असली-नकली और कृतज्ञता का एल्गोरिदम: असली-नकली रिश्तों की पहचान कैसे करेगा एआई? मानवता के सत्य से बचेगी दुनिया
हाल ही में ऐसी कई घटनाएं सुनाई दीं, जब प्रेम की जगह धोखा मिला, एक बूढ़ा पिता अपने कमरे में मर गया और बेटे-बेटियों को परवाह भी नहीं हुई। नकली उत्पादों पर लगे बारकोड की तो एआई जांच कर सकता है, लेकिन कृतज्ञता के एल्गोरिदम को पढ़कर वह असली-नकली रिश्तों की पहचान कैसे करेगा?
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क्या आपको भी यह महसूस हो रहा है कि हम जिस युग में रह रहे हैं, वहां क्या असली है और क्या नकली, यह ढूंढना अब दुरूह होता जा रहा है? व्यक्ति से वस्तु तक, वादों से सच्चाई तक, रिश्तों से रिश्तों तक और खाने के सामान से लेकर दवाओं तक, क्या असली है और क्या आडंबर; यह फर्क करना कठिन होता जा रहा है। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? अगर जीने का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार है, तो उसे हर समय शक और अनिश्चितता के माहौल में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। भोजन की उपयोगिता जीवन से है, तो दवाएं जीवन को बचाने के काम आती हैं। लेकिन, अगर वही बेअसर हो जाएं या मिलावटी हों, तो आम आदमी क्या करे? वस्तुओं की एक्सपायरी डेट पढ़ने के बाद तो सभी आश्वस्त हो जाते हैं, लेकिन दिनों-दिन वस्तुएं भी नकली हो रही हैं और इन्सानी रिश्ते भी। तो, पहले उन मानवीय रिश्तों को उस नकली या मिलावटी प्रक्रिया से बाहर निकालने की चर्चा, जो समाज के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं।
हाल ही में, कई घटनाएं खबरों में रहीं, जहां प्रेम की जगह धोखा मिला। बात यहीं नहीं रुकी। एक बूढ़ा पिता अपने कमरे में मर जाता है और उसके बेटे-बेटियों को परवाह भी नहीं होती, क्योंकि उनके लिए पिता से अधिक मूल्यवान उनकी पेंशन और संपत्ति हो चुकी होती है, और जब कोई पुत्र अपने माता-पिता के जीवनभर के प्रेम का आकलन संपत्ति के बंटवारे से करता है, तो जीवन निरर्थक और बासी हो जाता है। और ऐसे में अगर एआई हमारी मदद करने आ जाए, तो उसका स्वागत होना चाहिए।
नकली सामान के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई बढ़ रही है, और ब्रांड असली सामान की पहचान के लिए तकनीक का इस्तेमाल भी करने लगे हैं। लेकिन, यह तो आप भी मानेंगे कि नकली सामान की पहचान करना धीरे-धीरे जटिल होता जा रहा है, और इसी वजह से एआई का इस्तेमाल हो रहा है। यह उत्पाद की गुणवत्ता, उसकी आपूर्ति शृंखला और मार्केट डाटा का विश्लेषण करके नकली सामान का पता लगाने में मदद करता है। नकली सामान की पहचान करने के लिए, एआई अपने आप उत्पाद से जुड़ी तस्वीरों, उसके लोगो, बारकोड और पैकेजिंग की जांच कर सकता है तथा उनकी तुलना पहले से प्रमाणित डाटाबेस से कर सकता है। इसकी मदद से तेजी से नकली उत्पादों की पहचान करके उन्हें बाजार से हटाया जा सकता है।
नकली उत्पादों की पहचान करना भी कुछ मामलों में मुश्किल होता है, खासकर चिकित्सकीय उत्पादों के मामले में। अगर कोई व्यक्ति उत्पाद की जानकारी को ठीक से नहीं जांचता है, तो नकली उत्पाद बनाने और बेचने वालों को और सहूलियत हो जाती है। ऐसे में, एआई कीमत व उत्पाद की मात्रा में आते अंतर को भी चिह्नित कर सकता है और इसके लिए एनालिटिक्स का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। जिस समय हम एआई की तमाम कमियां गिनाने में लगे हैं, वैसे में उसका नकली और असली वस्तु को पहचानने में मदद करना काफी आश्वस्त करने वाला है। अगर केवल एक क्यूआर कोड स्कैन करके खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और दवाओं की असलियत का पता चल जाए, तो क्या कहने! उपभोक्तावाद और ब्रांड वैल्यूज के जमाने में जो सामान महंगा होता है, वह असली माना जाता है, और सस्ता सामान संशय में आ जाता है। मन में यह प्रश्न उठने लगता है, 'इतना सस्ता क्यों?' नकली सामान की पहचान अक्सर असली और नकली उत्पादों की कीमत के अंतर से ही हो जाती है।
रही बात रिश्तों के असली और नकली चरित्र को पहचानने की, तो आज के दौर में वह भी एक सामाजिक कटु सत्य बन चुका है। अपने ही जब अपनों के दुश्मन बनने लगें, तो कोई कैसे भावनाओं की मिलावट को समझे? रिश्तों का क्यूआर कोड तो सिर्फ वह सामाजिक मूल्य, सम्मान और प्रेम होता है, जिसको स्कैन करके अपनेपन को महसूस किया जा सकता है। लेकिन, ऐसे कोड वस्तुओं पर चिह्नित होते हैं, व्यक्तियों पर नहीं। फिर, उन रिश्तों की असलियत को कैसे समझा जाए? डाटा को बटोरता यह समाज उन रिश्तों की सच्चाई को कैसे सहेज कर रख पाएगा और एआई यहां भी मदद करने आएगा क्या? क्या रिश्तों में बढ़ते नकलीपन को कोई एआई टूल्स पहचान पाएगा और डिजिटल घड़ियों की तरह रिमाइंडर या अलार्म दे पाएगा?
मान लीजिए कि कभी आपका बैग चोरी हो जाता है, जिसमें पैसे हैं और लैपटॉप भी। काफी मशक्कत के बाद आपको मालूम पड़ता है कि चुराने वाला व्यक्ति दोनों में से कोई एक ही चीज लौटाना चाहता है। आप क्या वापस लेना चाहेंगे? कुछ ऐसा ही प्रश्न हमारे मित्र और एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने पूछा था। आखिरकार, जवाब आया-लैपटॉप। क्योंकि, फोन या लैपटॉप सिर्फ बातचीत या ई-मेल के साधन नहीं रहे, बल्कि वे डाटा सेंटर बन चुके हैं। और, इस जमाने में सारी लड़ाई डाटा को हथियाने के लिए ही हो रही है। अमेरिका के पास क्लाउड है और उसके अंदर पूरी दुनिया समाई हुई है। सामरिक शक्ति की आड़ में होने वाले युद्ध उस डाटा पर नियंत्रण चाहते हैं, जिससे संसार पर नियंत्रण हो सके। ऐसे में एआई वस्तुओं के असली-नकली होने की पहचान तो कर लेगा, लेकिन स्मृतियों से जुड़े डाटा केे असली और नकली भावों को कैसे बचा पाएगा? अगर एआई अनैतिक और नैतिक का भेद बताने लगे, उस रास्ते पर समाज को ले जाने लगे, जो वस्तुओं के संग मानवीय रिश्तों की साफगोई को संभाल कर रख सके, तो फिर क्या ही कहने! और रही बात प्रजातांत्रिक मूल्यों की, तो जनता संस्थाओं पर आंख मूंदकर भरोसा करती है। खाने के सामान से लेकर दवा बनाने वाली कंपनियों को यह समझना होगा कि वे या उनके परिवार के सदस्य भी ऐसे नकली उत्पादों का इस्तेमाल कर सकते हैं। आखिर बाढ़ का पानी घर में भी तो आता है।
यह नैतिकता तभी आम बनेगी, जब एआई को मनुष्य की कृतज्ञता का एल्गोरिदम भी मिलेगा। जब कोई पुत्र महसूस करेगा कि उसके माता-पिता ने उसका नाम कभी बड़े प्यार से पुकारा होगा, उसके लिए भगवान से लंबी उम्र मांगी होगी। यह भी कि उसे स्वस्थ रखने के लिए वैक्सीनेशन कराया होगा, कर्ज में डूबे होने के बावजूद पढ़ाया होगा। और हां, बरसों तक अपने दुखों को चुपचाप छिपाया होगा, उसकी खुशी में अपनी खुशी ढूंढी होगी और उसकी हर चिंता में अपनी उम्र गुजार दी होगी। अगर एआई को संवेदनशीलता और कृतज्ञता का डाटा मिलेगा, तो उस नकलीपन में कुछ कमी जरूर आएगी। और अगर खुद के अंदर भी वह कृतज्ञता का भाव होगा, तो माता-पिता को खोने से पहले उन्हें पा लिया जाएगा। आखिर इसी मानवता के सत्य से परिवार भी बचेंगे, संबंध भी, वस्तुएं भी, व्यक्ति भी, हम और आप भी, आखिरकार दुनिया भी।