Hindi News
›
Columns
›
Opinion
›
meta-zuckerberg-apology-social-media-algorithm-accountability-democracy
{"_id":"6a752d556b5c11e47003a08b","slug":"meta-zuckerberg-apology-social-media-algorithm-accountability-democracy-2026-08-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"माफी और जवाबदेही: सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत, एल्गोरिदम और लोकतंत्र के सामने नई चुनौती","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
माफी और जवाबदेही: सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत, एल्गोरिदम और लोकतंत्र के सामने नई चुनौती
ये सोशल मीडिया कंपनियां दुनियाभर में खुद को एक निष्क्रिय मंच बताकर सेफ हार्बर (कानूनी संरक्षण) की मांग करती रही हैं। उनका तर्क होता है कि वे किसी संपादक की तरह कंटेंट का चयन नहीं करतीं, बल्कि उपयोगकर्ताओं द्वारा डाले गए कंटेंट को स्वचालित एल्गोरिदम के आधार पर दिखाती हैं। जबकि, वास्तविकता अलग है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
मेटा प्लेटफॉर्म्स के सीईओ मार्क जुकरबर्ग द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक फेसबुक पोस्ट कुछ समय के लिए हटाए जाने पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगना और कंटेंट प्रमोशन में वित्तीय हितों की बात स्वीकारना महज कॉपोरेट या तकनीकी गलती नहीं, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल संप्रभुता से जुड़े एक गंभीर प्रश्न की ओर इशारा करता है। उल्लेखनीय है कि ये सोशल मीडिया कंपनियां दुनियाभर में खुद को एक निष्क्रिय मंच बताकर सेफ हार्बर (कानूनी संरक्षण) की मांग करती रही हैं। उनका तर्क होता है कि वे किसी संपादक की तरह कंटेंट का चयन नहीं करतीं, बल्कि उपयोगकर्ताओं द्वारा डाले गए कंटेंट को स्वचालित एल्गोरिदम के आधार पर दिखाती हैं। जबकि, वास्तविकता यह है कि ऐसे प्लेटफॉर्म कंटेंट की मेजबानी करने के साथ यह भी तय करते हैं कि कौन-सा कंटेंट कितने लोगों तक पहुंचेगा, किसे दृश्यता मिलेगी और किसे लगभग अदृश्य ही बना दिया जाएगा। उनके एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं की रुचियों, व्यवहार, क्लिक, देखने के समय, सामाजिक संबंधों व मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण करके तय करते हैं कि कैसा कंटेंट किस व्यक्ति के सामने रखा जाए। इसी कारण ये प्लेटफॉर्म लोगों की सोच, प्राथमिकताओं और यहां तक कि राजनीतिक दृष्टिकोण को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। अगर कोई सोशल मीडिया कंपनी देश के प्रधानमंत्री की पोस्ट को हटाने की ताकत रखती है, तो यह चिंताजनक है, पर वास्तविक चिंता इससे कहीं व्यापक है। अगर ये कंपनियां इतनी ताकतवर हैं कि अपने एल्गोरिदम के जरिये अपवादों को मुख्यधारा का विमर्श बना रही हैं, किसी विषय को कृत्रिम रूप से ट्रेंड करा रही हैं या किसी मुद्दे की पहुंच सीमित कर रही हैं, तो वे किसी निर्वाचित सरकार को भी बंधक बना सकती हैं। यह स्थिति सेंसरशिप से भी अधिक खतरनाक है, क्योंकि इसमें सूचना पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता, बल्कि उसकी दृश्यता और प्राथमिकता को अपारदर्शी ढंग से नियंत्रित किया जाता है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और स्वतंत्र पत्रकारिता उतनी ही जरूरी है, जितना फर्जी खबरों और दुर्भावनापूर्ण प्रचार पर रोक। लोकतंत्र में अपारदर्शी एल्गोरिदम विचारों को नियंत्रित नहीं कर सकता। लिहाजा, मेटा की माफी पर्याप्त नहीं है। इससे अधिक आवश्यक यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी परिस्थितियां दोबारा उत्पन्न न हों। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया कंपनियां अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं में सुधार करें, लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर संचालित हों और अपने प्रभाव को देखते हुए जवाबदेही भी स्वीकार करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।