आज भारतीय क्रिकेट के उस तेज गेंदबाज का जन्मदिन है, जिसने टीम इंडिया को कई मैच दिलाए। विश्व कप 2003 में भारतीय गेंदबाजी की अगुवाई करते हुए जहीर खान से उनका बेस्ट प्रदर्शन निकलवाया। संन्यास लेने के बाद भी दक्षिण भारत का यह खिलाड़ी क्रिकेट मैदान से अलग न हो पाया। अब मैच रेफरी बनकर इस खेल की सेवा कर रहा है। हम बात कर रहे हैं जवागल श्रीनाथ की।
जवागल श्रीनाथ: वो गेंदबाज, जिसे संन्यास लेने के बाद 2003 वर्ल्ड कप के लिए वापस बुलाया गया
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31 अगस्त 1969 को कर्नाटक के मैसूर में जन्में श्रीनाथ आज अपना 50वां जन्मदिन मना रहे हैं। श्रीनाथ को बचपन से ही बल्ले-गेंद से विशेष लगाव था। मारी मल्लप्पा हाई स्कूल से पढ़ाई और फिर इंजीनियरिंग के बावजूद क्रिकेट उनकी आत्मा से निकल नहीं पाई। इस खेल के लिए उनकी जिद और जुनून ही श्रीनाथ को टीम इंडिया तक पहुंचा पाई। ऊंचे कद के सांवले से इस पेसर पर सबसे पहले पूर्व भारतीय टेस्ट बल्लेबाज गुंडप्पा विश्वनाथ की नजर पड़ी, उस वक्त 'विशी' क्लब मैच में चयनकर्ता की भूमिका में थे।
IT इंजीनियर श्रीनाथ ने साल 1989-90 में अपने प्रथम श्रेणी डेब्यू मैच में कर्नाटक की ओर से खेलते हुए इतिहास रच दिया था। हैदराबाद के खिलाफ उन्होंने हैट्रिक ली। डेब्यू मैच में हैट्रिक लगाने वाले वो भारत के तीसरे और कर्नाटक के पहले गेंदबाज थे। छह मैच में 25 विकेट के साथ उन्होंने अपना पहला सीजन खत्म किया। अगले सीजन में भी श्रीनाथ 20 विकेट लेने में कामयाब रहे। नेहरू स्टेडियम, पुणे में अपनी घातक रिवर्स स्विंग के दमपर श्रीनाथ महाराष्ट्र के खिलाफ 7/93 निकालते हुए हीरो बने।
अगले ही साल उन्हें अपने इस प्रदर्शन का फल भी मिला। पहले 18 अक्टूबर 1991 को पाकिस्तान के खिलाफ वन-डे डेब्यू किया तो फिर अगले माह ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट कैप पहनने का मौका मिल गया। जिस वक्त श्रीनाथ की टीम में एंट्री हुई तब कपिल देव भारतीय पेस बैटरी के अगुवा थे।
1995 में कपिल पाजी के संन्यास के बाद श्रीनाथ भारतीय टीम के मुख्य गेंदबाज के रूप में उभरे। बाद में वेंकटेश प्रसाद, अजित आगरकर के साथ उन्होंने तेज गेंदबाजी को नए आयाम दिए। गेंद के साथ-साथ श्रीनाथ बल्लेबाजी के लिए भी पहचाने जाते थे।
1996 टाइटन कप ट्रायंगुलर टूर्नामेंट (भारत, दक्षिण अफ्रीका एवं ऑस्ट्रेलिया) में जब पूरी दुनिया सहित भारतीय टीम ने भी अपनी हार मान ली थी, तब ऐसे मौके पर कुंबले के साथ मिलकर जवागल श्रीनाथ ने कंगारुओं के जबड़े से जीत छीन निकाली थी।
साल 2002 में श्रीनाथ ने क्रिकेट से रिटायरमेंट ले लिया था। कप्तान सौरव गांगुली चाहते थे कि श्रीनाथ 2003 का विश्वकप खेलें। गांगुली के कहने पर ही श्रीनाथ ने 2003 का विश्वकप खेला था। श्रीनाथ ने इस दौरान शानदार गेंदबाजी से ये साबित कर दिया था कि क्यों कप्तान गांगुली को उन पर इतना भरोसा था। पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने 23.06 के शानदार औसत से 16 विकेट्स चटकाए, जबकि उनका इकॉनमी रेट 4.04 का रहा था। 2003 विश्वकप श्रीनाथ के अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का आखिरी टूर्नामेंट था इसके बाद उन्होंने क्रिकेट से संन्यास ले लिया।