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अध्यात्म: धरादेवी ने लिया यशोदा का अवतार, भगवान की लीला में ये भी एक नित्य
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माता यशोदा और भगवान कृष्ण
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अमर उजाला
विस्तार
अष्ट वसुओं में श्रेष्ठ द्रोण ने एक बार भगवान ब्रह्मा से प्रार्थना की: ‘हे देव! जब मैं पृथ्वी पर जन्म लूं, तब भगवान श्रीकृष्ण में मेरी भक्ति बनी रहे।’ तब द्रोण की पत्नी धरा भी वहां उपस्थित थीं। धरादेवी ने ब्रह्मा से तो कुछ नहीं कहा, परंतु उनके मन के भीतर भी यही इच्छा थी। ब्रह्मा ने दोनों की इच्छा जानकर उन्हें ‘तथास्तु’ कहा और फिर अंतर्धान हो गए। ब्रह्मा के वरदान के प्रभाव से धरादेवी ने ब्रजमंडल में सुमुख गोप की पत्नी पाटला की पुत्री के रूप में जन्म लिया। उस समय द्वापर युग का अंत निकट था और भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का समय हो चुका था। पाटला ने अपनी कन्या का नाम यशोदा रखा।भगवान की नित्य लीला में भी एक नित्य यशोदा हैं, जो सदा भगवान श्रीकृष्ण को वात्सल्य रस का आस्वादन कराती हैं। अवतार के समय उसी नित्य यशोदा का इस लौकिक यशोदा में समावेश हो गया। इस प्रकार धरादेवी ने यशोदा का रूप लिया और भगवान श्रीकृष्ण की माता बन गईं। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब यशोदा की आयु ढल चुकी थी। उन्होंने वर्षों तक पुत्र के लिए प्रयास किए थे, परंतु उन्हें संतान प्राप्ति नहीं हुई थी। इसलिए जब कृष्ण का जन्म हुआ, तो सारा ब्रज आनंद में डूब गया। छठे दिन पुत्र का छठी पूजन हुआ और यशोदा के वात्सल्य का अनंत प्रवाह बहने लगा, मानो स्वयं परब्रह्म अपनी माता के हृदय को मथकर वात्सल्य के अनमोल रत्न संसार को दिखा रहे हों। कंस द्वारा भेजी गई पूतना अपने स्तनों में विष भरकर आई थी, परंतु यशोदा नंदन ने दूध के साथ उसके प्राण भी पी लिए।
यशोदा कृष्ण के लालन-पालन में डूबी रहतीं। कृष्ण को पलने में सुलाना, उन्हें निहारना और उनके बोलने-चलने की कल्पना करते रहना–यशोदा को दिन-भर बस यही काम थे। फिर एक दिन तृणावर्त दैत्य आया और बाल गोपाल को उड़ाकर आकाश में ले गया। यह दृश्य देखकर यशोदा घबरा गईं। परंतु जब श्रीकृष्ण ने उस दैत्य को भी धरती पर पटक कर मार डाला, तब यशोदा को राहत मिली।
माता और पुत्र के प्रेम में भी मानो प्रतिस्पर्धा थी। यशोदा का वात्सल्य जितना बढ़ता, श्रीकृष्ण की लीला उतनी ही अधिक प्रकट होती जाती थी। मिट्टी खाने की लीला करके श्रीकृष्ण ने यशोदा को ब्रह्मांड का दर्शन कराया, परंतु अगले ही क्षण कृष्ण की माया से यशोदा को उसकी स्मृति नहीं रही और वे फिर अपने बाल गोपाल को दुलारने लगीं। समय बीतता गया। इस बीच कृष्ण माखन चोरी, दही हांडी फोड़ने और गोवर्धन उठाने जैसी लीलाएं करते रहे। वृंदावन में श्रीकृष्ण ने असंख्य लीलाएं कीं और बहुत-से असुरों का उद्धार भी किया।
फिर वह दिन आया, जब अक्रूर श्रीकृष्ण को अपने साथ मथुरा ले गए। यह समय यशोदा के लिए वज्रपात के समान था। कृष्ण के जाने से पहले सारी रात वह विलाप करती रहीं और उन्हें समझाना कठिन हो गया। अंत में योगमाया से वे भ्रांत हो गईं। फिर भी श्रीकृष्ण को विदा करते समय यशोदा की करुण दशा देखकर सब लोग रो पड़े। वह पाथेय तक देना भूल गईं, केवल पुत्र को हृदय से लगाए रोती रहीं।
श्रीकृष्ण के विरह में यशोदा विक्षिप्त-सी हो गईं। जिस मार्ग से उनका रथ गया था, उस मार्ग को वह प्रतिदिन देखने जातीं और राहगीरों से संदेश भिजवातीं। कृष्ण के सखा उद्धव भी यशोदा को दिलासा नहीं दे पाए। अंततः कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से मिलकर उनका हृदय शांत हुआ। कृष्ण से मिलकर लौटते समय यशोदा को लगा, मानो उन्हें उनकी नीलमणि फिर प्रप्त हो गई हो। जब श्रीकृष्ण के अवतरण का उद्देश्य पूर्ण हो गया, उनके अपने धाम लौटने से पहले माता यशोदा गोलोक प्रस्थान कर गई थीं। इस प्रकार ब्रह्मा से मिले वरदान के फलस्वरूप धरादेवी ने यशोदा के रूप में जन्म लेकर कृष्ण को पुत्र रूप में पाया।
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