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Delhi NCR News: रक्षाबंधन पर 25 हजार करोड़ के कारोबार का अनुमान
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-‘विकसित भारत’ समेत थीम वाली राखियां बनीं आकर्षण, स्थानीय कारीगरों और महिला उद्यमियों को मिला बाजार
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। रक्षाबंधन पर इस बार देशभर के बाजारों में राखियों की खरीदारी बढ़ने की उम्मीद है। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद प्रवीन खंडेलवाल के अनुसार, इस वर्ष राखियों का कारोबार करीब 25 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष यह करीब 17 हजार करोड़ रुपये था। उपहार, मिठाई, कपड़े और अन्य सामान को जोड़ने पर कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है।
इस बार पारंपरिक राखियों के साथ ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘ब्रह्मोस’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘नारी वंदन’ और ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र’ जैसी थीम वाली राखियां भी बाजार में उपलब्ध हैं। इन्हें ग्राहक पसंद कर रहे हैं। वहीं, देश के विभिन्न हिस्सों की कला और संस्कृति से जुड़ी राखियां भी आकर्षण का केंद्र बनी हैं। नागपुर की खादी, जयपुर की सांगानेरी कला, पुणे की बीज, कोलकाता की जूट, असम की चाय पत्ती, बिहार की मधुबनी और बांस की हस्तकला से बनी राखियां ग्राहकों को पसंद आ रही हैं। कैट के मुताबिक, स्थानीय स्तर पर तैयार राखियों की बढ़ती मांग से कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों को भी बड़ा बाजार मिल रहा है। इससे स्थानीय रोजगार और स्वरोजगार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। रक्षाबंधन पर इस बार देशभर के बाजारों में राखियों की खरीदारी बढ़ने की उम्मीद है। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद प्रवीन खंडेलवाल के अनुसार, इस वर्ष राखियों का कारोबार करीब 25 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष यह करीब 17 हजार करोड़ रुपये था। उपहार, मिठाई, कपड़े और अन्य सामान को जोड़ने पर कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है।
इस बार पारंपरिक राखियों के साथ ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘ब्रह्मोस’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘नारी वंदन’ और ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र’ जैसी थीम वाली राखियां भी बाजार में उपलब्ध हैं। इन्हें ग्राहक पसंद कर रहे हैं। वहीं, देश के विभिन्न हिस्सों की कला और संस्कृति से जुड़ी राखियां भी आकर्षण का केंद्र बनी हैं। नागपुर की खादी, जयपुर की सांगानेरी कला, पुणे की बीज, कोलकाता की जूट, असम की चाय पत्ती, बिहार की मधुबनी और बांस की हस्तकला से बनी राखियां ग्राहकों को पसंद आ रही हैं। कैट के मुताबिक, स्थानीय स्तर पर तैयार राखियों की बढ़ती मांग से कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों को भी बड़ा बाजार मिल रहा है। इससे स्थानीय रोजगार और स्वरोजगार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
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