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विशाखापट्टनम: अराकू घाटी में कॉफी की खुशबू से महक रही आदिवासियों की आर्थिकी, प्राकृतिक रूप से पूरी तरह जैविक
विशाखापट्टनम से भूपेंद्र राणा
Published by: रेनू सकलानी
Updated Thu, 12 Feb 2026 12:36 PM IST
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सार
अराकू घाटी में शत प्रतिशत आदिवासी परिवार रहते हैं। अराकू घाटी की जलवायु कॉफी उत्पादन के लिए सबसे अच्छी है। वैली में 13 आदिवासी जनजाति रहती है।
कॉफी उत्पादन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
आंध्र प्रदेश के जनजातीय बाहुल क्षेत्र अराकू घाटी में कॉफी की खुशबू से आदिवासियों की आर्थिकी में महक रही है। अराकू क्षेत्र भारत का एक मात्र ऐसा कॉफी उत्पादन क्षेत्र है, जहां पर इस कार्य को पूर्ण रूप से आदिवासी ही करते हैं, जिसमें विशेष रूप से आदिम जनजातीय समूह (पीटीजी) शामिल है।
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अराकू क्षेत्र में विश्व स्तरीय अरेबिका कॉफी का उत्पादन होता है। जो प्राकृतिक रूप से पूरी तरह जैविक है और जीआई टैग प्रमाणित है। यूरोपियन देशों में इस कॉफी का निर्यात होता है। आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामा राजू जिले में स्थित अराकू घाटी में शत प्रतिशत आदिवासी परिवार रहते हैं। आदिवासियों को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के केंद्रीय कॉफी बोर्ड की ओर से तकनीकी जानकारी के साथ ही उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक वित्तीय सहायता दी जा रही है।
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वैली में 13 आदिवासी जनजाति
वर्तमान में इस घाटी के 1.30 लाख आदिवासी परिवार कॉफी उत्पादन से जुड़े हैं। करीब 2.58 लाख एकड़ जमीन पर कॉफी उत्पादन किया जा रहा है। आने वाले समय में कॉफी बोर्ड ने एक लाख एकड़ क्षेत्र में उत्पादन विस्तार करने का लक्ष्य रखा है। अराकू घाटी की जलवायु कॉफी उत्पादन के लिए सबसे अच्छी है। वैली में 13 आदिवासी जनजाति रहती है।
कॉफी बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी सामला रमेश बताते हैं कि अराकू क्षेत्र में आधुनिक खेती तकनीकों, बेहतर बीज, जैविक खेती और प्रसंस्करण सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कॉफी की गुणवत्ता सुधारने के लिए वैज्ञानिक विधियों का उपयोग किया जा रहा है।
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आदिवासी परिवार एक एकड़ में कॉफी उत्पादन से 50 हजार से 3.50 लाख रुपये कमा रहे हैं। उनका जीवन स्तर में सुधार आ रहा है। कॉफी बोर्ड की कनिष्ठ संपर्क अधिकारी वीवी के एम लक्ष्मी ने बताया कि केंद्र सरकार की ओर से कॉफी उत्पादकों को वित्तीय सहायता, बाजार संपर्क और ब्रांडिंग सपोर्ट प्रदान किया जा रहा है।

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