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Iran: लंबे चक्र का हिस्सा हैं ईरान के मौजूदा हालात, संरचनात्मक और नीतिगत चूक ही जिम्मेदार

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Mon, 12 Jan 2026 05:54 AM IST
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सार
ईरान में आर्थिक संकट के खिलाफ दिसंबर, 2025 के अंत से शुरू हुआ प्रदर्शन अब पूरे देश में एक बड़े राजनीतिक विद्रोह का रूप ले चुका है। रणनीतिक हितों के मद्देनजर भारत के लिए सतर्क कूटनीति का पालन ही वर्तमान संदर्भ में सर्वश्रेष्ठ रणनीति होगी।
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iran violence protest is part of a long cycle with structural and policy failures responsible
ईरान में हिंसा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार
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ईरान में गिरती मुद्रा और बढ़ती कीमतों को लेकर जनता का गुस्सा पिछले वर्ष के अंत से बढ़ते हुए जिस तरह से पूरे देश को चपेट में ले चुका है, वह चिंताजनक तो है ही, इसने पूरे इस्लामिक गणराज्य को एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। आलम यह है कि तेहरान के बाजारों से लेकर छोटे प्रांतीय कस्बों तक, दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद कर दी हैं और युवाओं की भीड़ सड़कों पर ट्रंप की फोटो लेकर मदद की गुहार लगा रही है। वे ईरान के पूर्व शाह के बेटे रजा पहलवी के समर्थन में भी नारे लगा रहे हैं, जिन्होंने विदेश से प्रदर्शन को और तेज करने की अपील की है। हालांकि ईरान के लिए यह कोई नई बात नहीं है।


यह एक लंबे चक्र का हिस्सा है, जो चार दशक से भी अधिक समय पहले शुरू हुआ था। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से, ईरान में अशांति की कई लहरें देखी गई हैं। इनमें से प्रत्येक को आर्थिक दबाव, सामाजिक नियंत्रण और शीर्ष पर केंद्रित राजनीतिक शक्ति द्वारा आकार दिया गया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामनेई की प्रतिक्रिया बेहद क्रूर और असहिष्णु रही है। फोन लाइनें और इंटरनेट के पूरी तरह बंद होने के बाद दुनिया से पूरी तरह कट चुके ईरान में दमन की असल तस्वीरें सामने न आ सकें, इसकी भरसक कोशिश भी हो रही है। दरअसल जिस तेजी से देश के सभी 31 प्रांतों में यह विद्रोह फैला है और आर्थिक मांगों ने जिस तरह से राजनीतिक स्वरूप लिया है, तो इसके लिए वर्षों की संरचनात्मक कमजोरियां और नीतिगत चूकें ही जिम्मेदार हैं।


ध्यान देने वाली बात यह है कि एक तरफ सर्वोच्च नेतृत्व और सुरक्षा बलों का विद्रोहियों के प्रति रुख बेहद सख्त है, तो दूसरी तरफ ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन हिंसा को रोकने की अपील कर रहे हैं। सर्वोच्च स्तर पर इस तरह के मतभेद तात्कालिक संकट से निपटने की शासन की शक्ति को कमजोर कर सकते हैं। ईरान बेशक जन विद्रोह के पीछे विदेशी साजिश होने की बात कह रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर से मिल रही प्रतिक्रियाएं स्थितियों को अधिक जटिल बना सकती हैं।

अमेरिका ने हिंसक ढंग से विरोध को दबाने पर उतारू सर्वोच्च सत्ता को कड़ी चेतावनी दी है, तो यूरोपीय देशों ने भी ईरान के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए हैं। जहां तक भारत का सवाल है, हमारी चिंताएं चाबहार बंदरगाह परियोजना को लेकर हैं, जिसे पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीन की उपस्थिति के संतुलन के तौर पर देखा जाता है। जाहिर है कि अगर ईरान में लंबे समय तक अस्थिरता रहती है, तो इससे भारत के रणनीतिक हित प्रभावित हो सकते हैं। ईरानी मेडिकल कॉलेजों में हजारों भारतीय विद्यार्थी पढ़ते भी रहे हैं। जल्द ही ईरान के विदेश मंत्री की भारत यात्रा होनी संभावित थी। वर्तमान संदर्भ में, भारत के लिए सतर्कतापूर्ण कूटनीति अपनाने का वक्त है।
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