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Delhi NCR News: सिविल परीक्षा में मानसिक दिव्यांगों को आरक्षण से बाहर रखने पर केंद्र से मांगा जवाब
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविल सेवा परीक्षा में बौद्धिक अक्षमता और मानसिक बीमारी वाले उम्मीदवारों को आरक्षण से बाहर रखने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा-2026 की अधिसूचना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए दोनों को चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होगी।
याचिका में कहा गया है कि यूपीएससी की अधिसूचना दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 की धारा 34(1)(डी) के अंतर्गत आने वाले उम्मीदवारों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखती है। इस श्रेणी में बौद्धिक अक्षमता, ऑटिज्म, विशिष्ट सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी शामिल हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन उम्मीदवारों को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो दी जाती है, लेकिन उन्हें आरक्षण और सेवा आवंटन के लाभ नहीं दिए जाते। इससे दिव्यांगजन अधिनियम के उद्देश्य विफल होते हैं और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 तथा 21 का उल्लंघन होता है।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविल सेवा परीक्षा में बौद्धिक अक्षमता और मानसिक बीमारी वाले उम्मीदवारों को आरक्षण से बाहर रखने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा-2026 की अधिसूचना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए दोनों को चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होगी।
याचिका में कहा गया है कि यूपीएससी की अधिसूचना दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम-2016 की धारा 34(1)(डी) के अंतर्गत आने वाले उम्मीदवारों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखती है। इस श्रेणी में बौद्धिक अक्षमता, ऑटिज्म, विशिष्ट सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी शामिल हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन उम्मीदवारों को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो दी जाती है, लेकिन उन्हें आरक्षण और सेवा आवंटन के लाभ नहीं दिए जाते। इससे दिव्यांगजन अधिनियम के उद्देश्य विफल होते हैं और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 तथा 21 का उल्लंघन होता है।
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