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Uttarakhand: बारिश न बर्फबारी...प्रदेश की आर्थिकी पर पड़ने लगी भारी, बनने लगे सूखे जैसे हालात

अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून/चमोली/श्रीनगर Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 11 Jan 2026 05:20 PM IST
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सार

प्रदेश में बारिश न होने से कई जिलों में सूखे जैसे हालात पैदा होने लगे हैं। इससे गेहूं सहित कई अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं की फसल को 15 से 25 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है।

Uttarakhand: Neither rain nor snowfall lack of precipitation is starting to have a severe impact on the state'
बारिश से न होन से सूखी घास - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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उत्तराखंड में इस साल कम बर्फबारी और बारिश ने राज्य की आर्थिकी पर गहरी चोट की है। इससे न सिर्फ पहाड़ों में पर्यटन कारोबार प्रभावित हुआ है बल्कि फसलों पर भी मार पड़ी है। यही नहीं बारिश और बर्फबारी न होने से जंगल में आग की घटनाएं भी बढ़ी हैं। स्थिति यह है कि 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ में आमतौर पर दिसंबर में बर्फ की चादर जम जाती थी, लेकिन इस वर्ष जनवरी के करीब मध्य तक क्षेत्र पूरी तरह बर्फ विहीन बना हुआ है। यहां पर पहली बार ऐसी स्थिति देखी जा रही है। इससे विशेषज्ञ भी पौधों के प्राकृतिक जीवन चक्र प्रभावित होने की आंशका जता रहे हैं। राहत की बात है कि जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद से बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई जा रही है।

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प्रदेश में बारिश न होने से कई जिलों में सूखे जैसे हालात पैदा होने लगे हैं। इससे गेहूं सहित कई अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, गेहूं की फसल को 15 से 25 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है।
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दरअसल प्रदेश में अक्तूबर व नवंबर में गेहूं की बुवाई की जाती है। खासकर पर्वतीय जिलों में 15 नवंबर तक गेहूं की बुवाई हो जाती है। यहां 90 फीसदी भूमि असिंचित होने की वजह से फसलें पूरी तरह से बारिश पर निर्भर हैं, लेकिन बारिश न होने से पहाड़ के किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। वहीं, कृषि विभाग की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी व डुंडा ब्लॉक में गेहूं की 25 प्रतिशत फसल खराब हो चुकी है। चिन्यालीसौंड व पुरोला में 15, नौगांव में 20 और मोरी ब्लॉक में 10 प्रतिशत नुकसान हुआ है। देहरादून जिले के चकराता व कालसी में गेहूं व मटर की फसल को 15 से 20 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बारिश न होने से फसल का जमाव कम हुआ है। इससे जिले के रायपुर ब्लॉक में पांच से दस प्रतिशत फसल प्रभावित हुई है। इसके अलावा चमोली में 10 से 15, अल्मोड़ा में पांच से दस, टिहरी में 15 से 20, नैनीताल में पांच से 15, रुद्रप्रयाग में पांच से 10, चंपावत व बागेश्वर में 10 से 15, पिथौरागढ़ में आठ से 10 प्रतिशत फसल को नुकसान हुआ है। कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक जल्द बारिश न हुई तो पर्वतीय जिलों में फसल पूरी तरह से खराब हो जाएगी। बागवानी पर भी असर पड़ने की आशंका गहरा रही है।

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जड़ी-बूटियों पर मंडराया संकट
तुंगनाथ में स्थित गढ़वाल विश्वविद्यालय का एल्पाइन रिसर्च सेंटर उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों के संरक्षण, संवर्धन और उत्पादन पर कार्य कर रहा है। यहां अतीस, कुटकी, जटामांसी, वन तुलसी सहित कई महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पतियों पर शोध किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, बर्फ का अभाव इन पौधों के प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित कर रहा है। गढ़वाल विवि के प्रो. पदमश्री एनएन पुरोहित के निर्देशन में 1985 से तुंगनाथ स्थित विवि के एल्पाइन शोध केंद्र में कार्य शुरू हो गया था, तब से पहली बार यहां जनवरी में बर्फ विहीन स्थिति देखी जा रही है। गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूगोलवेत्ता प्रो. मोहन पंवार बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है। तुंगनाथ जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में जनवरी में बर्फ का न होना असामान्य ही नहीं, बल्कि चिंताजनक संकेत हैं।

पांच वर्षों में केवल एक बार दिसंबर में हुई सामान्य बरसात
मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून के निदेशक डॉ. सी.एस. तोमर ने बताया कि दिसंबर में बारिश कम होने की स्थिति के मामले भी पहले भी रहे हैं। वर्ष-2020 से 2025 तक दिसंबर के महीने में सामान्य या उससे अधिक बारिश केवल वर्ष-2024 में हुई थी। जनवरी की बात करें तो जनवरी-2020 और 2022 दो साल ही ऐसे रहे हैं, जब सामान्य या उससे अधिक बारिश हुई है। इस समय पश्चिम विक्षोभ जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में सक्रिय है। जनवरी के दूसरे सप्ताह में बारिश और बर्फबारी होने की संभावना रहेगी। पहले भी देखा गया है कि जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद ही बारिश होने या तापमान में कमी आती है।

जंगल की आग की घटनाएं सामने आ रहीं
नवंबर-2025 के बाद से वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में 31 वनाग्नि की घटना हो चुकी है। इसमें 15 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल को नुकसान हो चुका है। मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक कहते हैं कि जंगल की आग के दृष्टिगत मौसम एक महत्वपूर्ण पहलू है। वनों की आग के नियंत्रण के लिए हर संभव कदम उठाए गए हैं। विदित हो कि बारिश और बर्फबारी होने से जंगल में नमी रहती है। जंगल के शुष्क न होने से वनों में आग की घटनाएं कम होने की संभावना रहती है।

गढ़वाल विवि के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध संस्थान के निदेशक एवं जड़ी-बूटी विशेषज्ञ डॉ. विजयकांत पुरोहित बताते हैं कि अल्पाइन क्षेत्र की अधिकांश औषधीय वनस्पतियां शीतकालीन बर्फ पर निर्भर रहती हैं। बर्फ न केवल तापमान को संतुलित रखती है, बल्कि नमी का स्थायी स्रोत भी होती है। यदि बर्फ नहीं गिरी तो जड़ी-बूटियों के अंकुरण, वृद्धि और औषधीय गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। गढ़वाल विवि का तुंगनाथ में एल्पाइन शोध केंद्र है, बर्फबारी न होने से यहां शोध कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
- डॉ. विजयकांत पुरोहित, निदेशक उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध संस्थान

प्रदेश में सूखे से फसलों को क्षति की 10 जिलों की रिपोर्ट मिल चुकी है। बारिश न होने से फसलों के पैदावार में भी कमी आई है। पत्तियां भी पीली होने लगी हैं। जल्द बारिश न हुई तो नुकसान बढ़ सकता है।
- दिनेश कुमार, कृषि निदेशक

सेब के लिए चिलिंग रिक्वायरमेंट (शीतलन आवश्यकता) 1000-1500 घंटों तक जरूरी है। बारिश और बर्फबारी न होने से सेब के साथ ही अन्य फसलों पर भी इसका असर पड़ेगा। 
- डॉ अजीत सिंह नैन, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक पंतनगर विश्वविद्यालय

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