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Delhi High Court: पॉक्सो कानून का मकसद है यौन शोषण रोकना, सहमति से बने रोमांटिक रिश्तों को अपराध बनाना नहीं

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 16 Jan 2026 02:05 AM IST
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सार

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कानून नाबालिगों को यौन शोषण और दुरुपयोग से बचाने के लिए बनाया गया है, न कि युवाओं के बीच सहमति से बने रोमांटिक रिश्तों को अपराधी बनाने के लिए।

Delhi High Court: The purpose of the POCSO Act is to prevent abuse.
दिल्ली हाई कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक फैसले में 19 वर्षीय आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामले में नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कानून नाबालिगों को यौन शोषण और दुरुपयोग से बचाने के लिए बनाया गया है, न कि युवाओं के बीच सहमति से बने रोमांटिक रिश्तों को अपराधी बनाने के लिए।

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न्यायमूर्ति विकास महाजन की एकल पीठ ने सोनू हलधर नाम के युवक को जमानत देते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट का इरादा 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा प्रदान करना है, न कि निकट आयु के युवकों के बीच स्वैच्छिक संबंधों को दंडनीय बनाना। मामले के अनुसार, आरोपी और पीड़िता (जो नाबालिग थी) के बीच एक स्वैच्छिक रोमांटिक रिश्ता था। संबंध के दौरान पीड़िता गर्भवती हो गई, जिसके बाद मामला दर्ज हुआ। आरोपी और पीड़िता की उम्र में ज्यादा फर्क नहीं था। दोनों के संबंध स्वेच्छा से थे।
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अदालत ने कहा पूर्व-ट्रायल हिरासत दंडात्मक नहीं हो सकती। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को पॉक्सो एक्ट के उद्देश्यों के साथ संतुलित करना होगा। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि आरोपी की निरंतर हिरासत मामले की परिस्थितियों में जरूरी नहीं थी। जमानत देते हुए कोर्ट ने कुछ शर्तें लगाई हैं, जैसे अभियोजन गवाहों से कोई छेड़छाड़ न करना और ट्रायल कोर्ट में आवश्यक रूप से पेश होना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत चरण तक सीमित हैं और ट्रायल पर कोई असर नहीं डालेंगी।

11 साल की बेटी से दुष्कर्मी पिता को आजीवन कारावास
रोहिणी कोर्ट ने 11 वर्षीय नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के दोषी एक 37 वर्षीय पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित सहरावत ने सजा पर बहस सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने यह भी कहा कि पिता ने सबसे पवित्र रिश्ते को कलंकित किया है। दोषी को पहले ही दुष्कर्म  और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (गंभीर प्रवेशकारी यौन हमला) के तहत दोषी करार दिया जा चुका था। अदालत ने सजा को उसके प्राकृतिक आयु के शेष जीवन तक की उम्रकैद घोषित किया।

विशेष लोक अभियोजक आदित्य कुमार ने तर्क दिया कि दोषी को किसी भी प्रकार की नरमी नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि उसने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। अदालत ने पीड़िता की मानसिक स्थिति पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि वह अभी भी भयानक यादों से ग्रस्त है। कोर्ट ने पीड़िता को उचित मुआवजे का भी प्रावधान किया। अदालत ने टिप्पणी की, दोषी ने सबसे पवित्र रिश्ते को शर्मनाक तरीके से तोड़ा। ऐसे अपराध में कोई नरमी बरतने की गुंजाइश नहीं है। 

न्यायाधीश ने कहा कि दोषी ने न केवल अपनी बेटी के साथ क्रूरता की, बल्कि समाज के प्रति खतरा पैदा किया है। यह मामला पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया गया था, जिसमें बच्चियों के खिलाफ यौन अपराधों पर सख्त प्रावधान हैं। अदालत ने दोषी को समाज से अलग रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे अपराधी को समाज में वापस लाने से अन्य नाबालिग लड़कियों के लिए खतरा बढ़ेगा।

यौन उत्पीड़न के आरोप से युवक बरी
कड़कड़डूमा कोर्ट ने यौन उत्पीड़न और घर में घुसपैठ के मामले में एक व्यक्ति की निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ट्विंकल वाधवा ने आरोपी समद की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को उचित संदेह से परे साबित नहीं कर सका। अदालत ने अपने आदेश में कहा, शिकायतकर्ता के अदालत में दिए बयान और दर्ज बयान में असंगतियां, महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी सलमान की गैर-उपस्थिति, रिकॉर्ड पर मौजूद डायरी एंट्रीज तथा पक्षों के बीच पहले से मौजूद दुश्मनी को देखते हुए अभियोजन पक्ष ने मामला साबित नहीं किया। आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।

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