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गलतफहमियों के तीन मोर्चे: ट्रंप, पुतिन और नेतन्याहू की रणनीतिक भूलें; दुनिया भुगत रही कीमत
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गलतफहमियों का भंवर
- फोटो :
ANI
विस्तार
डोनाल्ड ट्रंप, बेंजामिन नेतन्याहू और व्लादिमीर पुतिन भले ही अलग-अलग व्यक्तित्व हों, लेकिन एक बात उनमें समान है कि तीनों खुद को सबसे अधिक समझदार मानते हैं। अफसोस की बात यह है कि एक नेता के तौर पर अपने आसपास चापलूसों की भीड़ इकट्ठी करके उन्होंने सबसे बेवकूफी भरा काम किया है, जिसकी वजह से वे ऐसी बेकार की लड़ाइयों में फंस गए हैं, जिनसे बाहर निकलने का एकमात्र तरीका अब अपनी गलती मानकर शर्मिंदगी झेलना ही है।बात इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से शुरू करते हैं। नेतन्याहू का रास्ता भटकना और साथ ही मशहूर इस्राइली खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ के नेतृत्व को भी गुमराह कर देना उनके दो ऐसे फैसलों से साफ झलकता है, जो पूरी तरह बेतुके थे। पहला, यह विश्वास कि इस्राइल हवाई हमलों के दम पर तेहरान की सरकार को गिरा सकता है; और दूसरा, यह कि वह ईरान का नया नेता तय कर सकता है। फरवरी में व्हाइट हाउस में हुई बैठक में नेतन्याहू और मोसाद के तत्कालीन निदेशक डेविड बार्निया ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया था कि अगर इस्राइल और अमेरिका ईरान के शीर्ष नेताओं की हत्या कर दे, तो वहां की सरकार गिर जाएगी और अच्छे लोग सत्ता संभाल लेंगे। शायद इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने मान लिया था कि ईरान उसी तरह उनके हाथों में आ जाएगा, जैसे निकोलस मादुरो को हटाने के बाद वेनेजुएला आया था। इस्राइल का यह सोचना कि वह अहमदीनेजाद को सत्ता में बिठा सकता है और यह कि ईरानी समाज उन्हें स्वीकार कर लेगा, पूरी तरह से पागलपन ही है।
ट्रंप और नेतन्याहू, पुतिन की तरह ही सोच रखते हैं। पुतिन ने खुद अपनी ही बनाई गलतफहमी पर यकीन कर लिया था कि यूक्रेन के लोग फिर से ‘मदर रशिया’ का हिस्सा बनने के लिए बेताब हैं और कीव में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार आसानी से गिर जाएगी। सैन्य विश्लेषक रॉबिन लेयर्ड ने कहा कि ईरान में जो हुआ था, ठीक वैसा ही वहां भी हुआ था। ऐसा लगता है कि रूसी खुफिया विभाग ने ‘यूक्रेन के लोगों की सोच और उनकी क्षमताओं के बारे में जमीनी हकीकत बताने के बजाय, रूस-समर्थक सूत्रों पर बहुत ज्यादा भरोसा किया, जिन्होंने मॉस्को को वही बातें बताईं, जो वह सुनना चाहता था।’
हमास, हिज्बुल्ला और तेहरान के खिलाफ रणनीतिक जीत के बावजूद, नेतन्याहू इनमें से किसी को भी इस्राइल के लिए एक नई रणनीतिक हकीकत में नहीं बदल पाए हैं। इसके लिए उन्हें यह साफ करना होगा कि गाजा, लेबनान व ईरान में उनके सैन्य अभियानों का मकसद इलाके को इस्राइली-फलस्तीनी शांति के लिए सुरक्षित बनाना था। मगर, दुनिया देख रही है कि नेतन्याहू गाजा और वेस्ट बैंक को इस्राइल में मिलाने के लिए इस इलाके को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसे हासिल करने के लिए वह बाकी सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हैं-जैसे सऊदी अरब के साथ रिश्ते सामान्य करना, कई युवा अमेरिकियों, डेमोक्रेटिक पार्टी और पश्चिमी यूरोप का समर्थन तथा इस्राइल की न्यायपालिका की आजादी आदि।
इस बीच, बिना किसी सहयोगी, बिना अंतरराष्ट्रीय मंजूरी और बगैर किसी ‘प्लान बी’ के ईरान पर हमला करके ट्रंप ने अमेरिका को कमजोर और अलग-थलग कर दिया है। इस फैसले से तेहरान की तबाही मचाने वाले हथियार विकसित करने की क्षमता खत्म नहीं हुई। उलटे, ट्रंप ने ईरान को बड़े पैमाने पर तबाही मचाने के दो बेहद सस्ते और प्रभावी हथियार थमा दिए-पहला, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का विकल्प; और दूसरा, जब भी ट्रंप ईरान पर बमबारी करें, तब फारस की खाड़ी में मौजूद अमेरिका के सहयोगियों को निशाना बनाने की क्षमता।
पुतिन ने रूस के कमजोर लोकतंत्र को एक ऐसे पुलिसराज में बदल दिया है, जिसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तेल व गैस पर टिकी है और कमजोर है। आज, एआई क्रांति में रूस का कहीं कोई नामो-निशान नहीं है। यह कुछ वैसा ही है, जैसे कार का आविष्कार होने पर पुतिन ने घोड़ों में निवेश करना ज्यादा पसंद किया हो और साथ ही, एक एकजुट रूसी मातृभूमि वाली अपनी 19वीं सदी की कल्पना को भी बनाए रखा हो।
आज हमारे सामने तीन वैश्विक नेता हैं, जो अपनी ही गलतफहमियों के भंवर में कुछ इस तरह फंस चुके हैं, जिनसे निकलने का उन्हें कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा। वे उस संकट से बाहर निकलने का उपाय भी बमबारी में ही तलाश रहे हैं। हमें उन टेढ़ी सोच वाले, निराशावादी और अयोग्य नेताओं को नहीं भूलना चाहिए, जो 1979 से ईरान चला रहे हैं। वे भी ऐसी ही स्थिति में फंसे हैं, जहां से आगे कोई रास्ता नहीं दिखता। अपनी काबिल जनता को सशक्त बनाने के बजाय, ईरान के धार्मिक तानाशाहों ने विरोधियों को गोलियों से चुप कराकर, लोगों पर कट्टरपंथी इस्लाम थोपकर और इस्राइल को मिटाने की कोशिश में अरबों डॉलर बर्बाद करके पिछले 47 वर्षों तक सत्ता में बने रहने का रास्ता चुना। उम्मीद है कि एक दिन वहां के लोग खुद ही उन्हें सत्ता से हटा देंगे, शायद किसी ऐसी ताकत की मदद से, जिसकी किसी को उम्मीद न हो और जो कोई देश भी न हो।
ईरान के नेताओं ने अपने करीबी लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बेपरवाही से पर्यावरण का जबर्दस्त दोहन किया और बहुत-सी नदियों पर बांध बनाए। अब वे ट्रंप या नेतन्याहू से भी कहीं ज्यादा ताकतवर दुश्मन के सामने पूरी तरह कमजोर पड़ गए हैं और वह है कुदरत। ईरान के भविष्य को लेकर सबसे भयावह चेतावनी सात महीने पहले बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स में प्रकाशित एक विश्लेषण में दी गई थी। इसमें कहा गया था कि देश का गहराता जल संकट संभवतः ईरानी संस्थानों को ठप करने में इस्राइल और अमेरिका के संयुक्त प्रयासों से भी अधिक विनाशकारी साबित होगा। विश्लेषकों ने कहा, ‘2025 की गर्मियों में ईरान में जबर्दस्त गर्मी की लहर (हीट वेव) चली। तेहरान समेत कई इलाकों में दिन का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच गया, जिससे सरकारी दफ्तरों और बैंकों को कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा। इस दौरान, तेहरान को पानी आपूर्ति करने वाले बड़े जलाशयों का जलस्तर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। अधिकारियों ने चेतावनी दी कि अगर पानी की आपूर्ति में सुधार नहीं हुआ, तो राजधानी को खाली भी करना पड़ सकता है।’
कुल मिलाकर, आखिरकार ये टकराव बातचीत से ही खत्म होंगे, क्योंकि इनमें से कोई भी नेता अपनी बेवकूफी भरी लड़ाइयां लंबे समय तक नहीं लड़ सकता। सवाल सिर्फ इतना है कि वह समय कब आएगा, जब उन्हें अपनी गलती का एहसास होगा और वे स्वीकार करेंगे कि टकराव के बजाय बातचीत ही सही रास्ता था।
©The New York Times 2026