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माफी और जवाबदेही: सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत, एल्गोरिदम और लोकतंत्र के सामने नई चुनौती

Fri, 07 Aug 2026 06:27 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 07 Aug 2026 06:27 AM IST
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सार
ये सोशल मीडिया कंपनियां दुनियाभर में खुद को एक निष्क्रिय मंच बताकर सेफ हार्बर (कानूनी संरक्षण) की मांग करती रही हैं। उनका तर्क होता है कि वे किसी संपादक की तरह कंटेंट का चयन नहीं करतीं, बल्कि उपयोगकर्ताओं द्वारा डाले गए कंटेंट को स्वचालित एल्गोरिदम के आधार पर दिखाती हैं। जबकि, वास्तविकता अलग है।
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मार्क जुकरबर्ग, मेटा के सीईओ - फोटो : ANI

विस्तार

मेटा प्लेटफॉर्म्स के सीईओ मार्क जुकरबर्ग द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक फेसबुक पोस्ट कुछ समय के लिए हटाए जाने पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगना और कंटेंट प्रमोशन में वित्तीय हितों की बात स्वीकारना महज कॉपोरेट या तकनीकी गलती नहीं, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल संप्रभुता से जुड़े एक गंभीर प्रश्न की ओर इशारा करता है। उल्लेखनीय है कि ये सोशल मीडिया कंपनियां दुनियाभर में खुद को एक निष्क्रिय मंच बताकर सेफ हार्बर (कानूनी संरक्षण) की मांग करती रही हैं। उनका तर्क होता है कि वे किसी संपादक की तरह कंटेंट का चयन नहीं करतीं, बल्कि उपयोगकर्ताओं द्वारा डाले गए कंटेंट को स्वचालित एल्गोरिदम के आधार पर दिखाती हैं। जबकि, वास्तविकता यह है कि ऐसे प्लेटफॉर्म कंटेंट की मेजबानी करने के साथ यह भी तय करते हैं कि कौन-सा कंटेंट कितने लोगों तक पहुंचेगा, किसे दृश्यता मिलेगी और किसे लगभग अदृश्य ही बना दिया जाएगा। उनके एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं की रुचियों, व्यवहार, क्लिक, देखने के समय, सामाजिक संबंधों व मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण करके तय करते हैं कि कैसा कंटेंट किस व्यक्ति के सामने रखा जाए। इसी कारण ये प्लेटफॉर्म लोगों की सोच, प्राथमिकताओं और यहां तक कि राजनीतिक दृष्टिकोण को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। अगर कोई सोशल मीडिया कंपनी देश के प्रधानमंत्री की पोस्ट को हटाने की ताकत रखती है, तो यह चिंताजनक है, पर वास्तविक चिंता इससे कहीं व्यापक है। अगर ये कंपनियां इतनी ताकतवर हैं कि अपने एल्गोरिदम के जरिये अपवादों को मुख्यधारा का विमर्श बना रही हैं, किसी विषय को कृत्रिम रूप से ट्रेंड करा रही हैं या किसी मुद्दे की पहुंच सीमित कर रही हैं, तो वे किसी निर्वाचित सरकार को भी बंधक बना सकती हैं। यह स्थिति सेंसरशिप से भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि इसमें सूचना पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता, बल्कि उसकी दृश्यता और प्राथमिकता को अपारदर्शी ढंग से नियंत्रित किया जाता है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और स्वतंत्र पत्रकारिता उतनी ही जरूरी है, जितना फर्जी खबरों और दुर्भावनापूर्ण प्रचार पर रोक। लोकतंत्र में अपारदर्शी एल्गोरिदम विचारों को नियंत्रित नहीं कर सकता। लिहाजा, मेटा की माफी पर्याप्त नहीं है। इससे अधिक आवश्यक यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी परिस्थितियां दोबारा उत्पन्न न हों। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया कंपनियां अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं में सुधार करें, लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर संचालित हों और अपने प्रभाव को देखते हुए जवाबदेही भी स्वीकार करें।
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