Dehradun: टी-एस्टेट, नाम नहीं बदला पर खुशबू चली गई, कंक्रीट के बोझ सहन नहीं कर पाए दून के चाय बागान
टी-एस्टेट...नाम नहीं बदला पर खुशबू चली गई। देहरादून के चाय बागान कंक्रीट के बोझ सहन नहीं कर पाए। कभी दून में 52 चाय बागान थे। अब महज पांच बचे हैं।
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बंजारावाला टी-एस्टेट, कांवली टी-एस्टेट, सिरमौर टी-एस्टेट... इनका नाम देहरादून के बड़े चाय बागानों में शुमार था। नाम अब भी यही है लेकिन चाय की खुशबू यहां से गायब हो चुकी है। देहरादून के चाय बागान दशकों से चले आ रहे अनियंत्रित कंक्रीट के बोझ को सहन नहीं कर सके।
यही कारण है कि करीब तीन दशक पहले जो देहरादून हर साल लाखों किलो चाय पत्तियों का उत्पादन करता था अब यह महज कुछ हजार में ही सिमट कर रह गया है। भारत में चाय उत्पादन की शुरुआत अंग्रेजी शासनकाल में हुई थी। वर्ष 1850 के दशक में असम के बाद दूसरा चाय बागान देहरादून के कौलागढ़ में ही लगाया गया था। इसके बाद धीरे-धीरे चाय बागान बढ़ते गए।
सबसे बड़ी कंपनी थी डीटीसी
एक समय में देहरादून में कांवली, जीएमएस रोड, बल्लूपुर, कौलागढ़, बंजारावाला, रायपुर, हर्बटपुर चारों ओर चाय बागान हुआ करते थे। ईस्ट होपटाउन कंपनी के कर्मचारी रहे शशि प्रसाद बताते हैं कि यहां 52 बड़े चाय बागान थे। वर्ष 1990-91 तक ही सभी बड़ी कंपनियां यहां से हर साल लगभग 6.50 लाख किलोग्राम चाय पत्ती का उत्पादन करती थीं। इनमें सबसे बड़ी कंपनी डीटीसी थी।
वर्तमान में देहरादून में चाय का उत्पादन महज 10 से 12 हजार किलोग्राम पत्तियों का रह गया है। इसमें ग्रीन टी और ब्लैक टी दोनों शामिल हैं। अब यहां पर गिने चुने चाय बागान रह गए हैं। इनमें मोहकमपुर जो कि अब लगभग खत्म होने की कगार पर है। आर्केडिया टी-एस्टेट, हरबंशवाला टी-एस्टेट, ईस्ट होपटाउन अंबीवाला टी-एस्टेट और हर्बटपुर के दो चाय बागान शामिल हैं। कभी हजारों मजदूरों का घर-परिवार इनसे चलता था लेकिन अब कुछ सौ मजदूर ही इन चाय बागानों में काम कर रहे हैं।
चाय बागानों पर माफिया की है गिद्द दृष्टि
चाय बागानों का नाम कई बार विवादों में रहा है। प्रेमनगर क्षेत्र के चाय बागानों से गांवों की जमीनों की सीमा लगती है। ऐसे में कई बार इस तरह के मामले सामने आए कि लोगों ने इन गांवों की जमीनों का सीमांकन कराया तो कुछ हिस्सा चाय बागान की जमीन का भी शामिल कर लिया। जमीनों के इस खेल में कई लोगों के खिलाफ यहां मुकदमे भी दर्ज हुए।
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अब भी चल रहा है खेल मैदान का मामला
वर्ष 2018 में ईस्ट होपटाउन अंबीवाला टी-एस्टेट में 60 बीघा चाय बागान को नष्ट कर यहां पर खेल मैदान बना दिया गया। उस वक्त अमर उजाला ने ही इस मामले को उठाया तो प्रशासन जागा और माना कि यहां पर नियमों का उल्लंघन हुआ था। उस वक्त जिला प्रशासन ने इस जमीन को सरकार में निहित करने के लिए एक रिपोर्ट भी शासन को भेजी। हालांकि, अब तक इस मामले में कुछ नहीं हुआ और यहां आज भी खाली मैदान ही पड़ा हुआ है।