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अमेरिका बनाम चीन: कौन तय करेगा कि दुनिया कैसे सोचेगी, एआई स्पर्धा से उठे सवाल
Fri, 31 Jul 2026 07:30 AM IST
Pavan
टॉल फेल्डमैन, सुरक्षा मामलों के जानकार व तकनीकी विशेषज्ञ
टॉल फेल्डमैन, सुरक्षा मामलों के जानकार व तकनीकी विशेषज्ञ
Published by: Pavan
Updated Fri, 31 Jul 2026 07:30 AM IST
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सार
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कौन तय करेगा कि दुनिया कैसे सोचेगी
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अमर उजाला
विस्तार
अमेरिका दुनिया के सबसे उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल बेच रहा है, जबकि चीन दूसरे सबसे उन्नत एआई मॉडल मुफ्त या बेहद कम कीमत पर उपलब्ध करा रहा है। दुनिया इन मॉडलों को खूब अपना भी रही है। नतीजतन, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई देशों में चीनी एआई मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। पिछले वर्ष पहली बार चीनी एआई मॉडलों को अमेरिकी मॉडलों से अधिक डाउनलोड किया गया। जर्मनी की सीमेंस जैसी कंपनियां और सिंगापुर का राष्ट्रीय एआई कार्यक्रम अमेरिकी मॉडलों के साथ चीनी एआई अपना रहे हैं। कुछ अमेरिकी कंपनियां भी चीनी एआई का सहारा लेने लगी हैं। पर, ये चीनी मॉडल उतने निर्दोष नहीं हैं, जितना समझा जा रहा है।अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि कई चीनी एआई मॉडल अमेरिकी तकनीक की आंशिक रूप से नकल करके विकसित किए गए हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका विकास चीन के उन कानूनों के तहत हुआ है, जो तय करते हैं कि एआई क्या कह सकता है और क्या नहीं। इन नियमों के अनुसार, एआई ऐसा कोई उत्तर नहीं दे सकता, जिससे चीन की छवि को नुकसान पहुंचे, अलगाववाद को बढ़ावा मिले या वहां की सामाजिक स्थिरता कमजोर हो। यही कारण है कि इन एआई मॉडलों को इस तरह विकसित किया जाता है कि वे चीनी सरकार के हितों के अनुरूप उसकी सोच, दुष्प्रचार और भ्रामक दावों को बढ़ावा दें। इसलिए, असली चिंता यह नहीं है कि ये मॉडल चीन में बने हैं, बल्कि यह है कि इन्हें चीन के हितों के लिए बनाया गया है।
जो भी देश दुनिया की एआई आपूर्ति पर नियंत्रण रखेगा, वही तय करेगा कि दुनिया कैसे सोचेगी। जैसे-जैसे ये मॉडल ज्यादा स्मार्ट और स्वचालित होते जा रहे हैं, हम सोचने-समझने का अधिकतर काम इन्हीं पर छोड़ते जा रहे हैं। लोग शोध, विश्लेषण, निर्णय और कोडिंग जैसे काम भी तेजी से एआई पर छोड़ रहे हैं। इस प्रवृत्ति को ‘कॉग्निटिव ऑफलोडिंग’ कहा जाता है। यानी, इन्सान सोचने और निर्णय लेने का ज्यादातर काम मशीनों को सौंपने लगा है। लेकिन, ऐसा भरोसा उन एआई मॉडलों पर नहीं होना चाहिए, जिन्हें किसी विदेशी सरकार के हितों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार किया गया हो, चाहे वे कितने भी सस्ते और बेहतर क्यों न दिखें।
इसी आशंका को परखने के लिए पिछले वर्ष चीनी एआई मॉडल डीपसीक का परीक्षण किया गया। शोधकर्ताओं ने उससे कुछ सीधे, तो कुछ सवाल घुमा-फिराकर पूछे। पर, अमेरिकी सर्वर पर चलने के बावजूद डीपसीक ने अमेरिकी एआई मॉडलों की तुलना में बीजिंग के आधिकारिक दावों और उसके हित की बात को कहीं अधिक दोहराया। अगर डीपसीक की वेबसाइट पर जाएं, तो वहां भी यही रुख दिखाई देता है। वहां ताइवान को चीन का अभिन्न हिस्सा बताया गया है और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों की खुलकर प्रशंसा की गई है। ये दावे स्पष्ट रूप से इतने पक्षपाती हैं कि कोई भी इन्हें आसानी से पहचान सकता है। लेकिन, असली चुनौती उन सामान्य जवाबों की है, जिनमें पक्षपात आसानी से नजर नहीं आता।
आज के एआई मॉडल उत्तर देने से पहले अपने स्तर पर जानकारी का विश्लेषण करते हैं, विकल्पों पर विचार करते हैं और फिर अंतिम जवाब तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया को ‘चेन ऑफ थॉट’ या एआई की ‘सोचने की प्रक्रिया’ कहा जाता है। कुछ मॉडल अपनी इस आंतरिक प्रक्रिया की झलक भी दिखाते हैं। शोधकर्ताओं ने जब अलीबाबा के क्वेन मॉडल का अध्ययन किया, तो पाया कि चीन से जुड़े विषयों पर वह एक तयशुदा चेकलिस्ट का पालन करता है-जवाब सकारात्मक हो, उपलब्धियों पर जोर हो और आलोचना से बचा जाए। इसका मतलब है कि यदि कोई कंपनी एआई से पूछे कि चीन में निवेश करना चाहिए या नहीं, किस आपूर्तिकर्ता पर भरोसा किया जाए या किसी अंतरराष्ट्रीय विवाद को कैसे समझा जाए, तो संभव है कि जवाब में उपयोगकर्ता से पहले चीन के हितों को प्राथमिकता मिले।
सुरक्षा का पहलू भी उतना ही गंभीर है। कुछ शोधों में पाया गया कि जब डीपसीक से उन समुदायों के लिए कोड तैयार करने को कहा गया, जिन्हें चीन सरकार विरोधी मानती है, जैसे फालुन गोंग या तिब्बती समुदाय, तो उसने ऐसा कोड बनाया, जिसमें सुरक्षा संबंधी खामियां थीं। इससे हैकर्स के लिए सिस्टम में सेंध लगाना आसान हो सकता था। कल्पना कीजिए, किसी कंपनी में ऐसा कर्मचारी हो, जो बेहद होशियार व मेहनती हो, पर उसका मकसद किसी विदेशी सरकार के हितों को आगे बढ़ाना हो, तो उसे विदेशी एजेंट ही कहा जाएगा। अब चीनी एआई का इस्तेमाल करने वाली कंपनियां अनजाने में ऐसे ही लाखों लोगों को काम पर रख रही हैं। असल समस्या केवल अंतिम उत्तरों में नहीं, बल्कि एआई की आंतरिक सोचने की प्रक्रिया में छिपी हो सकती है। ऐसे सूक्ष्म पक्षपातों को पूरी तरह हटाना आसान नहीं है। इसलिए, यह जिम्मेदारी केवल निजी कंपनियों पर नहीं छोड़ी जा सकती। इसके लिए सरकार की सक्रिय भूमिका भी जरूरी है।
एक तरीका है-पारदर्शिता। जिस तरह अमेरिका में विदेशी सरकारों के हित में काम करने वालों को अपनी पहचान सार्वजनिक करनी पड़ती है और आयातित सामान पर उस देश के लेबल लगाए जाते हैं, उसी तरह चीनी एआई आधारित हर उत्पाद पर उसके मूल स्रोत का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य होना चाहिए। इससे लोगों को समझने में मदद मिलेगी कि तकनीक किस उद्देश्य से विकसित की गई है, और तब लोग तय कर सकेंगे कि वे ऐसे एआई के इस्तेमाल पर प्रतिबंध चाहते हैं या नहीं।
अगर समान गुणवत्ता और समान कीमत वाले दो विकल्प उपलब्ध हों, तो अधिकांश कंपनियां और उपभोक्ता स्वाभाविक रूप से उसी तकनीक को चुनेंगे, जिसे किसी विदेशी सरकार के रणनीतिक हितों के लिए विकसित नहीं किया गया हो। लेकिन, यह तभी संभव होगा, जब कंपनियों को पर्याप्त सहयोग मिले। इसके लिए एआई ढांचे का विस्तार करना होगा, विदेशों में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में निवेश बढ़ाना होगा, घरेलू नियामकीय बाधाओं को कम करना होगा और ऊर्जा लागत घटानी होगी। साथ ही, चीनी एआई में मौजूद संभावित पक्षपात पर लगातार शोध और सार्वजनिक चर्चा को बढ़ावा देना होगा। फिलहाल, चीन दुनिया को उन्नत एआई तकनीक उपलब्ध कराकर इस लड़ाई में अपनी बढ़त बनाता दिख रहा है।
एआई की यह प्रतिस्पर्धा पहले की किसी तकनीकी दौड़ जैसी नहीं है। सबसे बड़ा खतरा यह है कि दुनिया अपनी सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता ऐसे एआई सिस्टमों के हवाले न कर दे, जिन्हें केवल एक सरकार के हितों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार किया गया हो। यह केवल तकनीक की नहीं, बल्कि दुनिया की सोच और विचारों को प्रभावित करने की भी लड़ाई है। - ©The New York Times 2026