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Delhi NCR News: 239 मातृ मौतें और 838 शिशुओं की मौत, मेवात में सुरक्षित प्रसव की खुली पोल
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- स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े नेटवर्क के बावजूद नहीं थम रहा जच्चा-बच्चा मौत का सिलसिला, निजी अस्पतालों की निगरानी पर भी उठे सवाल
मेवात में सुरक्षित प्रसव पर सवाल: पांच साल में 239 जच्चाओं की मौत, एक साल में 838 शिशुओं ने गंवाई जान
रिजवान खान
नूंह।
मेवात में सुरक्षित प्रसव और जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य को लेकर सरकारी दावों के बीच सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान प्रसव के दौरान 239 महिलाओं की मौत दर्ज की गई है। वहीं, वर्ष 2025-26 में 838 शिशुओं की मौत सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुई। चिंता की बात यह है कि घरों में होने वाले प्रसव और कुछ अपंजीकृत निजी संस्थानों में होने वाली मौतों का पूरा रिकॉर्ड सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाता। ऐसे में वास्तविक स्थिति इससे भी गंभीर होने की आशंका है।
योजनाएं अनेक, फिर भी मौतों पर लगाम नहीं : सरकार की ओर से संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, एनीमिया नियंत्रण और प्रसव के दौरान आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद जच्चा-बच्चा मृत्यु के आंकड़े सवाल खड़े कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि योजनाओं और संसाधनों के बावजूद उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।
जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा नेटवर्क : नूंह जिले में एक मेडिकल कॉलेज, एक जिला नागरिक अस्पताल, 111 सब सेंटर, 18 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और चार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। इसके अलावा जिले में 105 निजी अस्पताल पंजीकृत हैं। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि इन संस्थानों के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके बावजूद प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजातों की मौत व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े करती है।
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एनीमिया और समय पर अस्पताल न पहुंचना बड़ी चुनौती : ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और संस्थागत प्रसव को लेकर जागरूकता की कमी भी बड़ी चुनौती है। कई मामलों में महिलाएं कम हीमोग्लोबिन के बावजूद प्रसव के लिए पहुंचती हैं। प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने पर ऐसी महिलाओं की स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। समय पर खून, विशेषज्ञ चिकित्सक और जरूरी चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलने पर मामला जानलेवा हो सकता है।
निजी अस्पतालों की निगरानी पर भी सवाल : कुछ निजी अस्पतालों में कम हीमोग्लोबिन वाली महिलाओं का प्रसव कराने और प्रसव को जल्द कराने के लिए प्रतिबंधित दवाइयों या इंजेक्शन के इस्तेमाल के आरोप सामने आते रहे हैं। हालांकि किसी अस्पताल की जिम्मेदारी जांच और कार्रवाई के बाद ही तय की जा सकती है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार 2025 में 16 निजी अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जबकि 2026 में अब तक चार निजी अस्पतालों पर कार्रवाई हो चुकी है। छापेमारी के दौरान प्रतिबंधित दवाइयां भी बरामद की गईं।
हादसों पर एक नजर
7 दिसंबर 2024: नूंह के निजी क्लीनिक में कथित जबरन डिलीवरी के दौरान आयशा और उसके नवजात की मौत हो गई। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया।
23 सितंबर 2024: पिनगवां के निजी क्लीनिक में 6.8 ग्राम हीमोग्लोबिन वाली गर्भवती की डिलीवरी कराने का आरोप लगा। हालत बिगड़ने पर नलहड़ मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां उसकी मौत हो गई।
11 जून 2025: नूंह के निजी अस्पताल में महिला की मौत के मामले में तीन डॉक्टरों समेत पांच लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। परिजनों ने ऑपरेशन में लापरवाही का आरोप लगाया।
सिकरावा मामला: एक कथित अवैध क्लीनिक में गर्भवती महिला और उसके नवजात की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने छापा मारकर एमटीपी किट और चिकित्सा उपकरण बरामद किए।
आंकड़ों से आगे वास्तविकता जानने की जरूरत : जच्चा-बच्चा मृत्यु के सरकारी आंकड़े केवल दर्ज मामलों की तस्वीर दिखाते हैं। घर पर होने वाले प्रसव, अपंजीकृत संस्थानों में इलाज और वहां होने वाली मौतों का पूरा रिकॉर्ड सामने नहीं आने से वास्तविक स्थिति का आकलन मुश्किल है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती सिर्फ आंकड़े कम करने की नहीं, बल्कि हर मातृ एवं शिशु मृत्यु की गहन समीक्षा, गर्भवती महिलाओं की नियमित निगरानी, एनीमिया नियंत्रण, समय पर रेफरल और निजी अस्पतालों की सख्त मॉनिटरिंग की है। मेवात में सुरक्षित प्रसव व्यवस्था की असली परीक्षा सरकारी योजनाओं और अस्पतालों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से होगी कि प्रसव के दौरान कितनी जिंदगियां बचाई जा रही हैं।
जिले के लोगों से अपील है सरकार द्वारा सभी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही है, उनका लाभ उठाएं। निजी अस्पतालों में प्रसव कराने से बचें। विभाग के पास अगर कोई शिकायत आती है तो उसपर कार्रवाई की जाती है। जिले में जागरूकता अभियान समय-समय पर चलाया जाता है।
डॉ विशाल सिंगला, सीनियर डॉक्टर।
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मेवात में सुरक्षित प्रसव पर सवाल: पांच साल में 239 जच्चाओं की मौत, एक साल में 838 शिशुओं ने गंवाई जान
रिजवान खान
नूंह।
मेवात में सुरक्षित प्रसव और जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य को लेकर सरकारी दावों के बीच सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान प्रसव के दौरान 239 महिलाओं की मौत दर्ज की गई है। वहीं, वर्ष 2025-26 में 838 शिशुओं की मौत सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुई। चिंता की बात यह है कि घरों में होने वाले प्रसव और कुछ अपंजीकृत निजी संस्थानों में होने वाली मौतों का पूरा रिकॉर्ड सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाता। ऐसे में वास्तविक स्थिति इससे भी गंभीर होने की आशंका है।
योजनाएं अनेक, फिर भी मौतों पर लगाम नहीं : सरकार की ओर से संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, एनीमिया नियंत्रण और प्रसव के दौरान आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद जच्चा-बच्चा मृत्यु के आंकड़े सवाल खड़े कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि योजनाओं और संसाधनों के बावजूद उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।
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जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा नेटवर्क : नूंह जिले में एक मेडिकल कॉलेज, एक जिला नागरिक अस्पताल, 111 सब सेंटर, 18 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और चार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। इसके अलावा जिले में 105 निजी अस्पताल पंजीकृत हैं। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि इन संस्थानों के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके बावजूद प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजातों की मौत व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े करती है।
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एनीमिया और समय पर अस्पताल न पहुंचना बड़ी चुनौती : ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और संस्थागत प्रसव को लेकर जागरूकता की कमी भी बड़ी चुनौती है। कई मामलों में महिलाएं कम हीमोग्लोबिन के बावजूद प्रसव के लिए पहुंचती हैं। प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने पर ऐसी महिलाओं की स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। समय पर खून, विशेषज्ञ चिकित्सक और जरूरी चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलने पर मामला जानलेवा हो सकता है।
निजी अस्पतालों की निगरानी पर भी सवाल : कुछ निजी अस्पतालों में कम हीमोग्लोबिन वाली महिलाओं का प्रसव कराने और प्रसव को जल्द कराने के लिए प्रतिबंधित दवाइयों या इंजेक्शन के इस्तेमाल के आरोप सामने आते रहे हैं। हालांकि किसी अस्पताल की जिम्मेदारी जांच और कार्रवाई के बाद ही तय की जा सकती है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार 2025 में 16 निजी अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जबकि 2026 में अब तक चार निजी अस्पतालों पर कार्रवाई हो चुकी है। छापेमारी के दौरान प्रतिबंधित दवाइयां भी बरामद की गईं।
हादसों पर एक नजर
7 दिसंबर 2024: नूंह के निजी क्लीनिक में कथित जबरन डिलीवरी के दौरान आयशा और उसके नवजात की मौत हो गई। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया।
23 सितंबर 2024: पिनगवां के निजी क्लीनिक में 6.8 ग्राम हीमोग्लोबिन वाली गर्भवती की डिलीवरी कराने का आरोप लगा। हालत बिगड़ने पर नलहड़ मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां उसकी मौत हो गई।
11 जून 2025: नूंह के निजी अस्पताल में महिला की मौत के मामले में तीन डॉक्टरों समेत पांच लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। परिजनों ने ऑपरेशन में लापरवाही का आरोप लगाया।
सिकरावा मामला: एक कथित अवैध क्लीनिक में गर्भवती महिला और उसके नवजात की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने छापा मारकर एमटीपी किट और चिकित्सा उपकरण बरामद किए।
आंकड़ों से आगे वास्तविकता जानने की जरूरत : जच्चा-बच्चा मृत्यु के सरकारी आंकड़े केवल दर्ज मामलों की तस्वीर दिखाते हैं। घर पर होने वाले प्रसव, अपंजीकृत संस्थानों में इलाज और वहां होने वाली मौतों का पूरा रिकॉर्ड सामने नहीं आने से वास्तविक स्थिति का आकलन मुश्किल है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती सिर्फ आंकड़े कम करने की नहीं, बल्कि हर मातृ एवं शिशु मृत्यु की गहन समीक्षा, गर्भवती महिलाओं की नियमित निगरानी, एनीमिया नियंत्रण, समय पर रेफरल और निजी अस्पतालों की सख्त मॉनिटरिंग की है। मेवात में सुरक्षित प्रसव व्यवस्था की असली परीक्षा सरकारी योजनाओं और अस्पतालों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से होगी कि प्रसव के दौरान कितनी जिंदगियां बचाई जा रही हैं।
जिले के लोगों से अपील है सरकार द्वारा सभी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही है, उनका लाभ उठाएं। निजी अस्पतालों में प्रसव कराने से बचें। विभाग के पास अगर कोई शिकायत आती है तो उसपर कार्रवाई की जाती है। जिले में जागरूकता अभियान समय-समय पर चलाया जाता है।
डॉ विशाल सिंगला, सीनियर डॉक्टर।