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किस दिशा में भारतीय सिनेमा : यह हमारे लिए गर्व की बात है या शर्म की
Sun, 28 Jul 2019 01:32 AM IST
गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी
Published by: गौतम चटर्जी
Updated Sun, 28 Jul 2019 01:32 AM IST
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indian cinema
क्या मूल्य स्खलन का दौर अब समाप्तप्राय है? भारतीय संस्कृति के मूल्यों को कला के माध्यम से पूरे विश्व तक ले जाने की हमारी समृद्ध परंपरा वैदिक युग से है। भरत ने भारत से विश्व को रस का विचार पहली बार दिया, तो कालिदास समेत नाट्यकवियों ने दृश्यकाव्य के अक्षुण्ण उदाहरण सामने रखे। प्रथम विश्वयुद्ध के युद्धकामी परिप्रेक्ष्य में रवींद्रनाथ ने गीतांजलि प्रस्तुत किया, तो सत्यजित राय पथेर पांचाली लेकर कान के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह तक गए। परंपरा थमी नहीं।
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क्या मूल्य स्खलन का दौर अब समाप्तप्राय है? भारतीय संस्कृति के मूल्यों को कला के माध्यम से पूरे विश्व तक ले जाने की हमारी समृद्ध परंपरा वैदिक युग से है। भरत ने भारत से विश्व को रस का विचार पहली बार दिया, तो कालिदास समेत नाट्यकवियों ने दृश्यकाव्य के अक्षुण्ण उदाहरण सामने रखे। प्रथम विश्वयुद्ध के युद्धकामी परिप्रेक्ष्य में रवींद्रनाथ ने गीतांजलि प्रस्तुत किया, तो सत्यजित राय पथेर पांचाली लेकर कान के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह तक गए। परंपरा थमी नहीं।
आधुनिक दौर में गिरीश कारनाड पहले भारतीय नाटककार हुए, जब उन्होंने युनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष मनाए जाने वाले विश्व रंगमंच दिवस की पूर्वसंध्या पर दुनिया के रंगकर्मियों के लिए भारत की ओर से संदेश दिया। इधर मूल्यसंवहन की यह परंपरा स्खलित दिखती है। जैसे इस बार कान फिल्म समारोह में अपने देश से एक भी फिल्म नहीं चुनी गई, जबकि कुछ ग्लैमरस अभिनेत्रियों को रेड कार्पेट पर महज चलने के लिए खर्चीले ढंग से आमंत्रित किया गया था।
यह हमारे लिए गर्व की बात है या शर्म की, यह अस्पष्ट नहीं है। क्या हम अब पेन ऐंड ग्लोरी (स्पेन), ला मिजरेबल (फ्रांस) या सॉरी वी मिस्ड यू (ब्रिटेन) जैसी फिल्म भी नहीं बना सकते, जिन्हें इस बार इस महत्वपूर्ण फिल्म समारोह के लिए चुना गया था? आखिर यह स्खलन किन स्तरों पर हुआ है? या इसे हमें ऐसे देखना चाहिए कि मूल्य स्खलन का दौर अब समाप्तप्राय है और अब हम संस्कृति की दृष्टि से एक विकसित देश में रूपांतरित हो रहे हैं।
आधुनिक दौर में गिरीश कारनाड पहले भारतीय नाटककार हुए, जब उन्होंने युनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष मनाए जाने वाले विश्व रंगमंच दिवस की पूर्वसंध्या पर दुनिया के रंगकर्मियों के लिए भारत की ओर से संदेश दिया। इधर मूल्यसंवहन की यह परंपरा स्खलित दिखती है। जैसे इस बार कान फिल्म समारोह में अपने देश से एक भी फिल्म नहीं चुनी गई, जबकि कुछ ग्लैमरस अभिनेत्रियों को रेड कार्पेट पर महज चलने के लिए खर्चीले ढंग से आमंत्रित किया गया था।
यह हमारे लिए गर्व की बात है या शर्म की, यह अस्पष्ट नहीं है। क्या हम अब पेन ऐंड ग्लोरी (स्पेन), ला मिजरेबल (फ्रांस) या सॉरी वी मिस्ड यू (ब्रिटेन) जैसी फिल्म भी नहीं बना सकते, जिन्हें इस बार इस महत्वपूर्ण फिल्म समारोह के लिए चुना गया था? आखिर यह स्खलन किन स्तरों पर हुआ है? या इसे हमें ऐसे देखना चाहिए कि मूल्य स्खलन का दौर अब समाप्तप्राय है और अब हम संस्कृति की दृष्टि से एक विकसित देश में रूपांतरित हो रहे हैं।
गिरीश कारनाड ने अपने सभी नाटक कन्नड या अंग्रेजी में लिखे। अंतिम नाटक उन्होंने 2005 में अंग्रेजी में लिखा था, हीप ऑफ ब्रोकेन इमेजेस। हयवदन और ययाति को हर दौर में इसलिए पसंद किया जाता है और इसी कारण गिरीश को भी, क्योंकि इन दोनों नाटकों की कहानियां पुराणों से ली गई हैं। रामायण, महाभारत और पुराणों को आधार बनाकर जब भी कुछ लिखा जाता है, तो वह हमारे अतीत रागात्मक चेतना का स्पर्श तत्काल कर लेता है और हमारे मन को गहरे तक छू लेता है। क्या अब साहित्य, रूपंकर कला, मंचकला और फिल्म कला में यह नहीं हो रहा?
इन दिनों हर तीसरी भारतीय हथेली में एक कैमरा देखा जा सकता है। हर कोई फिल्म बनाता मिलता है। पहले देश में सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह हुआ करता था, जिसे फिल्म समारोह निदेशालय और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम आयोजित करता था। बीच के वर्ष में उस शहर में फिल्मोत्सव होता था, जहां फिल्म का उद्योग है। 1987 में जब जूरी की ओर से फिल्मकार लिंडसे एंडर्सन ने घोषणा की कि दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में एक भी फिल्म इस स्तर की नहीं है, जिसे प्रतियोगी फिल्म कहा जाए, तो समारोह से प्रतियोगी खंड को समाप्त कर दिया गया और हर साल यह गैरप्रतियोगी ढंग से आयोजित होने लगा।
अब यह हर साल अक्तूबर में गोवा में आयोजित होता है। उसमें भी जब पाया गया कि पूरे समारोह में एक भी क्लासिक फिल्म नहीं चुनी जा रही और लगभग तीन सौ गर्म फिल्मों का मुख्य खंड विश्व सिनेमा से समारोह के सरकारी अधिकारी तय कर रहे हैं, तो फिल्म की दुनिया में सक्रिय संस्कृति संवाहकों ने तीन अलग फिल्म समारोह स्वयं आयोजित करने आरंभ किए। ये थे, श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन एवं अन्य। उन सभी के साथ फिल्म के सचेत दर्शकों ने सरकारी समारोहों का उपेक्षा शुरू की और हमें क्लासिक फिल्में देखने को मिलने लगीं।
इन दिनों हर तीसरी भारतीय हथेली में एक कैमरा देखा जा सकता है। हर कोई फिल्म बनाता मिलता है। पहले देश में सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह हुआ करता था, जिसे फिल्म समारोह निदेशालय और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम आयोजित करता था। बीच के वर्ष में उस शहर में फिल्मोत्सव होता था, जहां फिल्म का उद्योग है। 1987 में जब जूरी की ओर से फिल्मकार लिंडसे एंडर्सन ने घोषणा की कि दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में एक भी फिल्म इस स्तर की नहीं है, जिसे प्रतियोगी फिल्म कहा जाए, तो समारोह से प्रतियोगी खंड को समाप्त कर दिया गया और हर साल यह गैरप्रतियोगी ढंग से आयोजित होने लगा।
अब यह हर साल अक्तूबर में गोवा में आयोजित होता है। उसमें भी जब पाया गया कि पूरे समारोह में एक भी क्लासिक फिल्म नहीं चुनी जा रही और लगभग तीन सौ गर्म फिल्मों का मुख्य खंड विश्व सिनेमा से समारोह के सरकारी अधिकारी तय कर रहे हैं, तो फिल्म की दुनिया में सक्रिय संस्कृति संवाहकों ने तीन अलग फिल्म समारोह स्वयं आयोजित करने आरंभ किए। ये थे, श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन एवं अन्य। उन सभी के साथ फिल्म के सचेत दर्शकों ने सरकारी समारोहों का उपेक्षा शुरू की और हमें क्लासिक फिल्में देखने को मिलने लगीं।
अब जब से कैमरा हर तीसरी हथेली में सुलभ हुआ है, तब सफलता किसी को नहीं मिल रही। ऐसा एक तो इसलिए कि क्लासिक फिल्म की अनुशंसा और समझ के बिना ये फिल्म बनाने में महत्वाकांक्षी हो रहे, दूसरा यह कि, इस परिवेश में एक नया उपांग जुड़ गया है, क्यूरेटर। भारत का कोई फिल्मकार फिल्म बनाकर दुनिया के किसी समारोह को सीधे नहीं दे सकता।
बीच में क्यूरेटर से होकर उसे गुजरना है। और यदि आप की फिल्म चुन ली गई, तो हो सकता है कि आपसे यह भी कहा जाए कि अपने खर्चे से विदेश जाएं और हो सके, तो किसी सेलिब्रिटी को भी साथ ले जाएं। यह नया दृश्य है। और इस दृश्य के पीछे जो मूल्यविहीन मंशाएं हैं, उनके कारण अब देश में जहां-तहां फिल्म समारोह होने लगे हैं। आप फिल्म भेजिए और अवार्ड खरीदिए।
ऐसे में रवींद्रनाथ से गिरीश कारनाड तक के मूल्य कहां रह गए? अब हमारे पास विश्व तक ले जाने के लिए कौन से मूल्य शेष रह गए हैं? मूल्य तो हैं, लेकिन हम संवाहक किन चीजों के होकर रह गए हैं? फिर अगर एक भी फिल्म हमारे देश से चुनी न जा रही हो और हम सिर्फ रेड कार्पेट तक सीमित हो गए हों, तो इसे उन्नति कहें या स्खलन?
जब तक वैयक्तिक जीवन में गहरे सनातन और शाश्वत मूल्यों को जीने और दोहराने की प्रवृत्ति विकसित करने का परिवेश तैयार नहीं होगा, तब तक हम विश्व को अपनी कला से मूल्य विपन्नता का अद्यतन परिचय ही देते रहेंगे। रंगमंच दिवस पर अपने विश्व संबोधन में गिरीश कारनाड ने ऐसा ही कुछ संदेश लिखा था।
बीच में क्यूरेटर से होकर उसे गुजरना है। और यदि आप की फिल्म चुन ली गई, तो हो सकता है कि आपसे यह भी कहा जाए कि अपने खर्चे से विदेश जाएं और हो सके, तो किसी सेलिब्रिटी को भी साथ ले जाएं। यह नया दृश्य है। और इस दृश्य के पीछे जो मूल्यविहीन मंशाएं हैं, उनके कारण अब देश में जहां-तहां फिल्म समारोह होने लगे हैं। आप फिल्म भेजिए और अवार्ड खरीदिए।
ऐसे में रवींद्रनाथ से गिरीश कारनाड तक के मूल्य कहां रह गए? अब हमारे पास विश्व तक ले जाने के लिए कौन से मूल्य शेष रह गए हैं? मूल्य तो हैं, लेकिन हम संवाहक किन चीजों के होकर रह गए हैं? फिर अगर एक भी फिल्म हमारे देश से चुनी न जा रही हो और हम सिर्फ रेड कार्पेट तक सीमित हो गए हों, तो इसे उन्नति कहें या स्खलन?
जब तक वैयक्तिक जीवन में गहरे सनातन और शाश्वत मूल्यों को जीने और दोहराने की प्रवृत्ति विकसित करने का परिवेश तैयार नहीं होगा, तब तक हम विश्व को अपनी कला से मूल्य विपन्नता का अद्यतन परिचय ही देते रहेंगे। रंगमंच दिवस पर अपने विश्व संबोधन में गिरीश कारनाड ने ऐसा ही कुछ संदेश लिखा था।