक विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ‘स्टेट ऑफ मद्रास वर्सेज वीजी रो’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं को संविधान का सदैव सतर्क प्रहरी बताया था। ऐसे में प्रश्न उठता है कि संविधान चुनावों के बारे में क्या कहता है? अनुच्छेद 324 के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग को संसद तथा प्रत्येक राज्य की विधानसभाओं के लिए निर्वाचन नामावली (मतदाता सूची) तैयार करने और सभी चुनावों के संचालन, निर्देशन एवं नियंत्रण का अधिकार और दायित्व सौंपा गया है। अनुच्छेद 326 यह निर्धारित करता है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि ‘मतदान का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है।’
इन दोनों अनुच्छेदों में कोई टकराव नहीं है। संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग का दायित्व है कि वह भारत के प्रत्येक पात्र वयस्क नागरिक को मतदाता सूची में शामिल करे। निस्संदेह, नागरिकता और निवास जैसी कुछ अन्य योग्यताएं भी हैं, जो संविधान, नागरिकता एक्ट, 1955 और रिप्रेजेंटशन ऑफ द पीपुल एक्ट 1950 द्वारा निर्धारित की गई हैं। इन कानूनों में यह भी निर्धारित है कि किसी व्यक्ति की पात्रता का निर्णय कौन-सा प्राधिकरण करेगा और उसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का मूल सिद्धांत समावेश है, अर्थात प्रत्येक पात्र वयस्क नागरिक को मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर रखना एक अपवाद है और ऐसा केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही किया जा सकता है। इसके लिए लिखित निर्णय आवश्यक है, जिसे न्यायिक समीक्षा के समक्ष चुनौती भी दी जा सकती है। अर्थात लोकतंत्र में मूल नियम ‘शामिल करना’ है, जबकि ‘बाहर करना’ केवल कानून सम्मत प्रक्रिया और ठोस कारणों के आधार पर ही संभव है। यही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की आत्मा और भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है।
कुछ टिप्पणियां
27 मई, 2026 को दिए गए एसोसिएशन फोर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस वर्सेज इलेक्शन कमीशन के निर्णय (जो बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के संदर्भ में था) में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
निर्वाचन आयोग ने यह निर्णय लिया कि वर्ष 2003 की मतदाता सूची, जिसकी अर्हता तिथि 1 जनवरी 2003 थी, को मतदाता पात्रता का प्रथमदृष्टया प्रमाण माना जाएगा, जब तक कि इसके विपरीत कोई प्रमाण प्रस्तुत न किया जाए। इसका मतलब है, जिन व्यक्तियों के नाम 2003 की मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें पात्र माना जाएगा। इसके विपरीत, जिनके नाम उस सूची में शामिल नहीं थे, उन्हें अपनी मतदाता पात्रता सिद्ध करने के लिए आयोग द्वारा निर्धारित एक या अधिक दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।
दस्तावेजों की जांच के बाद यदि किसी व्यक्ति की पात्रता संदिग्ध पाई जाती है, तो निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी अथवा सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को उस व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करना होगा। नोटिस में नाम हटाने के आधार स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिए। इसके बाद अधिकारी को कारणयुक्त एवं स्पष्ट आदेश पारित करना होगा। यदि कोई व्यक्ति निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के निर्णय से असंतुष्ट हो, तो वह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अपील कर सकता है। इसके बाद दूसरी अपील राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष भी की जा सकती है। न्यायालय ने यह भी कहा कि निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने अथवा संशोधित करने की प्रक्रिया में नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच करने का अधिकार है। हालांकि यह केवल ‘सीमित जांच’ होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरी प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगी। इसका मतलब है आयोग के निर्णयों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। निर्णय में यह भी उल्लेख किया गया कि बिहार में किए गए एसआईआर अभ्यास के परिणाम स्वरूप वर्ष 2003 की मतदाता सूची की तुलना में लगभग 47 लाख नामों को हटाया गया।
बंगाल में एसआईआर के नतीजे
बिहार में एसआईआर मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने से पहले ही पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होकर पूरी भी हो चुकी थी। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आंकड़ों तथा आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार पश्चिम बंगाल में एसआईआर के परिणाम इस प्रकार रहे-
विवरण संख्या
पहले चरण में मृत, डुप्लीकेट, स्थानांतरित और अनुपस्थित आदि कारणों से हटाए गए नाम- 63.66 लाख
समीक्षा के बाद तार्किक विसंगतियों के आधार पर हटाए गए नाम- 27.16 लाख
कुल हटाए गए नाम - 90.82 लाख
न्यायिक अधिकारियों के समक्ष दायर अपीलें- 25 लाख
14 मई 2026 तक निस्तारित अपीलें - 6581
स्वीकार की गई अपीलें और बहाल किए गए नाम- 4043
सफलता दर- 61.43%
पश्चिम बंगाल में जिन मामलों की सुनवाई हुई, उनमें 61.43 प्रतिशत अपीलकर्ताओं के नाम पुनः मतदाता सूची में बहाल किए गए। यदि इसी सफलता दर को बिहार में हटाए गए 47 लाख नामों पर लागू किया जाए, तो लगभग 28,87,210 व्यक्तियों के नाम पुनः मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य हो सकते थे। निर्वाचन आयोग के दावों की कमजोरी तथा एसआईआर प्रक्रिया की सटीकता, विश्वसनीयता और भरोसे पर गंभीर प्रश्न चिह्न लगाता है। मेरा तर्क है कि यदि न्यायिक समीक्षा में इतनी बड़ी संख्या में हटाए गए नाम गलत पाए जा सकते हैं, तो मतदाता सूची से नाम हटाने की पूरी प्रक्रिया पर पुनर्विचार होना चाहिए। मैं पूछना चाहता हूं कि यदि निर्वाचन आयोग ऐसे ही निर्णयों को वैधता देता रहा, तो क्या लोकतंत्र सुरक्षित रह पाएगा?