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विश्व पर्यावरण दिवस: जहां गईं वहां से लाईं बीज, सरोजनी मैठाणी ने बंजर भूमि पर बोए और तैयार कर दिया जंगल

दीपक बिष्ट, संवाद न्यूज एजेंसी, रुद्रप्रयाग Published by: Renu Saklani Updated Fri, 05 Jun 2026 01:48 PM IST
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सार

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की सरोजनी मैठाणी ने ससुराल की बंजर भूमि को हराभरा बना दिया। जहां गईं वहां से बीज लाईं। बंजर भूमि पर बोए और जंगल  तैयार कर दिया।

World Environment Day Story Sarojini Maithani transformed her in-laws barren land into a lush green area
सरोजनी मैठाणी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

एक महिला, एक संकल्प और हजारों पेड़। सिल्ला बामण गांव में जन्मीं सरोजनी मैठाणी ने वर्षों पहले अपने ससुराल की बंजर पड़ी भूमि पर पौधे लगाने शुरू किए थे। वह जहां भी जातीं वहां से बीज लेकर आतीं और उन्हें जमीन में बो देतीं। उनका यह प्रयास ऐसा अभियान बन गया कि आज बंजर भूमि पर जंगल तैयार हो गया है।

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सरोजनी मैठाणी (57) का जीवन उत्तराखंड की उस मातृशक्ति की कहानी है जिसने जल, जंगल और जमीन को हमेशा परिवार का हिस्सा माना। बचपन से ही उनका लगाव खेतों, जंगलों और पौधों से रहा। उन्होंने पढ़ाई के साथ खेती-बाड़ी में अपनी मां का हाथ भी बंटाया। विवाह के बाद मक्कूमठ क्षेत्र में रहते हुए उनका जुड़ाव वन संरक्षण आंदोलनों से हुआ।
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मक्कूमठ वन आंदोलन, शराबबंदी आंदोलन और कोयला खदान बंदी जैसे जन आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीणों को चारा, ईंधन और पशुओं के लिए पत्तियां जुटाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। यह चिंता उनके पर्यावरण संरक्षण अभियान की प्रेरणा बनी। उन्होंने अपने ससुराल के बंजर खेतों में पौधरोपण और बीज बोने शुरू कर दिए।
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वह जहां भी जातीं वहां से स्थानीय और हिमालयी प्रजातियों के बीज एकत्र कर लातीं और उन्हें बो देतीं। वर्षों की मेहनत के बाद आज बंजर भूमि पर बांज, बुरांश, रिंगाल, अंगा, अयार, छंछरा, तिमला, माल्टा, नारंगी, ठेलका आदि का जंगल तैयार हो चुका है। इस तरह सरोजनी मैठाणी पारंपरिक बीज संरक्षण, जैविक खेती और पर्यावरण आधारित जीवनशैली को बढ़ावा देने का भी काम कर रही हैं। वर्ष 2026 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कल्याणी सम्मान से सम्मानित किया गया। सरोजनी मैठाणी कहती हैं कि मैंने कभी पेड़ लगाने को अभियान नहीं माना। जहां भी कोई अच्छा बीज दिखता था उसे लाकर खेतों में बो देती थीं। आज जब उन पौधों को बड़े पेड़ों के रूप में देखती हूं तो लगता है कि प्रकृति ने मेरी मेहनत का कई गुना लौटाया है।
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