Delhi High Court: वैवाहिक विवाद में दुष्कर्म का आरोप बन रहा वसूली और प्रताड़ना का हथियार, अदालत ने जताई चिंता
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने इसे ‘चिंताजनक रुझान’ करार दिया और कहा कि कई मामलों में इन आरोपों का इस्तेमाल इन-लॉज (ससुराल वालों) पर दबाव बनाने और भारी राशि वसूलने के लिए किया जा रहा है।
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दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक और पारिवारिक विवादों में दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने इसे ‘चिंताजनक रुझान’ करार दिया और कहा कि कई मामलों में इन आरोपों का इस्तेमाल इन-लॉज (ससुराल वालों) पर दबाव बनाने और भारी राशि वसूलने के लिए किया जा रहा है।
अदालत ने दो देवरों के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म और क्रूरता के मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी। मामले की पृष्ठभूमि में 2023 में शुरू हुए वैवाहिक विवाद के बाद 2024 में शिकायत दर्ज कराई गई। शुरू में शिकायत में दुष्कर्म का जिक्र नहीं था, लेकिन बाद में 164 सीआरपीसी बयान में 2017 का पुराना आरोप जोड़ दिया गया।
याचिकाकर्ताओं के वकील ऋषि मल्होत्रा ने इसे तलाक की याचिका का जवाबी हमला बताया। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 498-ए के दुरुपयोग के बाद अब दुष्कर्म जैसे आरोप जोड़ने का सिलसिला बढ़ गया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के हालिया फैसलों से साफ है कि अदालतें अब वैवाहिक विवादों को दुष्कर्म का हथियार बनाने की प्रवृत्ति पर सख्त नजर रख रही हैं। कानून में संशोधन या दिशानिर्देश जारी करके ऐसे दुरुपयोग को रोका जाए, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिल सके और निर्दोषों का जीवन बर्बाद न हो। यह फैसला दिल्ली की अदालतों में पारिवारिक विवादों में दुष्कर्म के झूठे आरोपों की एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा है। जिला अदालतों और उच्च न्यायालय ने हाल के वर्षों में ऐसे कई मामलों में आरोपी को बरी किया है।
तीस हजारी कोर्ट (अप्रैल 2025)
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुज अग्रवाल की अदालत में एक महिला ने 2019 में होटल में दुष्कर्म का आरोप लगाया। ट्रायल के दौरान गवाही में कई विरोधाभास सामने आए। कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया और महिला के खिलाफ झूठी गवाही की कार्यवाही शुरू करने के आदेश दिए। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि प्रतिष्ठा बनाने में जीवन लगता है, लेकिन कुछ झूठ इसे बर्बाद कर देते हैं।
साकेत कोर्ट (2025)
एक महिला ने हनी ट्रैप रचकर दुष्कर्म का झूठा आरोप लगाया। पारिवारिक-व्यक्तिगत विवाद से प्रेरित इस मामले में कोर्ट ने आरोपी को बरी किया और महिला के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।
तीन भाइयों का मामला (2026)
संपत्ति विवाद में आंटी ने तीन भाइयों पर दुष्कर्म और पॉक्सो का झूठा आरोप लगाया। एक भाई को तिहाड़ जेल जाना पड़ा। पांच वर्ष की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
हाईकोर्ट के अहम फैसले
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी ऐसे मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई है।
- जनवरी 2026 में न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा की पीठ ने डॉ. अवधेश कुमार की याचिका स्वीकार की। थाना वजीराबाद की एक एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति वाले वयस्क संबंध को बाद में दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता।
- सितंबर 2025 न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्णा कांता शर्मा ने शादी का झूठा वादा करके दुष्कर्म की प्राथमिकी रद्द की और पारिवारिक विवाद में राहत प्रदान की।
- जून 2026 न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने शादी टूटने के बाद रद्द प्राथमिकी को पुनर्जीवित करने की याचिका खारिज कर दी।न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने पारिवारिक विवादों में दुष्कर्म आरोपों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्ण ने भी 498ए के साथ दुष्कर्म आरोप वाली कई प्राथमिकियों को रद्द किया, जहां बदले की भावना साबित हुई।
झूठी शिकायतों को फिल्टर करना जरूरी
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि दंड संहिता की धारा 376 वर्तमान में बीएनएस की धारा 64 का दुरुपयोग वास्तविक पीड़ितों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की पैनल मीडिएटर अधिवक्ता जूही अरोड़ा ने कहा कि अदालतों को शुरुआती चरण में ही झूठी शिकायतों को फिल्टर करना चाहिए। कई मामलों में एफआईआर गलत तरीके से दर्ज करा ली जाती है हालांकि मध्यस्थता केंद्र में आने के बाद उन मामलों को रद्द कर दिया जाता है।