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MCD Corruption: दिल्ली नगर निगम में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी, उपायुक्त की गिरफ्तारी ने खोली ऊपरी स्तर की परतें

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 01 Apr 2026 04:02 AM IST
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सार

अब तक निचले स्तर के कर्मचारियों व अधिकारियों तक सीमित दिखने वाला भ्रष्टाचार इतने ऊंचे पद तक पहुंचता नजर आया है, जिससे एमसीडी की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

Corruption runs deep in the Municipal Corporation of Delhi
एमसीडी मुख्यालय - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

एमसीडी में भ्रष्टाचार के मामलों के बीच शाहदरा उत्तरी जोन के उपायुक्त अभिषेक मिश्रा की चार लाख रुपये रिश्वत लेते हुए गिरफ्तारी ने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया है। अब तक निचले स्तर के कर्मचारियों व अधिकारियों तक सीमित दिखने वाला भ्रष्टाचार इतने ऊंचे पद तक पहुंचता नजर आया है, जिससे एमसीडी की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

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एमसीडी में हर साल कई कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में जांच एजेंसियों के हत्थे चढ़ते रहे हैं, लेकिन ज्यादातर मामले सी और बी श्रेणी तक ही सीमित रहे। करीब 18 साल बाद ए श्रेणी के किसी अधिकारी की इस तरह गिरफ्तारी ने यह साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें अब ऊपरी स्तर तक फैल चुकी हैं। इससे यह धारणा भी मजबूत हुई हैं कि सिस्टम में पारदर्शिता और निगरानी के मौजूदा तंत्र पर्याप्त नहीं हैं। 
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करीब 18 साल पहले एमसीडी के मूल कैडर के उपायुक्त भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे थे। इस पूरे प्रकरण की सबसे अहम कड़ी वह शिकायत है, जो एमसीडी के ही एक कर्मचारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ दर्ज कराई। आमतौर पर आम नागरिकों की शिकायतों के आधार पर कार्रवाई होती रही है, लेकिन इस बार अंदरुनी भ्र्रष्टाचार का सामने आने से यह संकेत मिलता है कि एमसीडी के भीतर भी असंतोष और दबाव बढ़ रहा है।

गौरतलब है कि आरोपी अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर तैनात था। एमसीडी में बड़ी संख्या में डिप्टी कमिश्नर और अतिरिक्त कमिश्नर स्तर और अन्य अधिकारी विभिन्न विभागों से प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। अब इस गिरफ्तारी के बाद प्रतिनियुक्ति व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर नई बहस छिड़ गई है। 

दरअसल यह मामला केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की कमजोरियों को उजागर करता है। लगातार सामने आ रहे भ्रष्टाचार के मामलों से यह भी स्पष्ट है कि इसका असर केवल आम जनता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कर्मचारियों को भी इसके दुष्परिणाम झेलने पड़ रहे हैं। 

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई महज एक उदाहरण बनकर रह जाएगी या फिर एमसीडी में व्यापक सुधारों की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल, इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि यदि सख्त निगरानी और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।

डीसी की गिरफ्तारी से खुली प्रतिनियुक्ति अधिकारियों की भूमिका की पोल : कपूर
चांदनी चौक नागरिक मंच के महासचिव प्रवीण शंकर कपूर ने शाहदरा उत्तरी जोन के उपायुक्त अभिषेक मिश्रा की गिरफ्तारी को नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार का बड़ा संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि इस घटना ने उनकी वर्षों पुरानी आशंका को सही साबित कर दिया है कि एमसीडी में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले गैर-जवाबदेह अधिकारी ही भ्रष्टाचार की जड़ हैं। कपूर ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2008 में ही एक कार्यक्रम के दौरान यह मुद्दा उठाया था। हालांकि उनके इस कथन को साबित होने में 18 साल लग गए, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि व्यवस्था में सुधार की तत्काल जरूरत है। 

भाजपा की खींचतान में फंसी एमसीडी : आप
एमसीडी के शाहदरा उत्तरी जोन के उपायुक्त के रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाने के मामले को आम आदमी पार्टी ने भाजपा की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा बताते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि एमसीडी में भाजपा दो गुटों में बंट चुकी है और एक गुट ने दूसरे को कमजोर करने के लिए इस कार्रवाई को अंजाम दिलवाया। उन्होंने कहा कि यह कोई अकेला मामला नहीं बल्कि एमसीडी के लगभग सभी जोनों में उपायुक्त स्तर पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार चल रहा है। भारद्वाज ने आरोप लगाया कि एमसीडी में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले कई आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति भाजपा नेताओं की सिफारिश पर होती है और उनका मकसद सिर्फ एमसीडी में लूट और वसूली करना होता है।

नियमों की अनदेखी कर समिति बैठक की : अंकुश
एमसीडी की स्थायी समिति की बैठक को लेकर सियासत तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी ने भाजपा पर नियमों की अनदेखी कर बैठक आयोजित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने का आरोप लगाया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष अंकुश नारंग ने कहा कि बिना अनिवार्य 72 घंटे के नोटिस के बैठक बुलाकर भाजपा ने लोकतंत्र की हत्या की है। अंकुश नारंग के अनुसार, स्थायी समिति की बैठक से पहले सभी सदस्यों को 72 घंटे पूर्व नोटिस देना जरूरी होता है, लेकिन इस नियम का पालन नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सोमवार को भी बिना पिछली बैठक के मिनट्स के मीटिंग कराने की कोशिश की गई थी, जिसे बाद में स्थगित करना पड़ा और मंगलवार को फिर उसी प्रक्रिया को दोहराया गया। 

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