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अधर में फलस्तीन का भविष्य: ट्रंप के दावों के बावजूद शांति योजना पर संशय बरकरार, क्या हमास वाकई हथियार छोड़ेगा?
Mon, 03 Aug 2026 05:24 AM IST
शिवम गर्ग
मार्टिन कीर, प्रोफेसर, सिडनी यूनिवर्सिटी
मार्टिन कीर, प्रोफेसर, सिडनी यूनिवर्सिटी
Published by: शिवम गर्ग
Updated Mon, 03 Aug 2026 05:24 AM IST
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इस्राइल-हमास संघर्ष
- फोटो :
ANI
विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि हमास और गाजा के अन्य चरमपंथी संगठन हथियार छोड़ने पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने इसे गाजा में स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में एक 'महत्वपूर्ण कदम' बताया है। ट्रंप के अनुसार, हमास के निरस्त्रीकरण से फलस्तीनी समिति गाजा का प्रशासन संभाल सकेगी और इस्राइली सेना को वहां से हटने का रास्ता मिलेगा। यह कदम उनकी 20-सूत्री शांति योजना का हिस्सा है, जिस पर पिछले साल अक्तूबर में हमास और इस्राइल ने सहमति जताई थी।
हालांकि, हमास के अधिकारियों ने कहा है कि वे इस प्रक्रिया पर सहमत हैं, लेकिन बातचीत में शामिल एक सदस्य ने चेतावनी दी कि उनका हथियार छोड़ना तभी संभव होगा, जब इस्राइल गाजा से पूरी तरह अपनी सेना वापस बुला ले। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या यह वास्तव में शांति की दिशा में निर्णायक कदम है, या अब भी बहुत सारे सवाल अनसुलझे हैं?
यदि हमास वास्तव में पूरी तरह हथियार छोड़ने पर सहमत हो जाता है, तो यह वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी और पूर्वी यरुशलम पर इस्राइली कब्जे के खिलाफ करीब चार दशक से चल रहे संघर्ष में उसकी ओर से एक बड़ी रियायत होगी। हमास की शुरुआत 1987 में दो लक्ष्यों के साथ हुई थी-इस्राइली कब्जे का विरोध करना और फलस्तीनी राजनीति में फतह पार्टी के वर्चस्व को चुनौती देना।
अपने 2017 के चार्टर में हमास ने स्पष्ट कहा था कि वह 'प्रतिरोध और उसके हथियारों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को खारिज करता है।' संगठन के अनुसार, 'सशस्त्र संघर्ष फलस्तीनी जनता के सिद्धांतों और अधिकारों की रक्षा के लिए एक रणनीतिक विकल्प है।' इसके अलावा, फलस्तीनियों के बीच हमास की वैधता का मुख्य आधार उसका सशस्त्र प्रतिरोध ही है। फलस्तीनियों के लिए, यह प्रतिरोध एक स्वतंत्र देश का दर्जा हासिल करने की कोशिशों से जुड़ा हुआ है। यानी भले ही कई फलस्तीनी राजनीतिक रूप से हमास या उसके इस्लामी एजेंडे का समर्थन न करते हों, फिर भी वे इस आंदोलन का सम्मान करते हैं। उनके लिए इस्राइली कब्जे के खिलाफ हमास का लगातार सशस्त्र प्रतिरोध या तो फलस्तीनी राष्ट्र की मांग को मजबूत करता है या फिर इस्राइल के स्थायी कब्जे की कोशिशों को चुनौती देता है।
अक्तूबर 2025 में 'पीपल्स सेंटर फॉर पॉलिसी एंड सर्वे रिसर्च' (पीसीपीएसआर) के सर्वे के अनुसार, 60 फीसदी फलस्तीनियों (वेस्ट बैंक में 66 प्रतिशत और गाजा में 51 फीसदी) ने हमास के प्रदर्शन पर संतोष जताया। वहीं, 69 प्रतिशत लोग (वेस्ट बैंक में 87 फीसदी और गाजा में 55 प्रतिशत) गाजा पट्टी में हमास के हथियार छोड़ने के खिलाफ थे। इसे देखते हुए, यह मानना मुश्किल है कि हमास फलस्तीनियों के बीच अपने इस समर्थन को जोखिम में डालेगा।
शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हमास के निरस्त्रीकरण का मतलब केवल हथियार सौंपना नहीं होगा, बल्कि गाजा में उसके पूरे सैन्य ढांचे को खत्म करना भी होगा। इसमें सुरंगों का नेटवर्क, भारी हथियार, हथियार बनाने के केंद्र और गोला-बारूद के भंडार भी शामिल हैं। हालांकि, गाजा में हुई व्यापक तबाही को देखते हुए यह साफ नहीं है कि इस सैन्य ढांचे का कितना हिस्सा अब भी बचा है। इसी तरह, हमास के पास फिलहाल कितने हथियार हैं, इसकी भी स्पष्ट जानकारी नहीं है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, उसके पास अब भी हजारों ऑटोमैटिक राइफलें और एंटी-टैंक रॉकेट जैसे भारी हथियार हो सकते हैं, लेकिन उनकी वास्तविक संख्या पहले के मुकाबले काफी कम मानी जा रही है। कई अन्य अहम सवाल भी अभी अनुत्तरित हैं। मसलन, हमास से हथियार कौन लेगा और यह कैसे तय होगा कि उसने वास्तव में सभी हथियार सौंप दिए हैं? एक अमेरिकी अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि उसके लिए किसी तीसरे पक्ष की समिति यह जिम्मेदारी निभाएगी, लेकिन इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं दी गई।
इसके अलावा, हमास सिर्फ गाजा पट्टी तक सीमित नहीं है। उसकी मौजूदगी वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में भी है। ऐसे में, यह स्पष्ट नहीं है कि निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया संगठन के उन हिस्सों पर भी लागू होगी या नहीं। वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में कट्टरपंथी यहूदियों की ओर से फलस्तीनियों पर लगातार हो रही हिंसा को देखते हुए, इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि हमास या अन्य फलस्तीनी सशस्त्र आंदोलनों के सदस्य अपनी हिंसा के जरिये इस हिंसा का विरोध करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे में, हथियार छोड़ने और गाजा का प्रशासन किसी अन्य व्यवस्था को सौंपने पर सहमत होना हमास की ओर से एक रणनीतिक कदम हो सकता है। इससे समूह को इस्राइल से मिली भारी शिकस्त के बाद संगठनात्मक रूप से उबरने में मदद मिल सकती है, साथ ही व्यापक फलस्तीनी आबादी के बीच अपने प्रतिरोध के एजेंडे को बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है।
इस समझौते पर इस्राइल की प्रतिक्रिया सबसे बड़ी चुनौती है। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, इस्राइली सरकार ट्रंप की इस शांति योजना पर आपत्ति जता रही है। सिर्फ दो सप्ताह पहले ही इस्राइल के कट्टर दक्षिणपंथी रक्षा और वित्त मंत्रियों ने उत्तरी गाजा में तीन नए 'नाहल' आउटपोस्ट स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था। दरअसल, नाहल आउटपोस्ट ऐसे ठिकाने होते हैं, जहां सैन्य मौजूदगी के साथ खेती और सामुदायिक गतिविधियां भी संचालित की जाती हैं। अतीत में ऐसे कई आउटपोस्ट बाद में स्थायी इस्राइली बस्तियों में बदल चुके हैं। इस्राइल के इस विरोध के कारण समझौता टूट सकता है, जब तक कि ट्रंप प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर शांति प्रक्रिया को जारी रखने के लिए उचित दबाव न डालें। हाल ही में यह दबाव बढ़ना शुरू हो गया था, जब एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अगर इस्राइल इसमें बाधा डालता है, तो ट्रंप 'बेहद निराश' होंगे। (द कन्वर्सेशन)