सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Euthanasia: Harish's journey of suffering, which began 13 years ago, will come to an end at Delhi AIIMS

इच्छामृत्यु: दिल्ली एम्स में विराम लेगी 13 साल पहले शुरू हरीश की पीड़ा, डॉक्टरों की टीम पूरी करेगी प्रक्रिया

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गाजियाबाद Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 13 Mar 2026 06:48 AM IST
विज्ञापन
सार

पिता अशोक राणा ने बताया कि पिछले 13 वर्ष से बिस्तर पर असहनीय पीड़ा झेल रहे हरीश को सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति मिलने के बाद तीन डॉक्टरों की टीम गठित की जा रही है। इसकी देखरेख में यह प्रक्रिया पूरी होगी। 

Euthanasia: Harish's journey of suffering, which began 13 years ago, will come to an end at Delhi AIIMS
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की दी इजाजत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार

राजनगर एक्सटेंशन की राज एंपायर सोसायटी में रहने वाले हरीश राणा को अगले तीन दिन के अंदर दिल्ली एम्स में शिफ्ट किया जा सकता है। पिता अशोक राणा ने बताया कि पिछले 13 वर्ष से बिस्तर पर असहनीय पीड़ा झेल रहे हरीश को सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति मिलने के बाद तीन डॉक्टरों की टीम गठित की जा रही है। इसकी देखरेख में यह प्रक्रिया पूरी होगी। 

Trending Videos


हालांकि, परिवार पूरे मामले को गोपनीय रखना चाहता है व बेटे के अंतिम समय को शांति से गुजारना चाहता है। बृहस्पतिवार को अशोक राणा ने नम आंखों से बताया कि हमने बहुत प्रयास किए, लेकिन बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अब वह अपने अंतिम सफर पर निकल रहा है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


उन्होंने कहा कि इस पीड़ादायक समय में सभी से अपील है कि हमारे फैसले का सम्मान करें। कोई भीड़ या शोर-शराबा न हो। उन्होंने बताया कि डॉक्टरों की टीम बनते ही बेटे को एम्स में शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसमें 24 घंटे से 72 घंटे तक लग सकते हैं। इस दौरान वह सिस्टम से नाराज भी नजर आए।

शायद कोई पुराना लेन-देन रहा होगा: अशोक राणा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानवता भरा है। उन्हें बेटे के लिए बहुत दुख है, लेकिन शायद किसी पुराने लेन-देन के कारण यह सब देखना पड़ा। उन्होंने कहा कि अभी आदेश की आधिकारिक कॉपी नहीं मिली है, लेकिन कुछ अन्य स्रोतों से जानकारी मिली है। उन्होंने कहा कि जैसे ही आदेश पढ़ेंगे, पूरी स्थिति साफ हो जाएगी।

यह है मामला: जुलाई 2010 में हरीश ने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। वर्ष 2013 में वह अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान अगस्त में रक्षाबंधन वाले दिन बहन से मोबाइल फोन पर बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर घायल हरीश को तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। 

दिसंबर 2013 में उन्हें दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित हैं। इस स्थिति में उनके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो गए और वह जीवन भर बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए। 

हरीश के दर्द और शारीरिक अक्षमता के कारण माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की, जिसे 8 जुलाई 2025 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।

परिवार को मिलेगी 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता
हरीश के परिवार को शासन की ओर से 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। बृहस्पतिवार को जिलाधिकारी रविंद्र कुमार मांदड़ ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री ने परिवार की मदद के लिए यह स्वीकृति प्रदान की है। जिलाधिकारी ने कहा कि सीएमओ डॉ. अखिलेश मोहन को हरीश की दवाओं पर हुए खर्च का भुगतान करने और भविष्य में किसी चिकित्सीय सहायता की जरूरत होने पर सहयोग करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

इससे पहले बुधवार को जिलाधिकारी, नगर आयुक्त और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष ने हरीश के परिवार से मुलाकात की और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया था। तत्काल राहत के तौर पर ढाई लाख रुपये का चेक भी परिवार को सौंपा गया था। इसके अलावा परिवार की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने एक दुकान आवंटित करने का निर्णय लिया है। जिलाधिकारी ने कहा कि यह सहायता परिवार के भरण-पोषण और जीवनयापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

सोसायटी में गमगीन माहौल 
अशोक राणा के पड़ोस में रहने वाले नरेंद्र राणा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद माहौल गमगीन है। अशोक हिमाचल प्रदेश के मूल निवासी हैं और नरेंद्र उत्तराखंड के। पहाड़ी क्षेत्र से होने और पड़ोसी होने के नाते दोनों परिवारों में खूब पटती है। नरेंद्र कहते हैं कि चार साल से हम उनके संघर्ष को देख रहे हैं। बच्चा दिन-प्रतिदिन कमजोर होता गया और माता-पिता की पीड़ा बढ़ती रही। उनका संघर्ष प्रेरक है।

पिता ने बयां किया बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का सच
पिछले 13 साल में अशोक राणा ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहद करीब से देखा। बेटे को पंजाब से लेकर दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद के कई सरकारी व निजी अस्पतालों में दिखाया। घर में होमकेयर के लिए नर्स रखीं। नामी-गिरामी डॉक्टरों से संपर्क साधा। इन सब अनुभवों के बीच उन्होंने देखा कि स्वास्थ्य व्यवस्था में कई गंभीर कमियां हैं। 

अशोक राणा कहते हैं ‘मैं किसी की निंदा नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच है कि मैंने देश में स्वास्थ्य सेवा का बुरा हाल देखा। कई नामी अस्पतालों के डॉक्टरों को ट्यूब से खाना देने की विधि तक नहीं पता थी। कई होमकेयर नर्सों को भी यह जानकारी नहीं थी। सपोर्ट सिस्टम की भी कमी नजर आई। यह देखकर मैं हैरान रह गया कि सब कैसे चल रहा है।’ उनका कहना है कि इस लंबी और दर्दनाक लड़ाई ने न केवल उन्हें अपने बेटे की देखभाल की वास्तविकता, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की हकीकत भी दिखा दी। ब्यूरो 

इच्छामृत्यु की प्रक्रिया पैलिएटिव केयर विभाग में होगी पूरी
देश के इतिहास में दिल्ली का एम्स अस्पताल अब निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के पहले लागू मामले का मुख्य केंद्र बनेगा। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (सीएएनएच) हटाने की अनुमति दी है। यह प्रक्रिया एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में होगी।

मामला सुप्रीम कोर्ट के अधीन होने से एम्स प्रशासन इस बारे में ज्यादा बोलने से इंकार कर रहा है। फिर भी, बताया गया कि एम्स दिल्ली में मरीज को एडमिट कर पैलिएटिव केयर विभाग में प्रक्रिया पूरी होगी। एम्स प्रशासन कमेटी बनाकर अदालत के आदेश को लागू करेगा। 

कानूनी प्रावधानों के साथ इसमें हर स्तर पर मानवीय पहलू का ख्याल रखा जाएगा। मरीज को धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटाया जाएगा। जीवन रक्षक उपकरण हटाने से प्राकृतिक मौत होने दी जाएगी। कोई जहरीला इंजेक्शन नहीं, सिर्फ मशीनें बंद कर दर्द निवारक दवाएं और पैलिएटिव केयर दी जाएगी। इससे मौत धीरे-धीरे होती है, लेकिन गरिमा के साथ।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है?
यह तब लागू होता है जब मरीज परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (पीवीएस) में हो, ठीक होने की कोई संभावना न बची हो और वह सिर्फ आर्टिफिशियल फीडिंग या हाइड्रेशन पर जिंदा रखा जा रहा हो। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के कॉमन कॉज फैसले में इसे आर्टिकल 21 के तहत राइट टू डाई विद डिग्निटी का हिस्सा माना। 2023 में प्रक्रिया आसान की गई, जिसमें दो मेडिकल बोर्ड्स की रिपोर्ट, कोर्ट कम हस्तक्षेप निर्धारित किया गया।

प्रक्रिया पारदर्शी, सुरक्षित और मानवीय होगी : विशेषज्ञ
दुनिया के कई देशों में एक्टिव यूथेनेशिया वैध है, लेकिन देश में सक्रिय तरीका अपराध है। 2011 के अरुणा शानबाग मामले से पैसिव यूथेनेशिया मान्यता मिली, लेकिन पहली बार 2026 में लागू हुआ और वो भी दिल्ली के एम्स में। वहीं, पीड़ित परिवार का कहना है कि उनके लिए यह बड़ी राहत है, जो 13 साल से बेटे को मशीनों पर देखते रहे। कोर्ट ने केंद्र से व्यापक कानून बनाने की सिफारिश की है।

दिल्ली-एनसीआर से जुड़ा ऐतिहासिक मामला  
हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिरे, गंभीर ब्रेन इंजरी और 100 फीसदी क्वाड्रिप्लेजिया हो गया। तब से वे पीवीएस में थे। परिवार ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन खारिज हुई। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed