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रोम से अमेरिका तक: शक्ति शून्य का खतरनाक इतिहास
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अमेरिका के बाद अब चीन महाशक्ति के तौर पर उभर रहा है।
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अमर उजाला
विस्तार
22 मई, 2026। स्वीडन। हेलसिंगबोर्ग। नाटो विदेश मंत्रियों की बैठक। स्वीडन की विदेश मंत्री मारिया स्टेनरगार्ड माइक पर हैं। चेहरे पर थकान और हैरानी। ट्रंप चाहते क्या हैं, समझना आसान नहीं। ट्रंप ने दो हफ्ते पहले यूरोप से 5,000 अमेरिकी सैनिक वापस बुलाए। जर्मनी से ब्रिगेड कॉम्बैट टीमें हटीं। यूरोप ने समझा—अमेरिका जा रहा है। पोलैंड घबराया। बाल्टिक देशों में रूस का डर। और फिर अचानक ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया—'5,000 सैनिक पोलैंड भेज रहे हैं।' वापस बुलाए। फिर भेजे। किसी को बताया नहीं। नाटो के सचिव जनरल मार्क रूते ने कहा—'यूरोप को अपनी सुरक्षा खुद संभालनी होगी।' स्पेन ने ईरान पर बमबारी के लिए अमेरिकी बमवर्षकों को एयरबेस इस्तेमाल करने से मना करते हुए हवाई क्षेत्र बंद कर दिया था। ट्रंप ने धमकी दी—स्पेन को नाटो से निलंबित कर देंगे। पेंटागन का ईमेल लीक हुआ, जिसमें कहा गया कि जो दोस्त नहीं मानता, उसे सजा दो। यूरोप में सनसनी है। 81 साल पहले अमेरिका ने यूरोप को बचाने के लिए नॉरमैंडी के समुद्र तट पर जंग लड़ी थी, पर आज वह अपनी छतरी समेट रहा है।आइए, टाइम मशीन तैयार है। सीट पकड़िए, चलते हैं अतीत में यह देखने कि यह पहले भी हुआ था और क्यों। जब भी बड़ी ताकत ने वापसी की है, दुनिया बदल गई है। हम ब्रिटेन पहुंच गए हैं, मगर यह रोम वाला ब्रिटेन है। साल 410 ईस्वी। टाइम मशीन लंदिनियम की सड़कों पर उतर रही है। मगर यह लंदन नहीं, यह रोम का शहर है। सड़कें पत्थर की। स्नानघर गर्म पानी के। अदालतें लातिन में। चार सदियों से रोम का राज है यहां। रोमनों ने इस द्वीप को सभ्यता दी है-कानून, सड़कें, दीवारें, व्यापार दिया है। मगर रोम टूट रहा है। गॉथ दरवाजे पर हैं। सम्राट होनोरियस को हर सीमा पर सैनिक चाहिए। ब्रिटेन से रोमन सेनाओं यानी लीजन की वापसी शुरू हो गई है। पहले एक लीजन गई, फिर दूसरी, फिर तीसरी। ब्रिटेन के स्थानीय नेताओं ने रोम को खत लिखा है। इतिहास में इसे 'बर्तानवियों की पुकार' के नाम से दर्ज किया जाएगा। ब्रिटेन के लोग कह रहे हैं—मत जाओ, हमें छोड़कर। बारबेरियंस आ रहे हैं। वे हमें समुद्र की तरफ धकेल रहे हैं और समुद्र हमें बारबेरियंस की तरफ। दोनों तरफ मौत है। हम या तो डूबेंगे या कटेंगे।' रोम का जवाब, 'अपनी रक्षा खुद करो।' याद कीजिए। यही शब्द मार्क रूते ने मई, 2026 में कहे-अपनी रक्षा खुद करो। 1,616 साल का फासला। वही एक वाक्य। तीस साल के भीतर रोमन ब्रिटेन खत्म। सड़कें टूटीं। स्नानघर सूखे। अदालतें बंद। एंग्लो-सैक्सन कबीले आए। सात रियासतें बनीं। अंधेरा युग शुरू हुआ। रोम ने चार सौ साल सभ्यता बनाई—तीस साल में मिट गई। इसके बाद आ गए वाइकिंग। टाइम मशीन तेजी से दूसरे पड़ाव की तरफ बढ़ रही है।
16 जनवरी, 1968। लंदन। हाउस ऑफ कॉमन्स। हम ब्रिटिश संसद की गैलरी के पास हैं। प्रधानमंत्री हेरॉल्ड विल्सन खड़े हैं। थके हुए चेहरे पर पसीना। पाउंड गिर रहा है। खजाना खाली है। विल्सन बोलते हैं—'हम मलयेशिया और सिंगापुर से अपनी सेनाएं 1971 तक वापस बुलाएंगे। फारस की खाड़ी से भी। यूरोप के बाहर कोई विशेष सैनिक क्षमता नहीं रखी जाएगी।' विल्सन ने कहा है कि सुएज के पूर्व में अब ब्रिटेन की सेना नहीं रहेगी। ईस्ट ऑफ सुएज— ये तीन शब्द ब्रिटिश साम्राज्य का मृत्यु प्रमाणपत्र बन जाएंगे। ये तीन शब्द रुडयार्ड किपलिंग की कविता ‘ऑन रोड टु मांडले’ से चर्चा में आए थे। विल्सन ने इसे ग्लोबल कूटनीति की सबसे बड़ी घटना में बदल दिया है। ब्रिटेन एडन से निकला। सिंगापुर छोड़ा। बहरीन खाली किया। तीन साल में सुएज नहर से हांगकांग तक—हर ठिकाना बंद। वह साम्राज्य, जिसमें कभी सूरज नहीं डूबता था, उसने अपनी बत्ती खुद बुझा दी। लंदन में एक चिट्ठी की चर्चा है। अमेरिकी संयुक्त चीफ ऑफ स्टाफ ने रक्षा मंत्री को लिखा है—'ब्रिटिश की वापसी शक्ति शून्यता पैदा करेगी, जिसका फायदा सोवियत संघ और चीन उठाएंगे।'
यही हुआ है। यह मार्च, 1968 है। ब्रिटिश घोषणा के दो महीने बाद सोवियत नौसेना पहली बार हिंद महासागर में स्थायी रूप से उतरी है। हिंद महासागर। तेरह सदियों की समुद्री ताकत—जो ईसा की पहली सदी से चौदहवीं सदी तक दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैली थी, अंग्रेज उसे समेट ले गए और हिंद महासागर में रूसी पनडुब्बियां तैरने लगी हैं। शून्य पैदा हुआ, तो उसे भरने वाले आ गए। हम 1956 में हैं। टाइम मशीन मिस्र की बंदरगाह सईद के ऊपर मंडरा रही है। नीचे ब्रिटिश और फ्रांसीसी पैराट्रूपर उतर रहे हैं। मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने सुएज नहर पर कब्जा कर लिया है। नहर का राष्ट्रीयकरण हो गया है। ब्रिटेन और फ्रांस ने हमला किया। मगर वाशिंगटन से एक फोन आया। आइजनहावर ने कहा—रुको। वापस जाओ। नहीं जाओगे तो पाउंड को गिरा दूंगा। ब्रिटेन वापस चला गया। उस दिन दुनिया ने देख लिया—पुरानी ताकत का रुतबा गया। अमेरिका ने हुक्म दिया और ब्रिटेन ने सिर झुकाया। सुएज वह क्षण था, जब ताज गिरा। अगला पड़ाव है 15 फरवरी, 1989। टाइम मशीन काबुल-जलालाबाद सड़क पर उतर रही है। धूल, बारूद की गंध। टैंकों की कतार अमू दरिया की तरफ बढ़ रही है।
जनरल बोरिस ग्रोमोव आखिरी सोवियत सैनिक है, जो पुल पार कर रहा है। पीछे मुड़कर देखता है। दस साल का युद्ध। पंद्रह हजार सोवियत सैनिक मरे। दस लाख अफगान। ग्रोमोव कह रहा है-'मेरे पीछे कोई सोवियत सैनिक नहीं बचा।' सोवियत संघ ने वादा किया था—नजीबुल्लाह की सरकार टिकेगी। हथियार भेजते रहेंगे। पैसा आता रहेगा। 1991 में सोवियत संघ खुद टूट गया। हथियार बंद। पैसा बंद। 1992 में नजीबुल्लाह गिरे। 1996 में तालिबान ने काबुल को जीत लिया। नजीबुल्लाह को संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय तक घसीटकर ट्रैफिक पोल पर लटका दिया गया। बड़ी ताकत गई, तो तालिबान आया। अब आपके सामने 2021 का अफगानिस्तान है। अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ा। काबुल एयरपोर्ट पर लोग जहाज के पहियों से लटके। तालिबान वापस। बीस साल, बीस खरब डॉलर, ढाई हजार अमेरिकी सैनिक—और नतीजा वही, जो 1989 में सोवियत संघ का था। पैटर्न देखिए—बड़ी ताकत आती है, किले बनाती है, वादे करती है, और एक दिन चुपचाप चली जाती है। पीछे रह जाते हैं टूटे वादे और भरे हुए शून्य। टाइम मशीन वापस लौट रही है। बड़ी ताकतों ने जब भी वापसी की है, उसके नतीजे खतरनाक रहे हैं। अब अमेरिका यूरोप से हट रहा है। ईरान से जंग ने बजट बिगाड़ दिया है। 370 खरब डॉलर का कर्ज है। यूरोप का खर्च कौन उठाए, इसलिए यूरोप खुद को संभालने की बात कर रहा है। 1956 में अमेरिका ने ब्रिटेन को रोका। पर 2026 में अमेरिका खुद रुक नहीं पा रहा। क्या यह अमेरिका का सुएज क्षण है? अगर अमेरिका यूरोप छोड़ता है, तो क्या वह सचमुच एशिया आएगा? या 1968 की तरह फिर एक शून्य बनेगा—इस बार हिंद-प्रशांत में?
चीन की नौसेना दुनिया में सबसे बड़ी है—जहाजों की संख्या में। दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बन चुके हैं। और अमेरिका? वह यूरोप से भी जा रहा है, ईरान में भी फंसा है, और एशिया की भी बात कर रहा है। एक साम्राज्य तीन मोर्चों पर एक साथ नहीं लड़ सकता। रोम ने यह सिखाया, ब्रिटेन ने यह सबक दिया। अब अमेरिका की बारी है। शून्य बन रहा है, मगर इसे भरने वाला बगल में खड़ा है। नाम है बीजिंग। बाकी आप खुद समझदार हैं। फिर मिलते हैं अगले सफर पर...