Kanwar Yatra: जुबां पर भोले का नाम, हाथों में कड़ाही और बेलन; कांवड़ियों ने सड़क किनारे ही सजा ली रसोई
रुड़की से लक्सर की ओर बढ़ते ही ऐसा लग रहा था मानो सड़क किसी विशाल धार्मिक मेले में बदल गई हो। दूर-दूर तक डीजे की बम-बम भोले और हर-हर महादेव के धुन गूंज रही है।
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दोपहर के करीब 12 बजे का समय। कहीं कड़ाही में गर्मागर्म पकौड़ियां छन रही थीं, तो कहीं पूड़ियां बेलकर तली जा रही थीं। किसी वाहन के पास चाय बन रही थी तो कहीं शिवभक्त गद्दों और कुर्सियों पर बैठकर भोजन की तैयारी में जुटे थे। 20 किलोमीटर तक सड़क के किनारे जगह-जगह शिवभक्तों की रसोई सजी थी।
रुड़की से लक्सर की ओर बढ़ते ही ऐसा लग रहा था मानो सड़क किसी विशाल धार्मिक मेले में बदल गई हो। दूर-दूर तक डीजे की बम-बम भोले और हर-हर महादेव के धुन गूंज रही थी। झांकियों और बड़े-बड़े डीजे से सजे डीसीएम व ट्रकों का काफिला धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
इसी बीच सड़क किनारे कुछ ऐसे दृश्य दिखाई दिए, जिन्होंने डाक कांवड़ यात्रा की एक अलग ही तस्वीर पेश कर दी। वाहनों में केवल कांवड़ और डीजे ही नहीं, बल्कि गैस सिलिंडर, राशन, तेल के कनस्तर, बर्तन और खाने-पीने का पूरा सामान भी साथ चल रहा था। लक्सर मार्ग पर कई जगहों पर शिवभक्तों ने अपने वाहन रोककर अस्थायी रसोई सजा ली थी।
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भोजन तैयार होने तक भक्ति गीतों पर झूमना, साथियों के साथ हंसी-मजाक करना और फिर प्रसाद की तरह मिल-बांटकर भोजन करना, यह दृश्य हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहा था। सोनीपत से आए शिवभक्त रामशरण ने बताया कि वह करीब 40 साथियों के जत्थे के साथ तीसरी बार कांवड़ यात्रा पर निकले हैं।
उनका कहना है कि अपने हाथों से बनाया गया भोजन खाने का अलग ही आनंद है। वहीं फरीदाबाद से पहुंचे 20 लोगों के जत्थे में शामिल गुरुशरण का कहना था कि इससे शुद्ध भोजन मिलता है और बाहर के खाने पर निर्भरता भी नहीं रहती। जब भी भूख लगे अपनी सुविधा के अनुसार परिवार की तरह बैठकर खाने से उसमें भक्ति का स्वाद भी मिल जाता है।