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न्यायपालिका पर सवाल और पाठ्यपुस्तक विवाद: भरोसा और पुख्ता होना चाहिए
विश्वनाथ सचदेव
Published by: Nitin Gautam
Updated Wed, 11 Mar 2026 07:25 AM IST
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न्यायपालिका में भरोसा पुख्ता होना चाहिए
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अमर उजाला
विस्तार
अब यह बात पुरानी नहीं, बहुत पुरानी लगती है। सातवीं या आठवीं कक्षा में पढ़ता था मैं। सामूहिक गीत गवाए जाने की प्रथा थी तब स्कूल में। दो ऐसे गीतों की पंक्तियां मुझे आज, सत्तर-पिचहत्तर साल बाद भी याद हैं। एक कविता में नया जमाना लाने की बात कही गई थी-‘दे वरदान हमें माता हम निकले आन निभाने को, जहां बेटियां बिकती हैं, बेटों का मोल किया जाता,…ऐसे समाज के ढांचे की हम निकले नींव हिलाने को’ और एक कविता थी-‘मेरा देश, जिसकी मिट्टी सोना उगले, और जहां की भूखी जनता मिट्टी निगले न्याय दास है यहां करेंसी के नोटों का, शासन भिखमंगा है जनता के वोटों का’।आज न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर देश में एक विवाद-सा चल रहा है। हुआ यह है कि शैक्षणिक शिक्षा और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की एक किताब में देश की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक से एक पाठ शामिल किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस पर आपत्ति उठाई। तर्क यह दिया गया की आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले बालक की बुद्धि इतनी परिपक्व नहीं होती कि वह मुद्दे की गहराई को समझ सके। नतीजतन, न्यायालय ने पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया और एनसीईआरटी ने भी अपनी ‘गलती’ के लिए क्षमा मांग कर इसकी बिक्री पर रोक लगा दी।
जितना कुछ मीडिया में आया है उसे देखते हुए यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि उच्चतम न्यायालय को यह आशंका है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में दी गई जानकारी से आठवीं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की बाल-बुद्धि पर गलत प्रभाव पड़ेगा। जब यह बात मैंने पढ़ी, तो अनायास मुझे वे दो कविताएं याद आ गईं, जिनकी चर्चा आलेख के प्रारंभ में की गई है। मैं सोच रहा हूं कि क्या सचमुच इन कविताओं को पढ़कर मेरे मन में ‘जर्जर समाज’ या ‘करेंसी नोटों की दास न्यायपालिका’ के बारे में कोई ऐसी धारणा बन गई थी, जिसे गलत कहा या समझा जा रहा है? सच कहूं तो आठवीं कक्षा की अपनी पढ़ाई के दौरान और आज उसके लगभग सत्तर साल बाद भी, और उस कविता को पसंद करने के बावजूद, न्यायपालिका के बारे में मेरे मन में सम्मान कहीं कम हुआ है।
साफ है कि न्यायपालिका की कार्य प्रणाली और उसकी निष्पक्षता को लेकर कभी-कभार सवाल भले ही उठते रहे हों, पर इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हमारी न्यायपालिका देश की जनता को एक भरोसा देती है। यह भरोसा बना रहे, शायद यही मंशा रही होगी उच्चतम न्यायालय की, जब उसने किताब के एक अध्याय पर सवालिया निशान लगाया। न्याय-व्यवस्था से जुड़े व्यक्ति भी उसी समाज से आते हैं, जिसका हम सब हिस्सा हैं। यह कौन कह सकता है कि हमारा समाज शत-प्रतिशत ईमानदार है?
हमारे न्यायालय में विभिन्न स्तरों पर लाखों मामले लंबित पड़े हैं। और ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसका समाधान न्यायपालिका को स्वयं सोचना होगा। लोकसभा में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में (2016-2025) मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ 8,600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गई हैं। इनमें दिल्ली उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के घर से मिली भारी मात्रा में नकदी का मामला भी शामिल है। अदालत में जनता का विश्वास बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि ऐसे मामलों का निपटारा जल्दी से जल्दी हो। भ्रष्टाचार का मतलब सिर्फ नकद रिश्वत ही नहीं होता। मनवांछित निर्णय पाने के लिए राजनीतिक दबाव भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है। लिहाजा सिर्फ न्याय होना ही पर्याप्त नहीं होता, न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।
यहां एक और आंकड़ा भी मुद्दे की गंभीरता को समझने में मदद कर सकता है। 2007 में जारी ‘ग्लोबल करप्शन रिपोर्ट’ के अनुसार, भारत में किए गए जनमत-सर्वेक्षण में 77 प्रतिशत लोगों ने न्याय व्यवस्था को भ्रष्ट बताया था। आशा की जानी चाहिए कि आज यह स्थिति बेहतर होगी, पर इस आंकड़े से यह संकेत तो लिया ही जाना चाहिए की देश की जनता न्याय-व्यवस्था में भ्रष्टाचार की स्थिति से अवगत भी है और चिंतित भी। यह संभव है कि आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों की बाल-बुद्धि भ्रष्टाचार के मामले की गंभीरता को न समझे, या कुछ गलत निष्कर्ष भी निकाल ले। पर, इससे स्थिति की गंभीरता कम नहीं होती। यदि आठवीं कक्षा में मेरी पीढ़ी न्याय की करेंसी के नोटों का दास वाली बात कुछ-कुछ समझ सकती है, तो आज की पीढ़ी तो कहीं अधिक समझदार है।
इंटरनेट व कृत्रिम मेधा वाले समय में बच्चों से कुछ छिपाकर नहीं, बल्कि बहुत कुछ बताकर कर ही उनके साथ न्याय किया जा सकता है। भरी दोपहर में आंख बंद कर लेने से रोशनी अंधेरे में नहीं बदल जाती। आज सवाल सच को जानने और उसके अनुरूप आवश्यक कार्रवाई के लिए स्वयं को तैयार करने का है।