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Delhi NCR News: गर्भावस्था में वायु प्रदूषण से भ्रूण के प्रजनन अंगों पर पड़ सकता है असर, हालांकि पर्याप्त प्रमाण नहीं
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हाइपोस्पेडियास जैसी जन्मजात समस्या से जोड़कर हो रहा अध्ययन
विशेषज्ञ बोले घबराएं नहीं, अधिकांश गर्भधारण सामान्य
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से गर्भ में पल रहे लड़कों के प्रजनन अंगों के विकास पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अभी तक इसके प्रत्यक्ष संबंध के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं और इस विषय पर बड़े स्तर पर शोध की आवश्यकता है। डॉक्टरों के अनुसार, कुछ प्रदूषकों में ऐसे रसायन होते हैं जो शरीर के हार्मोन के कामकाज में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जिससे हाइपोस्पेडियास जैसी जन्मजात समस्या हो सकती है।
एम्स दिल्ली के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. प्रभुद्ध गोयल ने बताया कि प्लास्टिक, कीटनाशकों, औद्योगिक प्रदूषण और दूषित हवा में मौजूद रसायन प्लेसेंटा के जरिए भ्रूण तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने कहा कि इनका संबंध अविकसित अंडकोष, शुक्राणुओं की गुणवत्ता में कमी व टेस्टिकुलर कैंसर के खतरे से भी जोड़ा गया है।
पीडियाट्रिक सर्जरी एवं यूरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. शांडिप कुमार सिन्हा ने कहा कि अभी यह साबित नहीं है कि केवल प्रदूषण हाइपोस्पेडियास का कारण है। आनुवंशिकी, मां का स्वास्थ्य, हार्मोन व पर्यावरण सभी भूमिका निभा सकते हैं।
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विशेषज्ञों ने गर्भवती महिलाओं को नियमित जांच, संतुलित आहार, तंबाकू व रसायनों से बचाव और प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलने से परहेज की सलाह दी। साथ ही कहा कि अधिकांश गर्भधारण सामान्य होते हैं, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। हाइपोस्पेडियास का समय पर पता चलने पर सफल ऑपरेशन संभव है, इसलिए जन्म के बाद किसी भी असामान्यता पर तुरंत बाल शल्य चिकित्सक से संपर्क करें।
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विशेषज्ञ बोले घबराएं नहीं, अधिकांश गर्भधारण सामान्य
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से गर्भ में पल रहे लड़कों के प्रजनन अंगों के विकास पर असर पड़ सकता है। हालांकि, अभी तक इसके प्रत्यक्ष संबंध के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं और इस विषय पर बड़े स्तर पर शोध की आवश्यकता है। डॉक्टरों के अनुसार, कुछ प्रदूषकों में ऐसे रसायन होते हैं जो शरीर के हार्मोन के कामकाज में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जिससे हाइपोस्पेडियास जैसी जन्मजात समस्या हो सकती है।
एम्स दिल्ली के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. प्रभुद्ध गोयल ने बताया कि प्लास्टिक, कीटनाशकों, औद्योगिक प्रदूषण और दूषित हवा में मौजूद रसायन प्लेसेंटा के जरिए भ्रूण तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने कहा कि इनका संबंध अविकसित अंडकोष, शुक्राणुओं की गुणवत्ता में कमी व टेस्टिकुलर कैंसर के खतरे से भी जोड़ा गया है।
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पीडियाट्रिक सर्जरी एवं यूरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. शांडिप कुमार सिन्हा ने कहा कि अभी यह साबित नहीं है कि केवल प्रदूषण हाइपोस्पेडियास का कारण है। आनुवंशिकी, मां का स्वास्थ्य, हार्मोन व पर्यावरण सभी भूमिका निभा सकते हैं।
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विशेषज्ञों ने गर्भवती महिलाओं को नियमित जांच, संतुलित आहार, तंबाकू व रसायनों से बचाव और प्रदूषण वाले दिनों में बाहर निकलने से परहेज की सलाह दी। साथ ही कहा कि अधिकांश गर्भधारण सामान्य होते हैं, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। हाइपोस्पेडियास का समय पर पता चलने पर सफल ऑपरेशन संभव है, इसलिए जन्म के बाद किसी भी असामान्यता पर तुरंत बाल शल्य चिकित्सक से संपर्क करें।