{"_id":"6a6d5dc6d923c0b5130886a4","slug":"assam-reeling-under-worst-floods-state-set-back-by-19-years-every-year-suffering-annual-loss-of-200-crore-2026-08-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"हर वर्ष 19 साल पिछड़ता राज्य: 60 साल की सबसे भीषण बाढ़ कराह रहा असम, सालाना 200 करोड़ रुपये का नुकसान","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
हर वर्ष 19 साल पिछड़ता राज्य: 60 साल की सबसे भीषण बाढ़ कराह रहा असम, सालाना 200 करोड़ रुपये का नुकसान
Sat, 01 Aug 2026 08:15 AM IST
पंकज चतुर्वेदी
कीथ फेराजी, द न्यूयॉर्क टाइम्स
कीथ फेराजी, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 01 Aug 2026 08:15 AM IST
सार
बीते छह दशक की सबसे भीषण बाढ़ ने असम को अस्त-व्यस्त कर दिया है। ऐसी बाढ़ों से उसे सालाना करीब दो सौ करोड़ रुपये की क्षति होती है और विकास 19 वर्ष पीछे चला जाता है।
विज्ञापन
असम में बाढ़ का कहर
- फोटो : पीटीआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
असम में इस बार बीते छह दशक का सबसे भयावह जल-प्लावन आया। राज्य के 11 जिलों के करीब 7.21 लाख से अधिक लोग और करीब 900 गांव प्रभावित हुए हैं। भारी बाढ़ के कारण मरने वालों की संख्या बढ़कर 80 हो गई है। यूरोपीय संघ के कोपरनिकस अर्थ ऑब्जर्वेशन प्रोग्राम के उपग्रह चित्रों से पता चला है कि ब्रह्मपुत्र बाढ़ का मैदान करीब तीन गुना बढ़कर सामान्य दृश्य सीमा से लगभग 21 किलोमीटर चौड़ा हो गया है। बाढ़ की तबाही नगालैंड व अरुणाचल प्रदेश में भी जबर्दस्त है।
विज्ञापन
असम पूरी तरह से नदी घाटी पर ही बसा हुआ है। असम के कुल क्षेत्रफल 78 हजार 438 वर्ग किमी में से 56 हजार 194 वर्ग किमी ब्रह्मपुत्र नदी घाटी में है, जबकि शेष 22 हजार 244 वर्ग किमी का हिस्सा बराक नदी की घाटी में आता है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के मुताबिक, असम का कुल 31 हजार 500 वर्ग किमी, यानी करीब 40 फीसदी हिस्सा बाढ़ प्रभावित है। अनुमान है कि इससे हर साल राज्य को करीब 200 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। राज्य में इतनी मूलभूत सुविधाएं खड़ी करने में दस साल लगते हैं, जबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो जाता है। यानी, असम हर साल विकास की राह पर 19 साल पिछड़ता जाता है।
विज्ञापन
पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों में बाढ़ आ रही है, वह हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में मानवजनित छेड़छाड़ का ही परिणाम है। सरकारों का ध्यान बाढ़ के बाद राहत कार्यों और मुआवजे पर रहता है। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान और बांटी गई राहत राशि को जोड़ दिया जाए, तो पाएंगे कि इतने धन में एक नया और सुरक्षित असम खड़ा किया जा सकता था।
विज्ञापन
असम में हर साल तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र व बराक नदियां, उनकी 48 सहायक नदियां और उनसे जुड़ी असंख्य सरिताओं पर सिंचाई व बिजली उत्पादन परियोजनाओं के अलावा इनके जल प्रवाह को आबादी वाले क्षेत्रों में घुसने से रोकने की योजनाएं बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन अब तक बाढ़ नियंत्रण की कोई मुकम्मल योजना नहीं बन पाई है। खेती असम की अर्थव्यवस्था का आधार है, लेकिन बाढ़ का पानी हर साल लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल को नष्ट कर देता है। नतीजतन, यहां का किसान कभी कर्ज से उबर ही नहीं पाता। ब्रह्मपुत्र की धारा कहीं भी और कभी भी दिशा बदल देती है। इसका परिणाम यह होता है कि उपजाऊ कृषि भूमि का कटाव होता रहता है।
राज्य में अधिकांश तटबंध और बांध 60 के दशक में बनाए गए थे। अब वे बढ़ते जलस्तर को रोक पाने में असमर्थ हैं। नदियों में नियमित गाद सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले साल पहली बारिश के दबाव में 50 से अधिक स्थानों पर ये बांध टूट गए थे। इस साल पहले ही महीने में 27 जगहों पर मेड़ टूटने से जलनिधि गांवों में फैलने की खबर है। बाढ़ प्रबंधन के लिए 1981 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड का गठन हुआ था और केंद्र सरकार के अधीन एक बाढ़ नियंत्रण महकमा वर्षों से काम कर रहा है, लेकिन उसका प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं देता। असम को सालाना बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों की गाद सफाई, पुराने बांध और तटबंधों के पुनर्निर्माण की जरूरत है।