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व्यापारी की अर्थनीति: टैरिफ का असर आंकड़ों से कहीं आगे जाएगा, विकास की तेज गति जरूरी
केएस तोमर, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Mon, 12 Jan 2026 06:26 AM IST
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डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति
- फोटो :
ANI
विस्तार
अमेरिका द्वारा सैंक्शनिंग रशिया एक्ट, 2025 के तहत भारतीय निर्यात पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी, हाल के दशकों में भारत-अमेरिका संबंधों में उभरे सबसे गंभीर तनावों में से एक माना जा रहा है। यूक्रेन में लगातार युद्ध के लिए मास्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से लाए गए इस प्रस्तावित कानून में भारत जैसे देशों पर सख्त सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है, जो अब भी रूसी कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद आयात कर रहे हैं।हालांकि, प्रतिबंधों का यह खतरा दूरगामी असर रखता है। अगर ऐसे टैरिफ पूरी तरह से लागू किए जाते हैं, तो इसके नतीजे व्यापार के आंकड़ों से कहीं आगे तक जाएंगे, और भारत की आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को चोट पहुंचा सकते हैं। व्यापार व ऊर्जा के अलावा, टैरिफ का खतरा भारत के वित्तीय बाजार को भी जोरदार झटका देगा। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक बाजार से पैसा निकाल सकते हैं और रुपया भी और कमजोर पड़ सकता है। ऐसी अस्थिरता से कॉरपोरेट उधार लेने की लागत बढ़ेगी, निवेश के फैसले में देरी होगी और ऐसे समय में वित्तीय प्रबंधन मुश्किल हो जाएगा, जब विकास की गति बेहद जरूरी है।
भारत के अचानक रूसी तेल आयात रोकने का असर तुरंत और गंभीर होगा। ऐसे में, रिफाइनरियों को दूसरे विकल्प तलाशने होंगे, जो महंगी पड़ेगी, जिससे भारत का सालाना आयात बिल 10-12 अरब डॉलर बढ़ सकता है। इससे चालू खाता घाटा बढ़ेगा और अल्पकाल में जीडीपी की विकास दर भी घट सकती है।
रणनीतिक साझेदार होने के बावजूद ट्रंप ने अक्सर भारत को एक ऐसा 'सख्त व्यापारी' बताया है, जो अपने बाजारों की कड़ी सुरक्षा करता है, पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था तक पहुंच का लाभ भी उठाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव खत्म कराने में ट्रंप की कथित मध्यस्थता को भारत द्वारा खारिज करने और पाकिस्तान की तरह उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए समर्थन नहीं देने की वजह से ट्रंप चिढ़े हुए हैं।
यदि ट्रंप की यह बदले की भावना ठोस कदमों में बदलती है, तो भारतीय निर्यातकों को न केवल ऊंचे दंडात्मक टैरिफ झेलने पड़ेंगे, बल्कि अमेरिकी व्यापार नीति की स्थिरता पर भरोसा भी लंबे समय तक कमजोर होगा। आपूर्ति-शृंखला सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और हिंद-प्रशांत आर्थिक समन्वय भी प्रभावित होंगे। इससे साझेदारी कमजोर होगी, और भारत वैकल्पिक बाजारों और साझेदारों के साथ और आक्रामक तरीके से संतुलन बनाएगा। भारत का अमेरिका को निर्यात सालाना करीब 75-80 अरब डॉलर का है। अगर 500 प्रतिशत का टैरिफ लागू होता है, तो भारतीय उत्पाद रातों-रात अमेरिकी बाजार से बाहर हो सकते हैं। निर्यातकों को या तो लंबे समय के अनुबंध रद्द करने पड़ेंगे, या वैकल्पिक बाजार तलाशने होंगे। वैश्विक मांग में सुस्ती से जूझ रहे वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र में फैक्टरियां बंद होने और नौकरियां जाने का खतरा बढ़ जाएगा। फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में नियामकीय अनिश्चितता और लागत बढ़ेगी, जिससे अमेरिकी स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतें भी प्रभावित होंगी।
इससे न केवल निर्यात-आधारित विनिर्माण, बल्कि भारत-अमेरिका के व्यापक आर्थिक सहयोग में भी निवेशकों का भरोसा खत्म होगा, जिसे वाशिंगटन ने स्वयं प्रोत्साहित किया है। प्रस्तावित टैरिफ ने भारत को एक व्यापक भू-राजनीतिक दुविधा के केंद्र में ला खड़ा किया है। रूस के साथ उसके रिश्ते रक्षा, परमाणु ऊर्जा और बहुपक्षीय कूटनीति तक फैले हुए हैं, जबकि अमेरिका के साथ साझेदारी व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा और हिंद-प्रशांत जैसे क्षेत्रों में गहरी हुई है। असल में अमेरिका चाहता है कि भारत अपने ऊर्जा और आर्थिक फैसलों को वाशिंगटन के भू-राजनीतिक लक्ष्यों के अधीन कर दे, जो नई दिल्ली को स्वीकार नहीं है। भारत को वाशिंगटन के साथ लगातार और उच्चस्तरीय बातचीत के जरिये रियायत या चरणबद्ध तरीकों को लागू करने जैसे विकल्पों पर जोर देना होगा। नई दिल्ली यह तर्क दे सकती है कि एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में, तेल आपूर्ति में अचानक रुकावट से विकास, मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक स्थिरता को ही नुकसान होगा।
इसके साथ ही, भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह रूसी तेल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करे, ताकि कीमतों में अचानक उछाल न आए। इसके लिए आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाना जरूरी है। साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधनों को तेजी से अपनाना भी उतना ही जरूरी है।
भले ही 500 प्रतिशत टैरिफ पूरी तरह से लागू न हों, लेकिन यह खतरा ही इस बात को रेखांकित करता है कि आर्थिक निर्भरता को कैसे दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह विकास, ऊर्जा सुरक्षा या रणनीतिक स्वायत्तता बचाते हुए इस स्थिति से निपटे। नई दिल्ली इन प्रतिस्पर्धी दबावों को कैसे संतुलित करती है, यह न केवल भारत-अमेरिका संबंधों के भविष्य को, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका को भी आकार देगा।