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छोटा बड़ा सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न: 650वीं जयंती पर फिर चर्चा में क्यों संत रविदास?
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संत रविदास
- फोटो :
amar ujala
विस्तार
गुरु रैदास की जयंती इस बार विशेष उत्सव हो गई। इसलिए कि उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके 650वें जन्मदिन पर ‘भदोही’ का नाम बदल कर ‘संत रविदास नगर’ करने की घोषणा की। उत्तर-प्रदेश से शुरू होकर दिल्ली, बिहार और खासकर पंजाब में गुरु रैदास की चर्चा तेज हो गई है।संत रैदास ने दोहरे मोर्चों पर दबाव झेले। उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक सत्ता के प्रलोभनों और धर्म परिवर्तन के दबावों के बावजूद अपने ‘निर्वर्ण संप्रदाय’ को मुस्लिम नहीं बनाया। जबकि, अस्पृश्यता की सबसे बड़ी समस्या से निजात दिलाने का आश्वासन इस्लाम की ओर से उपलब्ध था। रैदास युग में न तो वर्ण बदल पाना संभव था और न पेशा, उन्होंने चर्म कार्य के पेशे को सम्मान की दृष्टि दी। अपनी जाति को हीन भावना से निकाला। कहे रैदास खलास चमारा कहते हुए कहीं से भी ऊंच-नीच की भावना से प्रभावित नहीं हुए। निर्गुण भक्ति के मार्ग पर चलकर उन्होंने उपेक्षित मानव गरिमा की रक्षा की। मन चंगा, तो कठौती में गंगा कहते हुए उन्होंने मन की पवित्रता को महत्व दिया। उन्होंने जाति, पेशे की पहचान और सम्मान को बचाया, और यह कहने में संकोच का अनुभव नहीं किया कि मेरी जाति कुटवां ढला ढोर ढोवन्ता, नितहि बनारस आस पासा।।
समता-मूलक समृद्ध समाज निर्माण की उनकी संकल्पना में ‘बेगमपुरा’ की महान अवधारणा है। ऐसे शहर का निर्माण करना, जिसमें कोई गम, दुख-दर्द का नामो-निशान न हो। मनुष्य का स्वभाव ही सेवा और सहयोग की तत्परता से भरा हो। बनारस क्षेत्र में उनका जन्म हुआ, वहीं पर उनके परंपरागत पंडितों से शास्त्रार्थ हुए। उनसे आग्रह किया गया कि यदि तुम ज्ञानी पंडित हो, तो हमें जनेऊ दिखाओ। साहित्य में भी रैदास की महत्ता गैर-दलित कवियों में भी ससम्मान स्वीकार्य हुई। राजघरानों की बहू मीरा, उनकी शिष्या बनीं। राजस्थान की रानी झाली ने तो गुरु को सोने की पालकी-रथ में बिठाकर नगर में उनकी झांकी निकाली। महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने 1942 में कविता लिखी-दृग, तुम्हें श्रद्धा-सलिल से सींच कर। ज्ञान-गंगा में, समुज्ज्वल चर्मकार, चरण छूकर कर रहा मैं नमस्कार।। रैदास मनुष्यता के सुखों की काल्पनिक दुनिया में ही विचरण नहीं करते थे, बल्कि भौतिक संसार की नई रूपरेखा भी रच रहे थे-फ्रांस की समता, स्वतंत्रता और बंधुता के मूल्यों आधारित क्रांति व साम्यवाद की अवधारणा घोषित होने के करीब चार सौ साल पूर्व वह कह रहे थे-ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न, छोटा बड़ा सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।
रैदास के विचारों ने उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दक्षिण भारत में भी लोगों को प्रेरणा दी। पंजाब में उनको सिख धर्म में जगह मिली, गुरु ग्रंथ साहिब में चालीस शब्द शामिल किए गए। पंजाबी में बौद्ध धर्म की कम, गुरु रविदास की मान्यता ज्यादा है। डॉ. आंबेडकर के प्रति नाराजगी के चलते रविदासिया समाज बौद्ध नहीं बना। कालांतर में जातिभेद से ही व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न हुई। सिखों में अस्पृश्यता का वर्ताव न के बराबर है, किंतु पंजाब में दलित सरदारों को ‘गुरु रविदास गुरुद्वारे’ अलग बनाने पड़े हैं। गैर-दलित सरदारों के गुरुद्वारों में रविदासिया समाज के सिख नहीं जा सकते। मैंने पंजाबी के प्रसिद्ध दलित लेखक और संपादक बलबीर माधोपुरी के साथ पंजाब के कई गांवों में यह प्रत्यक्ष देखा है।
-लेखक डीयू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।