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Body Donation: मिटकर भी अमर हो गई मासूम...पिता ने एम्स ऋषिकेश में आठ दिन के मृत नवजात का किया देहदान

संवाद न्यूज एजेंसी, ऋषिकेश Published by: रेनू सकलानी Updated Tue, 13 Jan 2026 01:31 PM IST
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सार

मिटकर भी मासूम अमर हो गई। चमोली निवासी दंपती के बेटी की इलाज के दौरान मौत हो गई। पिता ने एम्स में आठ दिन के मृत नवजात का देहदान किया।

Body Donation father donated his eight day old deceased newborn body to AIIMS Rishikesh Dehradun News
नवजात - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मानवता की एक ऐसी मिसाल पेश की गई, जिसने सबकी आंखों में आंसू और दिल में सम्मान भर दिया। मात्र 8 दिन की एक नवजात बच्ची की मृत्यु के बाद, उसके माता-पिता ने भारी मन लेकिन अडिग संकल्प के साथ उसका शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए दान कर दिया। उनकी भावना केवल इतनी है कि उनकी बच्ची भविष्य के डॉक्टरों की पढ़ाई में सहायक बनकर किसी और के जीवन को नया उजाला दे सके।

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बीते 2 जनवरी को चमोली निवासी हंसी देवी पत्नी संदीप राम ने मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में एक बेबी को जन्म दिया। शिशु की आंतों में तंत्रिका गुच्छों (गैंग्लिया) का अभाव था। रेफर किए जाने पर बीते चार जनवरी को परिजन नवजात को लेकर एम्स पहुंचे। यहां नवजात का ऑपरेशन किया गया लेकिन रविवार को नवजात की रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक के कारण मृत्यु हो गई।

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परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा

अपने जिगर के टुकड़े को खोने से परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। एम्स के नर्सिंग स्टाफ ने मृत नवजात के परिजनों का संपर्क मोहन फाउंडेशन, उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा से करवाया। अरोड़ा नेत्रदान कार्यकर्ता एवं लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग के साथ एम्स पहुंचे।

अरोड़ा व नारंग ने परिजनों को देहदान के लिए प्रेरित किया। परिजनों की सहमति पर अरोड़ा ने एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग से संपर्क किया और देहदान की औपचारिकताएं पूर्ण कर मृत नवजात की देह विभाग को सौंपी। अरोड़ा पूर्व में भी दो देहदान करवा चुके हैं। एम्स के पीआरओ डॉ. श्रीलॉय मोहंती ने बताया कि उपचार के दौरान आठ दिन के नवजात की मौत हो गई थी। परिजनों ने एम्स को मृत नवजात की देहदान की है।

 

हमारे बच्चे की मृत्यु, किसी और के जीवन का उजाला बन जाए : संदीप

नवजात के पिता संदीप राम ने कहा कि हमारे बच्चे को जन्म से ही आंतों की गंभीर बीमारी थी। तमाम प्रयासों के बावजूद हम उसे बचा नहीं पाए। यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा दुख है। जब संचित अरोड़ा ने हमें देहदान के बारे में बताया, तो हमने यही सोचा कि भले ही हमारा बच्चा इस दुनिया में न रह सका, लेकिन उसका शरीर किसी और बच्चे के जीवन की उम्मीद बन सकता है।

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यहां के छात्र बच्चे के शरीर के माध्यम से पढ़ाई व शोध कर अन्य मासूमों को नई जिंदगी देंगे। संदीप ने कहा कि इस कठिन निर्णय के पीछे केवल एक ही भावना थी कि हमारे बच्चे की मौत किसी और के जीवन की रोशनी बन जाए। यही सोचकर हमने अपने नवजात के शरीर को मेडिकल छात्रों के अध्ययन और मानव कल्याण के लिए समर्पित किया।

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