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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Is a New Political Force Emerging Beyond Traditional Parties? What the Jantar Mantar Protest Means for India

क्या राजनीतिक दलों से बाहर बन रही नई ताकत, जंतर-मंतर आंदोलन का संदेश भारतीय राजनीति में क्या बदलाव लगाएग?

Sun, 02 Aug 2026 07:00 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल पी. चिदंबरम, अमर उजाला
पी. चिदंबरम, अमर उजाला Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Sun, 02 Aug 2026 07:00 AM IST
सार

Indian Politics: जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन और तमिलनाडु में टीवीके के प्रदर्शन ने राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। बिना पारंपरिक संगठन और मजबूत ढांचे के भी क्या जनता बड़ी राजनीतिक ताकत खड़ी कर सकती है। क्या सोशल मीडिया अब राजनीतिक दलों से बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। क्या आने वाले समय में राजनीति का पुराना ढांचा बदल जाएगा।

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Is a New Political Force Emerging Beyond Traditional Parties? What the Jantar Mantar Protest Means for India
भारतीय राजनीति के बदलाव पर पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम क्या कहते हैं? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा जंतर-मंतर पर किए गए आंदोलन ने एक ऐसा सबक सिखाया है, जिसे भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति के 79 वर्षों में राजनीतिक दल अब तक नहीं सीख पाए हैं। इस ‘सबक’ की पहली झलक साल के शुरुआत में ही दिखाई दे गई थी, लेकिन उस पर थोड़ी देर बाद चर्चा करेंगे।

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इतिहास हमें यही सिखाता आया है कि राजनीतिक दल संघर्ष और चुनाव जीतने के माध्यम से बदलाव ला सकते हैं। यह बात आज भी सही है। क्षेत्रीय दलों ने भी राज्यों में चुनाव जीतकर अपने मुद्दों को मजबूती दी। उदाहरण के लिए, द्रविड़ दलों ने राज्यों की भाषा की सर्वोच्चता, राज्यों के अधिकार, सांस्कृतिक पहचान और भूमि सुधार जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1975 में चले आंदोलन ने केंद्र की सरकार को बदल दिया और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संविधान में महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधान जोड़े गए। 1978 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के आंदोलन ने सीमा पार से होने वाले प्रवासन को नियंत्रित करने के लिए कानूनी प्रावधानों का रास्ता तैयार किया।

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असामान्य योग्यताएं

कॉकरोच जनता पार्टी पारंपरिक अर्थों में कोई राजनीतिक दल नहीं है। इसका जन्म एक व्यक्ति-अभिजीत दिपके-की नाराजगी से हुआ। जाहिर तौर पर, दिपके और उनके कुछ मित्र किसी कथित उकसाने वाली टिप्पणी से बेहद आहत हुए थे। इसके बाद दिपके ने एक मंच बनाया और सवाल उठाया-“अगर सारे कॉकरोच एकजुट हो जाएं तो क्या होगा?” 

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उन्होंने घोषणा की कि इस मंच से जुड़ने के लिए व्यक्ति का ‘बेरोजगार, आलसी, लगातार ऑनलाइन रहने वाला और पेशेवर अंदाज में लगातार भड़ास निकालने में सक्षम’ होना जरूरी है। जाहिर है, ऐसे असामान्य मापदंडों पर खरे उतरने वाले लोगों की कमी नहीं है। इनमें छात्र और शोधार्थी भी हैं। ऐसे कई लोग हैं जो नौकरी करते हैं, लेकिन लगातार ऑनलाइन रहते हैं और पेशेवर अंदाज में अपनी नाराजगी जाहिर करने में माहिर हैं। 

जहां तक जानकारी है, इसका कोई औपचारिक संगठन नहीं है, कोई सदस्यता व्यवस्था नहीं है, कोई पंजीकरण नहीं है, न ही कोई घोषित नीतिगत कार्यक्रम या राजनीतिक दल की अन्य पारंपरिक विशेषताएं हैं। इसके बावजूद, 35 दिनों तक चले आंदोलन ने ऐसा असर पैदा किया कि सीजेपी ने दो केंद्रीय मंत्रियों को प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए मजबूर कर दिया, एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, सरकार को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने पड़े और सरकार से लिखित आश्वासन भी हासिल हुआ। यह अपने आप में अभूतपूर्व है।

तमिलनाडु से शुरूआत

  • जैसा कि मैंने कहा, राजनीतिक दलों से परे और उनके बाहर एक नए तरह की राजनीतिक जगह बनने की पहली आहट 2026 में तमिलनाडु में दिखाई दी। जोसेफ विजय ने फरवरी 2024 में एक राजनीतिक दल-तमिलगा वेट्री कझगम (टीवीके)-बनाने की घोषणा की थी, लेकिन यह पारंपरिक राजनीतिक दल के रूप में विकसित नहीं हुआ। हर तरह से देखें तो यह एक अनौपचारिक और ढीले-ढाले ढंग से संगठित प्रशंसक संघ जैसा ही बना रहा। प्रशंसक संघ के अधिकांश पदाधिकारी ही अलग-अलग स्तरों पर टीवीके के पदाधिकारी बन गए।
  • टीवीके ने उम्मीदवारों का चयन जाति, धर्म, लिंग, राजनीतिक विरासत, धन-संपत्ति आदि के आधार पर नहीं किया। 234 में से 200 से अधिक उम्मीदवारों के पास न तो चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त धन था और न ही उन्होंने चुनाव प्रचार में पैसा खर्च किया। अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में टीवीके उम्मीदवारों का चुनाव प्रचार नाममात्र का ही था। 
  • कई उम्मीदवार उस निर्वाचन क्षेत्र के लिए बिल्कुल अपरिचित थे और उनके पास बूथ एजेंट, मतदान एजेंट या मतगणना एजेंट भी बहुत कम थे। विजय ने कुछ रोड शो किए और उससे भी कम चुनावी सभाओं को संबोधित किया। जाहिर तौर पर मतदाताओं के लिए केवल दो चीजें मायने रखती थीं- ‘विजय’ और उनका चुनाव चिह्न ‘सीटी’। इस पूरे घटनाक्रम में असली जादूगर सोशल मीडिया था- इंस्टाग्राम और यूट्यूब। विजय हर जगह दिखाई दे रहे थे और हर घर में उनकी आवाज पहुंच रही थी।
  • टीवीके ने डीएमके और एआईएडीएमके जैसी दो बेहद मजबूत राजनीतिक और चुनावी मशीनों के सामने 108 सीटों पर जीत हासिल की और उसे 35 प्रतिशत वोट मिले। किसी भी राजनीतिक दल, किसी नेता, पत्रकार या चुनावी सर्वेक्षक ने टीवीके की जीत की भविष्यवाणी नहीं की थी। जब चुनाव परिणाम आने शुरू हुए तो टीवीके के लिए भी यह उतना ही अप्रत्याशित था, जितना स्थापित राजनीतिक दलों के लिए चौंकाने वाला।
  • तमिलनाडु के उदाहरण को देखते हुए अब यह कल्पना करना भी असंभव नहीं है कि ऐसे नागरिक, जो एक-दूसरे को जानते तक न हों, आपस में बातचीत न करते हों, किसी संगठन से जुड़े न हों, फिर भी एक ही तरह से मतदान कर सकते हैं और इतने प्रतिनिधियों को चुन सकते हैं कि वे मिलकर सरकार बना लें।

 

दलों के लिए चुनौती

राजनीतिक दलों को तमिलनाडु के चुनाव परिणाम और जंतर-मंतर के आंदोलन से निकले निष्कर्षों का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। संगठित राजनीतिक दल शायद पूरी तरह अप्रासंगिक न हों, लेकिन ‘हाईकमान’, कार्यकारिणी समिति, महासभा, सदस्यता और पार्टी के भीतर होने वाले चुनाव जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं भविष्य में अप्रासंगिक हो सकती हैं। राजनीति में इस्तेमाल होने वाला अप्रिय शब्द ‘वोट बैंक’ भी शायद धीरे-धीरे गायब हो जाए। मोबाइल फोन, ट्विटर (अब एक्स), फेसबुक और इंस्टाग्राम ने नागरिकों को अपनी चुप्पी तोड़ने का साहस दिया है, अब ऐसा लगता है कि उन्होंने डर को भी पीछे छोड़ दिया है। मैं चाहता हूं कि राजनीतिक दलों से परे और उनके बाहर मौजूद यह राजनीतिक क्षेत्र और अधिक विस्तार पाए। जेन-जी और अन्य आंदोलनों से जुड़े युवाओं के सामने अब कई कठिन और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियां हैं...

  • सबसे पहले, उन्हें विश्वविद्यालयों को  अंधरूढ़िवादिता से बाहर निकालना होगा।
  • उन्हें वर्दीधारी पुलिस की बर्बरता, नैतिक पुलिसिंग का सामना करना होगा।
  • उन्हें कानून के जरिये थोपी जा रही नैतिकता और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करना होगा।
  • जेन-जी को स्थानीय राजस्व एवं पंजीकरण कार्यालयों, अस्पतालों, राशन की दुकानों और स्थानीय निकायों में व्याप्त दमनकारी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए आवाज उठानी होगी।
  • जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद ऐसा लगता है कि बेहतर बदलाव की हर संभावना खुली हुई है।
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