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एक गठबंधन, कई चुनौतियां: नाटो एक साथ कई रणनीतिक और राजनीतिक उलझनों से जूझ रहा, एकता बनाए रखना सबसे बड़ा संकट
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ईरान युद्ध के बीच ट्रंप कर रहे अमेरिका को नाटो से बाहर निकालने पर विचार।
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अमर उजाला
विस्तार
नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) अपने 77 साल के इतिहास के सबसे अहम मोड़ पर खड़ा है। हाल ही में हुए नाटो शिखर सम्मेलन में सामूहिक सुरक्षा को फिर से मजबूत करने, रक्षा पर ज्यादा खर्च करने का वादा करने और यूक्रेन को लगातार समर्थन देने की बात कहकर संगठन ने अपना भरोसा दिखाया। फिर भी, इस गठबंधन के सामने चुनौती अब सिर्फ रूस से नहीं, बल्कि खुद अमेरिका की राजनीतिक प्रतिबद्धता को लेकर बनी अनिश्चितता से ज्यादा पैदा हो रही है।
नाटो को बार-बार 'कागजी शेर' कहने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सवाल उठाया है कि क्या वाशिंगटन को यूरोप की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाना जारी रखना चाहिए, अगर सहयोगी यूरोपीय देश सुरक्षा का ज्यादा बोझ उठाने में नाकाम रहते हैं। हालांकि, अमेरिका नाटो का सबसे जरूरी सैन्य आधार बना हुआ है, लेकिन ट्रंप के बार-बार अमेरिकी प्रतिबद्धता को कम करने की चेतावनी ने यूरोप को ऐसे भविष्य के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया है, जिसके बारे में पहले कभी सोचा भी नहीं गया था। हालांकि यह शिखर सम्मेलन सिर्फ यूक्रेन या रक्षा बजट के बारे में नहीं, बल्कि तेजी से बदलती बहुध्रुवीय दुनिया में नाटो की दीर्घकालिक विश्वसनीयता के बारे में था।
आज नाटो एक साथ कई रणनीतिक, राजनीतिक और तकनीकी चुनौतियों से जूझ रहा है। पहली चुनौती गठबंधन की एकता बनाए रखना है। जहां पूर्वी यूरोप के सदस्य देश रूस को सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं, वहीं दक्षिणी यूरोप के कई देशों की प्राथमिकता अवैध प्रवासन, आतंकवाद और उत्तरी अफ्रीका की अस्थिरता है। दूसरी चुनौती जिम्मेदारी बांटने को लेकर है। दशकों से, अमेरिकी सरकारों का कहना है कि यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सेना पर अत्यधिक निर्भर है। हालांकि, यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद कई देशों ने रक्षा खर्च में काफी बढ़ोतरी की है, पर अब भी काफी अंतर बना हुआ है। तीसरी चुनौती यूक्रेन को लंबे समय तक समर्थन जारी रखना है। चौथी चुनौती तकनीकी प्रतिस्पर्धा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वॉरफेयर, अंतरिक्ष सुरक्षा, हाइपरसोनिक हथियार और क्वांटम टेक्नोलॉजी तेजी से सैन्य रणनीतियों को बदल रही हैं। पांचवीं चुनौती सदस्य देशों के भीतर ही राजनीतिक अनिश्चितता है। बढ़ता राष्ट्रवाद, आर्थिक दबाव, सरकारों का बदलना और विदेशों में सैन्य गतिविधियों को लेकर जनता का बढ़ता संदेह समय के साथ गठबंधन की एकता को कमजोर कर सकता है।
नाटो के बदलते स्वरूप से भारत के सामने नए अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। भारत ने हमेशा अपनी रणनीतिक आजादी बनाए रखी है और औपचारिक सैन्य गठबंधनों का हिस्सा बनने से बचा है। आज के बंटे हुए भू-राजनैतिक माहौल में भी यह नीति सही साबित होती है। हालांकि, नई दिल्ली को ऐसी दुनिया के लिए तैयार रहना होगा, जहां अमेरिका का रणनीतिक ध्यान यूरोप और हिंद-प्रशांत के बीच बंटता रहता है। भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से समझौता किए बिना अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय ताकतों के साथ रक्षा साझेदारी को मजबूत करते रहना चाहिए। रक्षा विनिर्माण बढ़ाना, रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बनना, समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करना और खुफिया सहयोग बढ़ाना भारत की प्रमुख प्राथमिकताएं होनी चाहिए। साथ ही, उसे रूस के साथ बातचीत के स्थिर रास्ते बनाए रखने होंगे और चीन के साथ तेजी से जटिल होते अपने रिश्तों को भी संभालना होगा। हालांकि, नाटो मुख्यतः यूरो-अटलांटिक गठबंधन है, लेकिन इसके निर्णय हिंद-प्रशांत क्षेत्र को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं।
नाटो का भविष्य केवल शिखर सम्मेलन में किए गए वादों पर नहीं, बल्कि ठोस और दीर्घकालिक सुधारों पर निर्भर करेगा। यूरोपीय देशों को रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना होगा। नाटो के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया में भी ज्यादा तेजी लाने और लचीलेपन की जरूरत है। सबसे अहम जरूरत एक ऐसे राजनीतिक भरोसे की है, जो चुनावी बदलावों से प्रभावित न हो।
नाटो शिखर सम्मेलन ने यह दिखाया है कि गठबंधन आज भी सैद्धांतिक रूप से एकजुट है। इस एकजुटता को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रभावी सैन्य क्षमता और जनता के भरोसे में बदलना ही इसकी असली परीक्षा होगी। आने वाले समय में नाटो दुनिया का सबसे सफल सैन्य गठबंधन बना रहेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी कितनी मजबूती से उठाता है और अमेरिका इस गठबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कितनी दृढ़ता से निभाता है।